विद्या ददाति विनयम्

Mukul Kanitkar 6 मिनट का पठन

कार्यकर्ता चालीसा 2

विनम्रता कार्यकर्ता का वह गुण है जो उसे सदैव आगे बढ़ाता है। कार्य के विस्तार हेतु सम्पर्क में विनम्रता से लाभ मिलता ही है, साथ ही अपने आप को निरन्तर विकसित करने हेतु नव-नवीन ज्ञान अर्जित करने में भी विनम्रता आवश्यक है। माननीय एकनाथ रानडे जी ‘सेवा ही साधना’ में कहते हैं कि कार्यकर्ता को अपनी समस्त क्षमताओं को संगठन के हित में समर्पित करना है। यदि क्षमता नहीं है तो उसे अर्जित कर फिर उसे समर्पित करना है। यदि कार्यकर्ता अपने आप को प्रशिक्षित समझने लगता है तो फिर सीखने की प्रक्रिया रुक जाती है। फिर उसे लगने लगता है कि वह तो सब जानता है। सजगता कम हो जाने से उसी कार्य अथवा संकल्पना के सूक्ष्म बिन्दुओं को आत्मसात करना बन्द हो जाता है। फिर कार्यक्रमों में रुचि भी कम होने लगती है। हम अक्सर देखते हैं कि वरिष्ठ कार्यकर्ता बौद्धिकों, व्याख्यानों आदि के समय बाहर बैठ जाते हैं। उन्हें लगता ही नहीं कि उनके लिए भी कुछ नया सीखने के लिए हो सकता है।

            आदर्श कार्यकर्ता सदैव सीखता रहता है। वह जानता है पूर्णता के लिए सदैव आगे बढ़ते रहना है। इसलिए उसे विनम्र होना पड़ता है। अपनी अपूर्णता का भाव रखते हुए प्रार्थना करनी होती है। यही बात गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा के प्रार्थना-पूर्व दोहे में कही है –

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमीरौं पवन कुमार।

बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस विकार।।

अपनी अपूर्णता का भाव रख कर प्रार्थना करते हुए क्या माँग रहे हैं? क्लेश व विकार हरने की प्रार्थना है किन्तु माध्यम क्या है? क्या हम केवल कृपा के रूप में यह चाहते हैं? नहीं। अपने विकार व क्लेश हटाने के लिए हम प्रार्थना कर रहे हैं कि हे पवनसुत! हमें बल, बुद्धि व विद्या दें जिसके सहारे हम अपने विकार मिटा, क्लेश-रहित जीवन जी सकें। विकार स्वयं की त्रुटि के कारण होते हैं। क्लेश के कारण बाहरी तत्व होते हैं। परिस्थिति पर नियंत्रण ना होना क्लेश का प्रमुख कारक होता। विकार मनःस्थिति से होते हैं। अतः प्रार्थना मनःस्थिति और परिस्थिति दोनों में अनुकूलता के लिए की गई है। किंतु गोस्वामी तुलसीदास जी की महानता यह है कि वे प्रतिकूलता दूर करने हेतु केवल कृपा का अनुरोध नहीं कर रहे हैं। इन्हें अनुकूल बनाने के लिए आवश्यक क्षमता के विकास का आशीर्वाद माँग रहे हैं; बल, बुद्धि और विद्या से विकार और क्लेश पर मात पाने का आशीष।

कार्यकर्ता को अपनी क्षमता बढ़ाने हेतु शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बल आवश्यक है। शारीरिक बल में शक्ति (Power), तितिक्षा (Stamina) और चपलता (Dexterity) तीनों आते हैं। हनुमान जी इन तीनों के आदर्श हैं। इसीलिए इसकी प्रार्थना उनसे ही उचित है। उपासना का आधार है कि आराध्य का अनुसरण करें। बजरंगबली की प्रेरणा से कार्यकर्ता को इन तीनों शक्तियों की प्राप्ति हेतु साधना करनी चाहिए। बलोपासना व्यक्ति-निर्माण का प्रथम चरण है। मनोबल भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी के आधार पर असंभव कार्य भी संभव होने लगते हैं। इन्द्रियों के प्रयोग में कौशल के साथ ही इच्छाशक्ति का विकास मानसिक बल का आधार है। हनुमान जी का जीवन इसका साक्षात् उदाहरण है इसीलिए उनसे ही प्रार्थना की जा रही है। भावनात्मक उदात्तीकरण भी कार्यकर्ता के लिए अनिवार्य है। संगठन का कार्य अकेले नहीं किया जाता, चमू (Team) में होता है। इसलिए साथी कार्यकर्ताओं से आत्मीय संबंध कार्य के प्रभाव हेतु आवश्यक है। संबंध निर्वाह करने की क्षमता ही भावनात्मक बल है। गोस्वामी जी यही प्रार्थना कर रहे हैं।

बुद्धि का कार्य है तुलना कर विश्लेषण के द्वारा उचित निष्कर्ष पर पहुँचना। निष्कर्ष से प्राप्त जानकारी के आधार पर जीवन की दिशा तय करने हेतु परिमाण (Scale) विवेक प्रदान करता है। अतः बुद्धि विवेक के आधार पर ही निर्णय लेती है। हनुमान जी की भक्ति से बौद्धिक विकास होता है। सूक्ष्म और समग्र विश्लेषण की क्षमता बढ़ने के साथ ही विवेक का स्तर भी क्रमशः उन्नत होता है। पशु केवल भय-अभय के आधार पर निर्णय करता है। विकसित होने पर मनुष्य में हित-अहित, लाभ-हानि, न्याय-अन्याय से धर्म-अधर्म विवेक जीवन में चयन का आधार बनते हैं। प्रचलित आख्यायिका में हनुमान जी माता सीता द्वारा उपहार में प्रदत्त मोतियों की अमूल्य माला को तोड़ देते हैं और कहते हैं, “जिसमें राम नहीं उसका काम नहीं।” राम ही हनुमान के जीवन का केंद्र हैं। यह विवेक का सर्वाधिक उन्नत स्वरूप है — नित्यानित्य विवेक अथवा सत्-असत् विवेक। इसके आधार पर व्यक्ति ईश्वर और नश्वर के मध्य भेद कर उचित मार्ग का चयन करता है। संगठन के कार्य में विनम्र कार्यकर्ता के लिए यह विवेक सहज हो जाता है। ‘सूचना के बाद सोचना नहीं’ के मंत्र से नश्वर का त्याग सहज हो जाता है। प्राथमिकता (Priority) और वरीयता (Importance) का निर्धारण सहज हो जाता है। 

इससे भी अधिक अपने कार्य को कुशलता से करने के लिए विद्या अत्यावश्यक है; विद्या अर्थात् आवश्यक ज्ञान। कार्यकर्ता को ज्ञानप्राप्ति के लिए सदैव तत्पर होना चाहिए। हर अवसर, हर परिचय, संपर्क, प्रसंग, आयोजन, प्रतिरोध और संकट सभी सीखने के लिए प्रचंड संभावना प्रदान करते हैं। इनमें से केवल व्यावहारिक सीख लेने के स्थान पर उसमें अंतर्निहित संकल्पना का साक्षात्कार करना विद्या है। ‘विद्’ धातु का अर्थ है जानना। उसकी प्रक्रिया को विद्या कहते हैं। कोई भी व्यक्ति, घटना अथवा अनुभव हमें ज्ञान देने में सक्षम होता है। हनुमान जी से प्रार्थना है कि प्रत्येक कार्यकर्ता में यह जिज्ञासा जागृत हो कि उसका कार्य ज्ञान की प्रक्रिया अर्थात् विद्या बन सकें। 

हनुमान चालीसा केवल पवनपुत्र के गुणों का वर्णन कर उन्हें प्रसन्न करने के लिए नहीं है। इसकी रचना के पीछे कवि का प्रयोजन इस श्लोक में स्पष्ट है। पाठ करनेवाले साधक का हेतु अथवा उद्देश्य भी इसी सीध में हो तो परिणाम सुखद होगा। कार्यकर्ता के जीवन में परिपूर्णता हेतु पवनसुत हनुमान से अधिक परिपूर्ण व्यक्तित्व किसका होगा जिनसे यह समग्र प्रार्थना की जाएँ।

ॐ हनुमते नमः

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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