शुद्ध, सात्विक प्रेम से चमुत्व
ध्येय के अनुरूप कार्यप्रणाली और कार्यपद्धति का विकास योजनापूर्वक करने के बाद पूर्ण विश्वास के साथ उसपर लगे रहना ही एकमात्र मार्ग है। इस…
पूरा लेख पढ़ेंसंबंधित लेख
62 लेख
ध्येय के अनुरूप कार्यप्रणाली और कार्यपद्धति का विकास योजनापूर्वक करने के बाद पूर्ण विश्वास के साथ उसपर लगे रहना ही एकमात्र मार्ग है। इस…
पूरा लेख पढ़ेंसंवाद में श्रवण प्रमुख होना चाहिए। जो कार्यकर्ता सामनेवाले को स्वयं के बारे में खुलकर बोलने के लिए सहज प्रेरित करते हैं वे अच्छा…
पूरा लेख पढ़ेंअर्जुन बनेंगे तभी गीता समझेंगे। जब तक शिष्यत्व नहीं लेते तब तक अर्जुन नहीं बनते। धृतराष्ट्र का मामकाः जब अर्जुन में प्रवेश कर गया…
पूरा लेख पढ़ेंसंस्कृत शब्द का अर्थ ही संस्कारित होता है। स्वरयंत्र से सहज निकलने वाली प्राकृत वाणी का संस्कार होने से वह संस्कृत हो जाती है।…
पूरा लेख पढ़ेंआज तप अर्थात् Research को केवल उच्च शिक्षा का अंग बनाया गया है। तप और शुद्धि ही हर स्तर की शिक्षण विधि है। विधि…
पूरा लेख पढ़ेंअधिशील से अधिप्रज्ञ तक की शिक्षा में यह सूत्र समान है। शोधन करते समय ही लगातार मैल भी एकत्रित होता रहता है। कोई निश्चित…
पूरा लेख पढ़ेंमहिष मानव के भीतर अवशिष्ट पशुत्व का प्रतीक है सब देवताओं के तेजांश से संगठित माँ कात्यायनी ही उस पर आरूढ़ हो उसका मर्दन…
पूरा लेख पढ़ेंसामन्यतः मन के रूप में सम्बोधित अन्तःकरण में चार करण (instruments) आते है -मन, बुद्धि, चित्त और अहं। एक ही आंतरिक व्यवस्था जिसे गीता…
पूरा लेख पढ़ेंजैसे बीज में पूरा विश्व छिपा होता है वैसे ही मनुष्य में पूर्णत्व संभावना के रूप में विद्यमान होता है। शिक्षा का लक्ष्य है…
पूरा लेख पढ़ेंअधिजनन के द्वारा अच्छी प्रजा का निर्माण तथा अधि- अयन अर्थात् अध्ययन के द्वारा मनुष्य के जीवन-गठन का मार्ग प्रशस्त करने के साथ ही…
पूरा लेख पढ़ें