महिषासुर के साथ ही माता दुर्गा ने और अनेक असुरों का भी मर्दन किया है। इसमें शुम्भ और निशुंभ ये दो बंधु सबसे अधिक बलशाली थे। पुष्कर तीर्थ में किए प्रचंड तप के फलस्वरूप प्राप्त ब्रह्माजी के वरदान से ना तो कोई मनुष्य अथवा पशु उन्हें मार सकता था। इस वरदान से स्वयं को अमर मान वे अत्यधिक अभिमानी और उद्दंड हो गए। इंद्र को परास्त कर उनके आसन पर विराजमान होने के बाद माता दुर्गा के सौंदर्य का वर्णन सुन उनसे विवाह के लिए प्रस्ताव भेज दिया। नकार मिलने पर असुर धूम्रलोचन के साथ साठ सहस्र असुरसेना को देवी का हरण करने भेजा। माँ ने करुणापूर्वक सबको मुक्ति प्रदान की। उसके बाद चंड- मुंड ने आक्रमण किया। उनका संहार कर माता ने चामुंडा नामाभिधान धारण किया। इनके बाद शुम्भ-निशुम्भ स्वयं युद्ध के लिए आए। इनकी सेना में एक विचित्र दानव था रक्तबीज। इसके रक्त की बूँद भूमि पर गिरते ही उसमें से दैत्य उत्पन्न हो जाते थे। रक्तबीज के संहार के लिए माँ दुर्गा ने काली को अवतरित किया।

यही कालरात्रि सप्तमी नवरात्रि की आराध्या है। अत्यंत उग्ररूप लिए काली क्रूरता से दैत्यों का संहार करती है और उनके मुंड की माला धारण करती है। रक्तबीज का संहार करते समय उसका रक्त भूमि पर गिरे उससे पूर्व ही खप्पर में धारण कर पी जाती है। इस प्रकार रक्तबीज का संहार होता है। बाद में माता दुर्गा शुम्भ-निशुम्भ का मर्दन करती है और विश्व में शांति स्थापित होती है।
यह सारा मानव जीवन का ही वर्णन है। मन में सतत जन्म लेते इन दानवों का ठीक से संहार करने के लिए मनुष्य को तत्पर करना शिक्षा का उद्देश्य है। शुम्भ अभिमान का और निशुम्भ उससे उत्पन्न उद्दंडता का प्रतीक है। इनकी सेना में कपटी धूम्रलोचन है। जो आँख में धुँए के समान भ्रम उत्पन्न कर मनुष्य को अपने लक्ष्य से दूर करते है। चंड और मुंड दंभ और अति आहार के प्रतीक हैं। जो है उससे अधिक का प्रदर्शन दम्भ और सतत बुभक्षु के समान सभी इंद्रियों से अतृप्त भोग का प्रतीक खुले मुखवाला मुंड हैं। इन सबका संहार शिक्षा में आवश्यक है। अभिमान, उद्दंडता के स्थान पर विनय, कपट के स्थान पर ऋजुता (सरलता), दम्भ के स्थान पर निष्ठा और अति आहार के स्थान पर संयम ही मनुष्य जीवन को शांति की ओर ले जाता है।
इस सतत चल रहे देवासुर युद्ध में सबसे बड़ी बाधा है रक्तबीज। एक को मारो तो उसके रक्त से सैंकड़ों उत्पन्न होते है। हमारे मन में दुर्गुण भी ऐसे ही होते है। जैसे हम सोचते है कि इनपर विजय पा ली वैसे ही ये फिर सिर उठा लेते हैं। मन को नीचे जाने के लिए प्रयत्न नहीं करने पड़ते हैं। पतन अपनेआप होता है। किसी को भी किसी भी कक्षा के पाठ्यक्रम में अपशब्द बोलना नहीं सिखाया जाता किंतु बिना किसी प्रयास के अनेक अपशब्द अपनी शब्दावली का अंग बन जाते हैं। अर्थहीन फ़िल्मी गाने बिना यत्न के स्मरण में रहते है और बार बार रटने के बाद भी श्लोक और सूत्र विस्मृत हो जाते हैं। ये रक्तबीज की सेना है। खप्परवाली के खप्पर में इनका रक्त एकत्रित कर प्राशन करने से ही समूल नाश सम्भव है।
कालरात्रि का उग्र रूप हमें बताता है कि अपने अंदर के दानवों को निष्ठुर क्रूरता से मारना होता है। स्नेह से धीरे धीरे ये नष्ट नहीं होते। बार बार उत्पन्न होते हैं। आलस जैसे स्थायी और व्यसन जैसे भयावह राक्षसों का मर्दन काली ही करेगी। जिसके हाथ में तलवार और खप्पर है और दूसरे से सुरों को अभय दे रही हैं। गर्दभ को वाहन के रूप में प्रयोग करना भी शिक्षा शास्त्र का ही मंत्र है। अनुशासन से गर्दभ को भी सही कार्य का साधन बनाया जा सकता है। अपने द्वारा संहारित दुर्गुणों का स्मरण रखना आवश्यक है ताकि वे फिर उठ ना खड़े हो इसलिए मुंडमाल धारण की है।
अधिशील से अधिप्रज्ञ तक की शिक्षा में यह सूत्र समान है। शोधन करते समय ही लगातार मैल भी एकत्रित होता रहता है। कोई निश्चित नहीं कह सकता कि सब मैल हटा दिया। अभी स्वच्छता करो और त्वरित कचरा आ जाता है। इसलिए सतत कठोर अनुशासन भी आवश्यक है। कालरात्रि की साधना स्वयं के प्रति कठोरता की साधना है। शिक्षा में भी यह सातत्य, अनुशासन और जड़ से निर्मूलन की विधि अनिवार्य है।

सारगर्भित विचार
सारगर्भित कथा का अर्थ सुंदर रूप से वर्णित। धन्यवाद