सामन्यतः मन के रूप में सम्बोधित अन्तःकरण में चार करण (instruments) आते है -मन, बुद्धि, चित्त और अहं। जब हम मानसिक स्तर की बात करते है तब इन चारों को एक साथ संदर्भित कर रहे होते हैं। सामान्य बोलचाल में मन के चंचल होने जैसी बात हो अथवा योगशास्त्र में चित्त की वृत्तियों का निरोध करने की बात हो वास्तव में अन्तःकरण के विषय में ही चर्चा हो रही होती है। गीता में छठे इंद्रिय के रूप में वर्णित एक ही आंतरिक व्यवस्था के कार्य के अनुसार चार सम्बोधन हैं। जैसे पंच ज्ञानेंद्रियाँ और पंच कर्मेंद्रियाँ बाह्य करण है। वैसे ही यह चार अन्तःकरण हैं। इनका परस्पर अनन्याश्रय सम्बन्ध भी है मन के अधिष्ठान के बिना बाह्य इंद्रिय कार्य नहीं कर सकती।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥ भ गी 15.9॥
अधिचित्त शिक्षा की चित्तशुद्धि में चारों स्तरों पर शोधन अपेक्षित है। मन का कार्य है ग्रहण करना। इसके संकल्प-विकल्प से ही इंद्रियों द्वारा बाह्य जगत से संपर्क होता है। संकल्प शुद्धि के लिए मन को एकाग्र करना आवश्यक है। यह शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। स्वामी विवेकानंद तो यहाँ तक कहते हैं कि एकाग्रता ही शिक्षा है। एक बार छात्र मन एकाग्र करना सीख गया तो बाकि विषयों का अध्ययन तो स्वतः ही लीलया कर लेगा। बुद्धि तुलना तथा संश्लेषण-विश्लेषण का कार्य करती है। उसकी शुद्धि विवेक से होती है। वह आगामी स्तर अधिप्रज्ञ का विषय है। भावशुद्धि से हुई कर्मशुद्धि चित्त अर्थात् संस्कारों के भंडार को शुद्ध करती है। जिसकी व्याख्या चतुर्थ दिन के लेख में की गई।
अहं का विशोधन दो दिशाओं में हो सकता है। विलोपन द्वारा अहं को शून्य करना एक साधना प्रकार है। किंतु जब हम शिक्षा के अधिचित्त स्तर की बात कर रहे है तब अहं की शुद्धि विस्तार से ही होगी। इसीलिए अधिचित्त शिक्षा में ‘मै से हम’ की ओर ले जाने का सहज अप्रत्यक्ष उपाय किया जाता है। इस स्तर अर्थात् वर्तमान शिक्षा की कक्षा 3-5 में 8-11 वर्ष संस्कारक्षम आयु होती है। अतः इसी समय व्यक्ति को परिवार, समाज से क्रमशः राष्ट्र की ओर विस्तारित किया जा सकता है। विषय के पाठों के साथ ही खेल, गीत आदि रोचक गतिविधियों से यह सहज संभव है।

नवरात्रि की पंचमी की देवता स्कंदमाता हैं। देवताओं के सेनापति स्कंद की माता पार्वती ही है। तारकासुर के ताप से बचने के लिए देवताओं को चिर युवा सेनापति की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से शिव- पार्वती विवाह संपन्न कराया गया। प्रयास में कामदेव भी भस्म हुए। उसके बाद शिव-पार्वती एकनिष्ठा से रति में रममाण हो गए। काम के प्रभाव में काम का मूल उद्देश्य ही विस्मरण हो गया। तब कपोत रूप में अग्नि देव को स्मरण कराने भेजा गया। उनके द्वारा भी शिववीर्य के ताप को धारण नहीं किया जा सका तब माता गंगा द्वारा प्रवाहित यह वीर्य शरवण वन में छः भागों में अवतरित हुआ। कृतिकाओं द्वारा पालित होने से यह कार्तिकेय कहलाया। नारद द्वारा सूचना प्राप्त होने पर शिव-पार्वती कृतिका लोक गए। माँ के स्नेह से छः शिशु एक हो गए। भुजायें तो दो ही बनी किंतु मुख छः थे इसलिए उस रूप में ये षण्मुग कहलाए।

स्कंद नाम से ही देवताओं का सेनापतित्व किया। अतः माता पार्वती के इस रूप को स्कंदमाता कहा है। यह स्वरूप स्नेह और शांति के साथ ही अनुशासक का भी रूप है। चार भुजाओं में से दो में समृद्धि का प्रतीक पद्म अर्थात् कमल है। एक हाथ अभय मुद्रा में भक्तों को भयमुक्त करता है। चतुर्थ भुजा से माता ने षण्मुग शिशु को सम्हाला है। सिंहवाहिनी स्कंदमाता के तीन नेत्र उनके अनुशासक भूमिका को भी स्पष्ट करते है। इसी कारण पुराणों में माता की उपासना पूर्ण एकाग्रता और निष्ठा से करने पर बल दिया है। यह मन के परिष्कार का साधन है। उसी प्रकार कुमार, मुरगन आदि अनेक नामों से विख्यात स्कंद के छः मुख उनके विस्तारित होते परिचय का प्रतीक है। यह भाव विस्तार ही तो अहं के शुद्धिकरण का मार्ग है।

देवी स्कंदमाता की उपासना मन के संकल्पों को शिवमय अर्थात् कल्याणकारी, चिरयुवा सेनापति की शिशु उपस्थिति से स्नेहसिक्त संगठन, तृतीय नेत्र से अनुशासन तथा अहं के विस्तरण का संदेश देती है। यही अधिचित्त शिक्षा का स्वरूप पूरे समाज राष्ट्र को ही नहीं अखिल विश्व को ही अभय प्रदान करता है।
