जैसे बीज में पूरा विश्व छिपा होता है वैसे ही मनुष्य में पूर्णत्व संभावना के रूप में विद्यमान होता है। शिक्षा का लक्ष्य है उस संभावना को संभव करना। बीज को विराट स्तर पर अंड भी कहते है। इसीलिए ब्रह्मांड संभावना का समुच्चय है। काल के आरंभ में यही ब्रह्म-अंड द्विभाजित हुआ और सृष्टि का सर्जन हुआ। वास्तव में जब काल के चक्रीय अस्तित्व को समझते है तब इस प्रक्रिया को घटना के रूप में भूतकाल में व्यक्त नहीं कर सकते क्योंकि यह सतत घटित हो रही है। सृजन भी सतत प्रक्रिया है। इसी के चलते हम अपने ज्ञानेंद्रियों के आकलन में आ रहे अस्तित्व को जगत कहते है। जो जग रहा है अर्थात् सतत प्रकाशित हो रहा है वह जगत है। यह निरंतर हो रहा है।

चतुर्थ दिवस की देवी माता कुष्मांडा। कथा के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पूर्व के तमस् में माँ प्रगट हो कर ब्रह्मबीज से सृष्टि की उत्पत्ति करती हैं। ईसीसे उनका नाम भी पड़ा है। यह भी माना जाता है कि माता को कुम्हड़े फल की बलि दी जाती है। इन दोनों बातों को जोड़कर देखते है तो हमें शिक्षा शास्त्र का महत्वपूर्ण चरण समझ में आता है। अधिशील शिक्षा के बाद दूसरा चरण है अधिचित्त। इस चरण में चित्त को शुद्ध किया जाता है। बीज रूप में विद्यमान पूर्णता की अभिव्यक्ति में यह चरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। कुष्मांडा का अर्थ है कल्मष की बलि के द्वारा अंड का अंकुरण। ज्ञान का दीप प्रत्येक में प्रदीप्त है ही। केवल ऊपर के आवरण को हटाना है। स्वामी विवेकानंद दीप को हवा से बचाने के लिए जिस काँच के गोले को प्रयोग में लिया जाता है उस पर काल के साथ कालिख जमा होती है और फिर प्रकाश अवरुद्ध हो जाता है। मनुष्य अंतकरण की भी यही स्थिति है। चित्त में संग्रहित संस्कारों के आवरण से सत्-चित-आनंद का स्वरूप ढक जाता है। इस आवरण को हटाना ही ज्ञान साक्षात्कार का मार्ग है। इस हेतु चित्तशुद्धि अनिवार्य है।
उपनिषद में कहा है –
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ईश उप १५॥
स्वर्णिम पात्र से सत्य का मुख ढका हुआ है। हे विश्व का पोषण करनेवाले पुषन् तुम उस ढक्कन को हटा दो और हमें सत्य अर्थात् ज्ञान का तथा उसके प्रयोग धर्म का दर्शन कराओ।
बालपन से ही मन को आर्जव जैसे दैवी संपद का अभ्यास कराने से मन निर्मल हो जाता है। अंदर बाहर का भेद समाप्त हो जाता है। अंतर्निहित ज्ञान के प्रकाश का यह मार्ग है। करुणा से जागृत संवेदना भी मन के विस्तार के साथ ही पारदर्शिता के लिए आवश्यक है। वेदना तो स्वयं की पीड़ा है किंतु जब दूसरे की पीड़ा की वेदना का अनुभव होने लगे तब उसे संवेदना कहते है। सभी को आत्मवत् देखने के सर्वोच्च आदर्श प्राप्त करने का यह प्रथम सोपान है। यह एकत्व की अनुभूति ही ज्ञान है। इसका अंतिम चरण है भक्ति। भक्ति में संवेदना से भी आगे तत्सुख की अनुभूति आती है। नारद भक्ति सूत्र का २४ वा सूत्र है – तत् सुख सुखित्वं॥ दूसरे के सुख में सुखी होना ही अव्यभिचारिणी भक्ति है।
भाव शुद्धि से ही ज्ञान का साक्षात्कार सम्भव है। यही सतत होते सृजन की अनुभूति हैं। माता कुष्मांडा की कृपा से हम अपनी शिक्षा प्रणाली में भावशुद्धि को भी अपनाए यही प्रार्थना। चित्तशुद्धि में और भी दो चरण है उनका स्वाध्याय माता दुर्गा के कुछ अन्य रूपों के साथ करेंगे।

मां भगवती के पावन पर्व पर इतनी महत्व पूर्ण ज्ञान वर्षा से स्वयं को सिंचित करने का जो अवसर प्रदान किया उसके लिए बहुत बहुत धन्यवादl