श्रीकृष्ण का शिष्यत्व ग्रहण कर स्वाध्याय करें।

Mukul Kanitkar 19 मिनट का पठन

प्रथम अध्याय भगवद्गीता की भूमिका है। अर्जुन विषाद योग गीता की प्रस्तावना है। महारथी अर्जुन के विषाद का निमित्त बन गीता का पदार्पण हुआ। अन्यथा रणभूमि में तत्व प्रवचन का क्या स्थान होगा ? अर्जुन का विषाद निमित्त बना और स्वयं भगवान ने सभी उपनिषदों, दर्शनों के साररूप में जीवन का तत्व स्वयं रणभूमि में गाया। गीता अर्थात् जिसे गाया गया। भीष्म द्वारा गायी – भीष्मगीता, अवधूत द्वारा गायी अवधूत गीता दत्त द्वारा गायी दत्तगीता वैसे साक्षात भगवान द्वारा गायी गई – भगवद्गीता। गीता माहात्म्य में कहा है नारायणेन स्वयं। पूरा श्लोक है

ॐ पार्थाय प्रतिबोधितां भगवता नारायणेन स्वयं। व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्ये महाभारतं॥ अद्वैतामृतवर्षिणीं भगवतीमष्टादशाध्यायिनीमम्ब। त्वामनुसंदधामि भगवद् गीते भवद्वेषिणीम्॥

अर्जुन का विषाद निमित्त बना। उसने पूरी मानवता पर उपकार किया कि यह गीता का प्रसाद हम सबको प्राप्त हुआ। गीता की पृष्ठभूमि युद्ध की रणभूमि है इसलिए वह व्यावहारिक है, जीवनोपयोगी है। जैसे अनुसंधान में उसके सामाजिक, औद्योगिक अथवा शैक्षिक उपयोगिता का महत्व होता है वैसे ही गीता का ज्ञान आचरणयोग्य है। सर्वाधिक व्यावहारिक दर्शन। रणभूमि में उद्देश्य स्पष्ट है। निरर्थक व्याप नहीं है। लक्ष्य स्पष्ट है। अर्जुन को युद्ध तत्पर करना। उसके हाथ से गांडीव छूट गया है। अर्जुन कह रहा है – अशस्त्रंशस्त्रपाणय – हाथ से शस्त्र छोड़ मै धृतराष्ट्र के पुत्रों के हाथों मारा भी जाऊ तो वह मेरे लिए श्रेयस्कर होगा। – धार्तराष्ट्रारणेहन्युःतन्मेक्षेमतरंभवेत॥अर्जुन इस स्तर तक गिर गया है। उसे जगाने व्यावहारिक वेदांत का संदेश भगवद्गीता में हैं।

अर्जुन का पतन भी लक्षणीय है। कहाँ से कहाँ फिसला है वह। प्रारंभ में अत्यंत आत्मविश्वास के साथ ‘धनुरुद्यम पांडव’ धनुष्य उठाकर वह ललकार रहा। युद्ध के उन्माद में दोनों हाथ उठाकर सारथी श्रीकृष्ण को कहता है- से नयोरुभयोरमध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत – दोनों सेनाओं के मध्य मेरा रथ ले चलो- यावत येतान्निरीक्षेऽहं – मै देखना चाहता हूँ। धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे यूयत्सुं समुपस्थितः – दुर्योधन की दुर्बुद्धि के कारण कौन मुझसे लड़ने आया है। ताल ठोक कर कह रहा है कि किसने मुझसे युद्ध करने की हिम्मत की है। आत्मविश्वास प्रबल है। वीरता के उस उच्च स्तर से अर्जुन ऐसा गिरता है कि कहता है अब गांडीव नहीं उठा पा रहा। कह रहा है – गांडीवं संस्रते हस्तात – मै मेरा शस्त्र धारण नहीं कर पा रहा। धनुष्य मेरे हाथ से फिसल रहा है। त्वक्चैव परिदह्यते – त्वचा में जलन हो रही है। मेरे गात्र शिथिल हो रहे है। मै स्वयं को सम्हाल नहीं पा रहा हूँ। भ्रमतीव च में मनः – मेरा मन चकरा रहा है। तो वीरता की स्थिति से इस दयनीय स्थिति में अर्जुन का पतन हुआ है। और वह युद्ध से विमुख- रथोपस्थ उपाविशत- रथ के पिछले हिस्से में बैठ गया।

मै नहीं लड़ूँगा – न योत्स इति उक्त्वा ऐसा कह कर पलायन कर रहा है। इस पृष्ठभूमि में गीता का अवतरण हुआ है। धर्मक्षेत्रे- कुरक्षेत्रे – रणभूमि है कुरुक्षेत्र, जो धर्मक्षेत्र भी है। हमारा जीवन भी एक रणक्षेत्र है। धर्म की रणभूमि है। धर्म अर्थात् क्या मेरे लिए करणीय है। जीवन में हमें करना क्या है यह जीवन का युद्ध है। दोराहे पर खड़े होकर मनुष्य हर बार सोचता है किस ओर जाना है ? हर क्षण निर्णय लेना होता है। महामारी के समय पूरे विश्व में घरवास करना पड़ा। सामाजिक दूरी बनाने के लिए घर में रहने का आह्वान किया गया। इस lock down कहा गया। तालाबंदी कहने से विवशता होती है। इसलिए भारतीय शिक्षण मंडल ने इसे नाम दिया घरवास। किंतु जिन्हें घर रहने का अभ्यास ही नहीं था उनके लिए ये बड़ा अत्याचार था। हर दिन निर्णय लेना था कि लक्ष्मण रेखा माने या तोड़े? बाहर जाने के प्रलोभन को त्याग संयम करना था। धर्म, कर्तव्य का प्रश्न था। यह हमारा नित्य रण है।

हर दिन धर्म का निर्णय लेना होता है। कर्तव्य को तय करना होता है। हमारे लिए श्रेय क्या है ? श्रेय अर्थात् जो श्री की ओर ले जाए। कठोपनिषद बताता है जीवन जीने के दो मार्ग है – श्रेय मार्ग और प्रेय मार्ग। प्रेय अर्थात् जो प्रिय है। जो सहज, सुलभ, अनुकूल होता है वही प्रिय होता है। नींद सबको प्रिय होती है। सब जानते है सुबह जल्दी उठना हमारे लिए अच्छा है किंतु प्रतिदिन सुबह बिस्तर त्यागना कितना कठिन होता है? नींद प्रेय मार्ग है और जागरण श्रेय मार्ग है। श्रेय और प्रेय का नित्य युद्ध ही धर्मयुद्ध है। ये कुरुक्षेत्र है अर्थात् कर्म का क्षेत्र है। कुरु अर्थात् करो। कुरु यह करने की आज्ञा है। धर्मक्षेत्र ही कुरुक्षेत्र भी है। धर्म अर्थात् निर्णय लेना – क्या करणीय है और क्या न करणीय है ? और कर्म अर्थात् उस निर्णय को लागू करना। दोनों ही जीवन में चलता है। गीता का प्रारंभ ही उसके पटल को बताता है। धर्म और कर्म दोनों में उठनेवाले द्वंद्व का उत्तर देती है गीता।

संस्कृत काव्य का सौंदर्य होता है कि यदि आपको ग्रन्थ का विषय समझना है तो उस काव्य के प्रथम शब्द और अंतिम शब्द को जोड़कर देख सकते है। ग्रन्थ का मूल विषय स्पष्ट हो जाएगा। गीता का प्रथम शब्द है धर्म और अठारहवे अध्याय के अंत में संजय धृतराष्ट्र से कहता है – यत्र योगेश्वरो कृष्ण यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्री, विजयो, भूति ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ जहां योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धर पार्थ हैं अर्थात् मार्गदर्शन के लिए धी के प्रतिनिधि कृष्ण है और करने वाली समर्थ दशेंद्रियों के प्रतिनिधि अर्जुन है। सही निर्णय पर सही कर्म से ही श्री, विजय और भूति अर्थात् वैभव तीनों प्राप्त होते है ऐसा मेरा दृढ़ मत हैं। अंत में शब्द आता है – मम। भगवद्गीता ka प्रथम शब्द धृतराष्ट्र के मुख से निकला धर्म और अंतिम शब्द संजय के मुख से निकला मम। दोनों श्रोता है। श्रोता भी संवाद में महत्वपूर्ण है। श्रोता ही वक्ता को बनाता है उसके वचनों को मूल्य प्रदान करता है। गीता के तीन श्रोता है – संजय, धृतराष्ट्र और कपिध्वज पर विराजमान हनुमानजी। एक वक्ता और एक कर्ता। भगवान श्रीकृष्ण वक्ता है उन्होंने शपथ ली है शस्त्र धारण ना करने की इसलिए वे केवल मार्गदर्शन करते है। युद्ध का कर्ता तो अर्जुन है। संवाद श्रीकृष्ण और अर्जुन का है किंतु उसका विषय हम देख रहे है दो श्रोताओं के शब्दों से। तो गीता का विषय हुआ मम-धर्म – मेरा धर्म- स्वधर्म। यही गीता का प्रतिपाद्य विषय है। हमें हमारा स्वधर्म बताने के लिए गीता है। किसलिए हमने जन्म लिया है जीवन का उद्देश्य क्या है यह जानने के लिए गीता है।

किम् प्रयोजनं ? महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर ने भगवद्गीता की व्याख्या ‘ज्ञानेश्वरी’ के अंत में प्रसाद माँगा है जिसे पसायदान कहते है। उसमें संत ज्ञानेश्वर जी माँगते है – विश्व स्वधर्म सुर्ये पाहो। विश्व के सभी लोग स्वयं के स्वधर्म के सूर्य का दर्शन करें। इससे अधिक मौलिक प्रार्थना क्या होगी। स्वधर्म अर्थात् स्वयं का धर्म। धर्म का कोई अनुवाद सम्भव नहीं है। धर्म अर्थात् कर्तव्य। धर्म सम्पूर्ण अस्तित्व का आधार है। जो धारण करता है वह धर्म। अधिष्ठान धर्म है। जगत का कारण धर्म है। जो करणीय कर्तव्य है वह धर्म है। पूरी सृष्टि में व्यक्ति की भूमिका धर्म है। हम अकेले तो है नहीं। आकाश से टपके नहीं है। माता-पिता के प्रति, परिवार के प्रति हमारा कर्तव्य है। जिस समाज के हम अंग है उसके प्रति हमारा कर्तव्य है। अनेक जन्मों की पुण्याई से भारतभूमि में जन्म मिलता है। भारतमाता के प्रति हमारा कर्तव्य क्या है? सृष्टि के नाटक में हम सबकी भूमिका हमारे जन्म से पूर्व से ही तय है। किंतु जन्म के बाद उसका स्मरण नहीं रहता। जिस कार्य के लिए आए है वह विस्मृत हो गए। जैसे किसी व्यक्ति को संदेश पहुँचाने के लिए भेजा किंतु मार्ग में अनेक प्रलोभन मिलते है- सुंदर दुकाने, रंगीन उद्यान उनमें सुगंधित पुष्प और विविध तितलियाँ । इन सब में रमा मन अपना मुख्य कार्य स्वधर्म भूल जाते है। जीवनयात्रा का लक्ष्य भूल गयें। अनेक जन्मों से ये जीवनयात्रा चल रही है। चौथे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण बताएँगे – बहूनि मे व्यतितानि जन्मानि तव चार्जुन – हम दोनों ने ही अनेक जन्म बिताए है। उन जन्मों की नित्यता क्या है? इतने सब जन्मों का सतत चल आ रही यात्रा का प्रयोजन क्या है? वह स्वधर्म जानने के लिए भगवद्गीता है।अर्जुन अपने जीवन का उद्देश्य भूल गया है। युद्धभूमि में भूल गया है। उसे स्मरण कराने गीता का प्रगटन हुआ।

गीता का संदर्भ महाभारत के ११ वे दिन आता है। गीता स्मृति विवरण (Flash Back) में है। पहले दिन घटित है किंतु संजय ने बताया ११ वे दिन। संजय जो धृतराष्ट्र का सारथी है उसे युद्ध के प्रारंभ में व्यास जी ने दिव्यदृष्टि प्रदान की है। ११ वे अध्याय में कृष्ण भगवान भी अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करेंगे। मात्र चर्मचक्षुओं से विराट रूप के दर्शन सम्भव नहीं है। दिव्यम ददामि ते चक्षुः तुम्हें दिव्य चक्षु देता हूँ। युद्ध के पूर्व व्यास महर्षि ने संजय को दिव्य चक्षु प्रदान किए है। हस्तिनापुर में बैठे बैठे वह कुरुक्षेत्र का युद्ध देख सकता है। लोगों की बातें सुन सकता है। यहाँ तक कि मन के विचार भी समझ सकता है। वर्तमान के दृक-श्राव्य माध्यमों से भी विकसित तकनीक से सुसज्जित उस समय का मीडिया है संजय। किंतु सजीव प्रसारण नहीं हुआ।

प्रथम ११ दिन धृतराष्ट्र का साहस ही नहीं हुआ युद्ध का वृत्त पूछने का। वह जानता है कि उसका पक्ष अधर्म का है। उसके पुत्रों की सेना बड़ी है। 7 अक्षोहिणी पांडवों के सामने कौरव 11 अक्षोहिणी लगभग डेढ़ गुना हैं । प्रथम अध्याय में दुर्योधन आचार्य द्रोण को बताता है – अपर्याप्तं इदं अस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितं – भीष्म द्वारा रक्षित हमारी ११ अक्षोहिणी सेना पांडवों के लिए बहुत अधिक है। वे इसका पार नहीं पाएँगे। उनकी सेना केवल 7 अक्षोहिणी है। हमारे लिए पार पाना सहज है। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितं। पांडव सेनापति धृष्टद्युम्न का नाम नहीं लिया है। अर्जुन का भी नाम नहीं लिया। पांडवों की शक्ति कम आंकने के लिए दुर्योधन ने भीम का नाम लिया जो शरिर से वृकोदर- भव्य है किंतु बुद्धि में कम। इसलिए हमारे पार पाने के लिए भीम द्वारा रक्षित पांडव सेना पर्याप्त है। कम है। सामान्य हिंदी में पर्याप्त शब्द का अर्थ किसी कार्य के लिए आवश्यक है उतनी मात्रा ऐसा अर्थ होता है। किंतु यहाँ पर्याप्त का अर्थ कम अर्थात् पार पाने योग्य ऐसा है। अपर्याप्त का अर्थ इतनी अधिक की शत्रु परास्त ना कर सकें।

यह बात वह आचार्य द्रोण को बता रहा है। पश्येतां पांडुपुत्राणां आचार्य महतीं चमूं। यह चमू एक विशेष शब्द है। अंग्रेज़ी शब्द Team का भारतीय भाषाओं में अनुवाद नहीं कर पाते हैं। दल, गुट, समूह ये सारे शब्द तोड़ने वाले है। बड़े सामूहिक इकाई को तोड़कर ये सब बनते हैं। चमू में एक लक्ष्य एक कार्य और सबसे महत्वपूर्ण एक मन होता है। ऐसे संगठित समूह को चमू कहते है। यह संस्कृत शब्द team से भी गहरा है। चमुत्व भी टीम स्पिरिट से अधिक अर्थपूर्ण हैं। दुर्योधन ने पांडव सेना को चमू कहा है। अनायास ही उसके मुख से ऐसा अर्थपूर्ण शब्द निकल पड़ा है। चमू सेना को भी कहते है किंतु भाव संगठन और मानसिक एकत्व का है। उसके मन में ना भी हो तब भी तथ्य ऐसे ही हैं। 11 के विरुद्ध 7 अक्षोहिणी में मुख्य भेद यही है। शस्त्र को हाथ लगाए विना ही श्रीकृष्ण ने पांडव सेना को चमूबद्ध किया है। उदात्त लक्ष्य प्रदान किया है। इसी कारण कम होते हुए भी वह हिंदी वाले अर्थ में पर्याप्त अर्थात् जितनी आवश्यक उतनी है। दूसरी ओर कौरव सेना बड़े बड़े ख्यातनाम योद्धाओं से परिपूर्ण है किंतु सब अपने अपने अहंकार में अपने अपने भिन्न भिन्न उद्देश्य और लक्ष्य लेकर हैं।

इस पृष्ठभूमि में युद्ध के ग्यारहवे दिन महाराज धृतराष्ट्र ने साहस कर संजय से पूछा। इसलिए पहला श्लोक भूतकाल में है। कीं अकुर्वत – क्या किया था ? किसने ? वह बताते समय ही धृतराष्ट्र का भेदभाव स्पष्ट दिखता है। यह व्यास महर्षि के काव्य का मानसिक पक्ष है प्रथम श्लोक में ही युद्ध के कारण का स्पष्ट संकेत कर दिया। एक शब्द में स्पष्ट कर दिया। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेताः युयुत्सवाः – युद्ध के लिए धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में एकत्रित। कीं अकुर्वत – क्या किया? किसने ? धृतराष्ट्र कह रहा है – मामकाः पाण्डवाः – मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने । मेरे यह मम ही भेद का मूल है। जहां मेरा है वहाँ दूजा भी है। अयं निज परोवेति गणना लघुचेतसां- ये मेरा ये तेरा यह छोटे मन वालों की गिनती है। इस भेदबुद्धि से ही विनाश होता है। पांडु ने वन से बड़े विश्वास से कुंति को पाँचों पुत्रों के साथ भेजा है। मेरा भाई मेरे पुत्रों को अपनत्व से स्वीकार करेगा। इसीलिए कुन्ती अपने तीन और माद्री के दो पुत्रों को लेकर हस्तिनापुर लौटी है इस अपेक्षा के साथ कि सब एक परिवार के रूप में साथ रहेंगे। उसने अपने पाँचों पुत्रों को यही सिखाया है।

इसलिए वनवास में अपने वैभव का प्रदर्शन कर पांडवों को नीचा दिखाकर खिजाने के लिए दुर्योधन अपनी समस्त सेना लेकर वन में गया। पांडवों की निर्धनता का उपहास करने गया किंतु स्वयं फँस गए चित्ररथ गंधर्व के जाल में। जलक्रिडा करते गंधर्वस्त्रियों के परिहास से क्रुद्ध गंधर्व ने कौरवों को ललकारा और बंदी बना लिया। युधिष्ठिर के पास जब समाचार पहुँचा तब उसने भीम और अर्जुन को कहा कि जाकर अपने बंधुओं को छुड़ाएँ। दोनों अपने ज्येष्ठ बंधु पर कुपित हुए। आपकी इस सज्जनता से ही हम अपना सर्वस्व और स्वातंत्र्य भी हार गए और इस दयनीय स्थिति में पहुँचे हैं। आप समझते ही नहीं है कि वे हमारे शत्रु हैं। भीमार्जुन भी भ्रम में हैं कि शत्रु कौन है? हम सबका भी ऐसा ही है। हम अपने शत्रु को पहचान नहीं पाते। हर विरोधी शत्रु नहीं होता। राजनीतिक कारणों से विरोध करनेवाले सदा शत्रुही होंगे ऐसा आवश्यक नहीं है। आपसे उनका मत विरोधी हो सकता है किंतु इससे वे शत्रु नहीं हो जाते। आजकल राजनीतिक क्षेत्र में अत्यंत कटुता आ गई है। विरोध और शत्रुता का भेद मिटता जा रहा है। सदा ऐसा नहीं था। मतभेद होने पर भी मनभेद होते नहीं थे। दत्तोपंत ठेंगडी जी श्रमिक नेता और राज्यसभा सदस्य थे। साम्यवादियों से वैचारिक संघर्ष चलता था किंतु व्यक्तिगत मित्रता भी थी। विचार विरोधी होना शत्रुता नहीं थी। एकनाथ जी रानडे जी ने सभी दलों के सांसदों से सहमति और हस्ताक्षर ले कर कन्याकुमारी में विवेकानंद शिला स्मारक के निर्माण की अनुमति प्राप्त की थी।

भीम और अर्जुन भ्रमित हैं। वे सोचते हैं कि अच्छा हुआ कि दुर्योधन का अपमान हुआ। उसने द्रौपदी को कैसे अपमानित किया था और हम सबको निकाल दिया। आज ठीक फंसा। तब धर्मराज युधिष्ठिर ने मंत्र दिया – वयं पंचाधिकं शतं – हम एकसौ पाँच हैं। परस्परं विग्रहेतु – आपस में विरोध हो तब, वयं पंच – हम पाँच, च ते शतं – और वे सौ। किंतु परेस्तु विग्रहे प्राप्ते – औरों से लड़ाई होने पर, वयं पंचाधिकं शतं – हम एक सौ पाँच हैं। इसलिए आप जाकर सहयोग करों और उन्हें मुक्त करो। धृतराष्ट्र पंचाधिकं शतं नहीं जानते इसलिए मामका- पाण्डवा , मेरे सौ पुत्र और पांडु के पाँच ऐसा भेद कर रहा है। अयं-निज, मेरा-तेरा ही महाभारत की जड़ है। इस प्रकार गीता का प्रारम्भ भेदबुद्धि से होता है। फिर युद्धभूमि और दोनों ओर के वीरों का वर्णन और तत्पश्चात अर्जुन का विषाद।

बिना अर्जुन बनें भगवद्गीता नहीं समझ सकते। गीता को समझने के लिए अर्जुन बनना आवश्यक है श्रीकृष्ण नहीं बनना। ऐसा प्रयास भी नहीं करना। कृष्ण होने का नाटक करना भी दुष्कर है। इसलिए जहां से प्रवचन होता है उसे व्यासपीठ कहते है कृष्णपीठ नहीं। गीता की व्याख्या करनेवाला, प्रवचन करनेवाला कृष्ण के भाव में नहीं है, वह भी केवल व्यास की कृपा से यह कर पाता है। गीता को समझने के लिए अर्जुन बनना होगा। वह गुड़ाकेश है। उसने नींद को जीत लिया है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह सोता ही नहीं है। जब चाहे तब सो सकता है और जब चाहे तब जितना चाहे उतना जाग सकता है। इसे निद्रा पर विजय कहते हैं। आज आधा विश्व निद्रानाश से त्रस्त है। सोना चाहते है किंतु नींद नहीं आती। अमेरिका में नींद की गोलियों का औसत भोग प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 18 गोलियाँ है। गुड़ाकेश केवल सोने की क्षमता नहीं है जितना चाहे उतना बिना सोए रहना भी गुड़ाकेश है।

महामारी में अनेक सेवावीरों ने कई रातें जागकर रुग्णसेवा की। किसी डाक्टर या परिचरिका के पुत्र ने अपनी माँ के बारे में ट्वीट किया था कि उन्होंने लगातार 40 घंटे बिना सोए दायित्वनिर्वहन किया। हमारे सेना के जवानों को भी अनेक बार ऐसा संयम दिखाना पड़ता है कई रातें बिना सोए सजग रहकर शत्रु को देखना होता है। कारगिल युद्ध में कई बार हमारे वीर सामने शत्रु के डेरे को देख रहे होते थे। किंतु आदेश और पर्याप्त संबल की प्रतीक्षा में सबकुछ रोककर बैठना पड़ा। तब वे सब वीर गुड़ाकेश ही थे। यह संयम का युद्ध है। महामारी में देश ने यही युद्ध लड़ा। कई बार लड़ना, शस्त्र चलाना ही युद्ध नहीं होता। शस्त्र रोकना भी युद्ध होता है। कैसे लड़ना इससे महत्वपूर्ण है कब लड़ना और कभी कभी कब ना लड़ना। गीता हमें यह संयम सिखाती है।

ऐसा पराक्रमी अर्जुन है। वह कोई सामान्य योद्धा नहीं है। महारथी है। वैसे भी विषाद किसी दुर्बल लल्लू को नहीं आता। विषादग्रस्त होने के लिए भी वीर होना सक्षम होना आवश्यक है।तभी निर्णय की दुविधा होती है। इसलिए अर्जुन के भाव में जाने के लिए प्रथम अध्याय है। अर्जुन बनेंगे तभी गीता समझेंगे। उसके लिए पराक्रम भी चाहिए और बुद्धि भी, साथ ही अध्ययन भी। अर्जुन केवल पराक्रमी ही नहीं है। इस अध्याय में उसके द्वारा दिए तर्क बताते है कि वह अध्येता भी है। जितना शस्त्र प्रवीण है उतना ही शास्त्रनिपुण भी है। श्रुति, स्मृति, पुराण सब पढ़े है इसलिए वह सबके संदर्भ भी दे रहा है। क्योंकि वह योद्धा भी है और विद्वान भी। वह केवल पलायन नहीं कर रहा है उसका समर्थन भी कर रहा है।

पलायन का कारण क्या है। वही ममत्व जहां से गीता का प्रारंभ हुआ। धृतराष्ट्र का मामकाः जब अर्जुन में प्रवेश कर गया तब वह पलायन को उद्युक्त हुआ। स्वजन बोध से मोह हुआ। जिन्हें मै शत्रु मानकर युद्ध करने आया हूँ वे तो सब मेरे सम्बन्धी है। आचार्यान् मातूलान् भातृन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा – आचार्यगण, मामा, भाई, पुत्र और पोते तथा मित्र। श्यालाः सम्बन्धीनस्तथा – पत्नी का भाई और अन्य रिश्तेदार। यह सब मेरे सम्बन्धी है इनसे कैसे लडु? दूसरे अध्याय में भी कहेगा ये भीष्म और द्रोण ऐसे हैं – पूजार्हा – पूजनीय उन्हें तुम बाण मारने को कह रहे हो – ईषुभिः प्रतियोत्स्यामि। ऐसे शब्दों में वह पलायन कर रहा है। रथोपस्थ – रथ के पीछे भाग में – उपाविशत् – बैठ गया। न योत्स इति गोविंदम् उक्त्वा – युद्ध नहीं करूँगा ऐसे श्री कृष्ण को कह कर बैठ गया।

हमारे साथ भी दुविधा और किमकर्तव्यविमुढता तभी आती है जब हम ममत्व में फँसते हैं। क्या अपना है मामकाः क्या है वह समझ नहीं पाते। स्वधर्म के लिए स्व का निर्धारण करना पड़ता है। स्व क्या है समझने पर ही स्वदेशी भी समझ सकते हैं। चीन का दूरभाष लेकर मेरा मेरा करेंगे तो क्या अपना और क्या शत्रु का समझ नहीं सकेंगे। सस्ते के चक्कर में देश भी द्रोह करेंगे और स्वयं की भी हानि कर बैठेंगे। यह भस्मासुर के समान है। महामारी के समय अमेरिका दुविधा में है। सारा उत्पादन चीन में होता है। अमेरिकी कम्पनियों का भी उत्पादन चीन में ही हो रहा है। वुहान विषाणु के प्रकोप के बाद जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने चीन के बहिष्कार का आह्वान किया तब इन कम्पनियों ने उलट मत बनाने के लिए प्रभाव डालना प्रारंभ किया। स्व को जाने बिना स्वधर्म, स्वदेशी और स्वराज्य नहीं समझ सकते। स्वाध्याय भी नहीं समझ सकते है। भगवद्गीता स्वधर्म का निर्धारण करने के लिए है। उस हेतु स्व को परिभाषित करना होगा। अर्जुन स्व में ही भ्रमित है इसलिए स्वजन की परिभाषा में भी मोहित हो रहा है। जो उसके धर्म के अनुसार उसके अपने नहीं है उन्हें केवल रक्तसम्बंध से स्व-जन मान रहा है। उन्होंने ने अपना पक्ष तय किया है। अर्जुन के विरुद्ध निर्णायक युद्ध लड़ने का निर्णय सोच समझकर लिया है। तब वे उसके अपने कैसे हो सकते हैं? इस पृष्ठभूमि में गीता हमें स्वधर्म का ज्ञान देती है।

हमें यदि गीता को समझना है तो अर्जुन की भूमिका में जाना होगा। ग्यारहवे दिन स्मरण कथा में गीता प्रारंभ हुई है। उसे समझने के लिए यह स्वाध्याय है। अर्जुन का विषाद और प्रश्न गीता का निमित्त है। दूसरे अध्याय के सातवें श्लोक में अर्जुन पूछता है – यत् श्रेयस्यात् निश्चितं ब्रूही तन्मे – जो मेरे लिए श्रेयस्कर है वह तय करके मुझे बताइए। क्यों? कार्पण्य दोषो पहत स्वभावः – कृपणता – छोटेपन और संकीर्णता से मैं भयभीत हूँ। मै मेरे लिए क्या योग्य है नहीं तय कर पा रहा हूँ। अपने धर्म- कर्तव्य के प्रति भ्रमित हूँ। पहले ही कृष्ण उत्तर नहीं देते। जब तक शिष्यत्व नहीं लेते तब तक अर्जुन नहीं बनते। अतः इसी सातवें श्लोक में वह कहता है – शिष्यस्तेऽहम शाधि माम त्वाम प्रपन्नं – मै तुम्हारा शिष्य हूँ मुझे बचा लो। आइए हम सब श्रीकृष्ण का शिष्यत्व ग्रहण करें और स्व-अध्याय – स्वाध्याय करें।

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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