मधु-कैटभ मर्दिनी की पूजा

Mukul Kanitkar 5 मिनट का पठन

विचार नवरात्रि – 1

असुर का अर्थ है जिसका सुर नहीं मिलता। विघटन ही जिसका स्वभाव हो जाता है वह असुर है। सुर मिलाने के लिए एकत्व की अनुभूति के साथ साम्य का दर्शन आवश्यक होता है। असुर की दृष्टि भेद-दृष्टि होती है। स्वार्थ, लोभ और कई बार केवल मिथ्या अहंकार के कारण विभेद और द्वेष ही जीवन का केंद्र बन जाता है तब ऋषिकुल में जन्मा, सुविज्ञ, समर्थ और अद्वितीय भक्त भी राक्षस बन जाता है। असुर अधिकतर पराक्रमी होते हैं। वैज्ञानिक और तकनीकी रूप में भी अधिक प्रगत होते हैं। जीवन दृष्टि में एकत्व, साधन की शुचिता और ध्येय में लोक कल्याण इन तीनों स्वाभाविक धर्मों का अभाव होने के कारण सारी योग्यता और सामर्थ्य विनाश का कारण बनता हैं। जब असुर शक्ति इतनी प्रबल हो जाए कि उनके नियमन, नियंत्रण और निर्दलन के सामान्य उपाय निरर्थक हो जाते हैं और कल्याण के उद्देश्य से त्याग के लिए सदा उद्युत प्रकृति की शुद्ध शक्तियाँ देवता अकेले और सामूहिक रूप से भी असहाय होते हैं तब विशेष दुर्गट (अतिशय कठिन) उपाय करने पड़ते हैं। सभी की शक्तियों के सात्मीकरण द्वारा दुर्गा को अवतरित होना पड़ता है। इस दुष्ट संहार के लक्ष्य से शक्ति समन्वय से सृजन का उत्सव है नवरात्रि।

यह केवल किसी ऐतिहासिक घटना का स्मरण मात्र नहीं है। यह सृष्टि में सतत होनेवाली प्रक्रिया है। इसीलिए नवरात्रि उत्सव नैमित्तिक सघन साधना का व्यक्तिगत और सामाजिक पर्व है। ऋतु परिवर्तन के समय शक्तियों के समन्वय हेतु प्रकृति यह सृजन साधना करती है। ऋषियों ने उसी के तादात्म्य में वर्ष में दो बार प्रगट शारदीय और वसंत नवरात्रि के साथ ही अधिक सूक्ष्म उद्देश्यों की पूर्ति हेतु गुप्त नवरात्रियों का नियोजन अनादि काल से किया है। युगानुकूल परिवर्तन और नव परंपराओं के साथ यह पर्व सामूहिक साधना का उत्सव आज भी बना है। सारा समाज, मेले, रामलीला मंचन, यजन, मातृपूजन के माध्यम से अपने उत्साह, उद्यम और उन्मेष की अभिव्यक्ति करता है। आवश्यकता के अनुसार ज्ञान यज्ञ और धर्मसभाओं का आयोजन भी समय-समय पर होता रहा है। शारीरिक स्तर पर कला, भावनात्मक स्तर पर भजन-पूजन, मानसिक स्तर पर योग और तंत्र की साधनाएँ, आध्यात्मिक स्तर पर ध्यान-जप आदि साधन तो बहु प्रचलित है। वैचारिक स्तर पर स्वाध्याय, वाक्यार्थ तथा शास्त्रार्थ की परंपरा संघर्ष काल में थोड़ी क्षीण हो रही है। यह लेखन प्रपंच उसी विचार नवरात्रि का विनम्र प्रयास मात्र है। वर्तमान युग में विश्व के सभी संघर्ष, संयोजन और सकारात्मक उपक्रम भी विचार के स्तर पर अधिक प्रभावी हो रहे हैं।

विश्व की मानवद्रोही, विघटनकारी, विघ्नसंतोषी ताकतें पृथक-पृथक अथवा संगठित रूप से विचार, प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में पारितंत्र (Ecosystem) बनाकर कार्यरत हैं। ऐसे में समाज की सज्जन शक्ति को भी नवरात्रि के मर्म से प्रेरणा लेकर शक्ति संचयन की साधना से माता का पूजन कर विघटनकारी आसुरी बलों, प्रवृत्तियों तथा गतिविधियों का निर्मूलन कर लोक कल्याण को प्रशस्त करना होता है। यही इस उत्सव का मूल लक्ष्य है। सभी देवताओं ने अपनी विशिष्ट शक्तियों का दान दिया और उनके एकात्म स्वरूप में देवी प्रगट हुई। यह संगठन ही दुर्गा माता के सार्थक और सटीक जीवन का रहस्य है। सुव्यवस्थित और सुदर्शन पथ संचलन (Route March) के समान ही शक्ति साधना में सभी का सुवेष (Dressing), सत्दिशा (Direction), सम्यक् (Discipline) अनिवार्य होते हैं।

जैसा विरोधी वैसा रूप धारण कर माँ ने असुर संहार कर मानवता की रक्षा की। अनियंत्रित भोग की महिष रूप आसुरी शक्ति को लक्ष्य प्रेरित पुरुष सिंह की सवारी कर क्रिया, ज्ञान और इच्छा शक्ति के संगठित शस्त्र त्रिशूल से नष्ट किया। चंड-मुण्ड के लिए रणचण्डी बनी माँ रक्तबीज के रक्त को भूमि पर गिरकर नवरूप लेने से पूर्व प्राशन करने हेतु खप्परवाली काली का भयंकर रूप धारण करती है। देवसेनापति की आवश्यकता पड़ने पर मातृत्व का आदर्श स्कन्दमाता बनती है। ध्येय और प्रसंग की आवश्यकता के अनुरूप कार्य करने की प्रेरणा माता के यजन का प्रमुख अंग है।

माँ ने संहार किए समस्त असुरों में मधु-कैटभ प्रस्तुत विचार नवरात्रि के प्रसंग में उल्लेखनीय है। कथा के अनुसार इनका जन्म कान के मैल से हुआ है। नाम भी वैचारिक द्वंद्व के प्रतीक हैं। मधु अर्थात् सुखद, प्रिय और आकर्षक और कैटभ अर्थात् कटु का संकेत अवांच्छित, दुखकारक और तिरस्करणीय से है। श्रवण में इन दोनों प्रकार के विषय आते हैं। प्रिय-अप्रिय, सुखद-दुखद, भावात्मक-अभावात्मक, साधक-बाधक, योजक-विभाजक सभी प्रकार की द्वंद्वात्मक सूचनाओं का लगातार वर्षाव होता रहता है। तकनीक की प्रगति के साथ ही इसकी गुणवत्ता, प्रसार और गति में प्रचंड वृद्धि हुई है। मिथ्या और तथ्य के मध्य की सीमारेखा धूसर की जा रही है। स्वार्थ केंद्रित सामग्री के सतत प्रसारण से एकांकी दृश्य को सत्य के रूप में प्रस्थापित और प्रचारित किया जा रहा है। आपसी विरोधों के होते हुए भी सज्जन शक्ति के विरोध में गठबंधन कर व्यवस्था, तकनीक और संचार के पारितंत्र का समन्वित प्रयोग हो रहा है। अर्थात् मधु-कैटभ अपनी संपूर्ण संहारक शक्ति और सेना के साथ विश्व की विधायी, रचनात्मक सज्जन शक्ति पर आक्रमण कर रहे हैं। आज माध्यम, कला और शैक्षिक जगत रणभूमि बनें हैं,विचार विस्फोटक भंडार है, प्रस्तुति और सामग्री उसके शस्त्रास्त्र। ऐसे युद्ध में माँ की पूजा अध्ययन, विवेक, विमर्श और संचार की सामग्री से ही की जा सकती है।

इस नवरात्रि उत्तरापथ की संकल्प यात्रा में इस विचार यजन पर स्वाध्याय करते हैं। एकात्म और समग्र भाव की सामयिक प्रस्तुति तथा विघटनकारी बलों का अध्ययन पूर्ण अनावरण और तर्कपूर्ण विरोध के साथ ही तात्कालिक घटनाओं और विमर्शों पर शीघ्र हस्तक्षेप इन सभी पर क्रमशः विचार करेंगे क्योंकि मधु-कैटभ मर्दिनीमाता की पूजा की यही विधि है।

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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22 Comments

  1. बहुत सुंदर लेख,
    उत्तरापथ की इस संकल्प यात्रा में अगले लेख का इंतजार रहेगा ।
    शुभ नवरात्रि भैया ।

  2. अति ज्ञान वर्धक लेख, गहन अध्ययन करने के पश्चात ही यह ज्ञान संभव है

  3. वाह, सुंदर व्याख्या, ऐसा ही पढ़ने को मिलता रहे

  4. बहुत जानकारी मिली पढ़कर लेकिन कुछ बातों की जानकारी और चाहिए जैसे कि कान के मैल से राक्षस की उत्पत्ति कैसे सम्भव है इसके पीछे का आधार कृपया समझाएं

    • मूल संदर्भ को ध्यान से पढ़ेंगे तो दो बातें पता चलेगी। एक प्राणविद्या से संबद्ध है। श्रवणेन्द्रिय की तन्मात्रा शब्द है और तत्व आकाश। उसके उपकरण का मैल तो आकाश और पृथ्वी तत्व का मेल है। आकाश सबसे सूक्ष्म और पृथ्वी सबसे स्थूल। आकाश उदात्त और पृथ्वी जड़ इनके मिलन से ही सृष्टि उत्पन्न हुई है। अतः इससे शरीरी का उत्पन्न होना प्राणशक्ति का प्रयोग है। जब मैल से देह बनी तो तामसिकता हावी हो गई और असुर बन गए।
      दूसरा अर्थ रूपक अलंकार में समझा जा सकता है जैसा संकेत इस लेख में हैं। श्रवण में दो प्रकार के विषय आते है प्रिय और अप्रिय। प्रिय मधुर लगते है तो अप्रिय कटु। किंतु दोनों यदि बिना किसी व्यवधान (noise) के ग्रहण हो तो सत्य का साक्षात् होता है किंतु जब मैल बाधा (Filter) बनता है तो मिथ्या ग्रहण होने की संभावना होती है। ये बाधा मधु भी हो सकती है और कटु भी। विज्ञापन मधु बाधा का और समाचार वाहिनी कटु विधि का प्रयोग सत्य को तोड़मरोड़ कर तथ्य (Facts) से परे कथ्य (Narrative) का निर्माण करते है। यह अर्धसत्य से भी हो सकता है और पूर्ण मिथ्या (Fake) से भी। आज की लड़ाई यही है। हमारे पक्ष में सत्य है किंतु कथ्य उस पर हावी है। माता की कृपा से हम सत्य को ढकें आवरण को हटा कथ्य को तथ्याधारित बना सकें। अध्ययन, विवेक पूर्ण संदर्भ चयन और विमर्श का त्रिशूल ही वर्तमान मधु-कैटभ का निर्दालनकर सकता है।

      • बहुत अच्छा लगा जानकारी पा कर ज्ञान का अलग प्रकाश मिला कोटिन कोट धन्यवाद।।

  5. विघटनकारी दुष्प्रभाव से ईश्वर हमें दूर रखें।
    सादर प्रणाम दादा

    • हर कार्य ईश्वर पर नहीं छोड़ा नहीं जाता। ये तो हमें ही करना है। जब हम कम पड़ेंगे धर्म की रक्षा में तब उन्हें अवतार लेना पड़ेगा 🙏🏻

  6. हमारी सनातन संस्कृति गूढ़ रहस्यों से भरपूर है, कुछ रहस्यों से परिचित कराता लेख। लगातार कम हो रही पढ़ने की प्रवृत्ति के चलते हमारी संस्कृति से ही अपरिचित से लगते हैं, हम। जबकि, हमारे संस्कार तो अब विज्ञान के धरातल पर भी खरे उतर रहे हैं। उक्त प्रकार के लेख अधिक से अधिक नागरिकों तक पहुंचने चाहिये।

  7. आज सुरू होणाऱ्या सर्व माता भक्तगणांना नवरात्र उत्सवाच्या खूप खूप शुभेच्छा। मधु कैटभ मर्दिनी की पूजा नवरात्र के उत्सव मे प्रथम दिन घर परिवार मे एक सुखद अनुभव …. ऐतिहासिक घटना का स्मरण इस बाद से हो रहा है ….देवी देवताओ की भारतीय ज्ञान परंपरा अध्यात्मिक से किस तरह से परिवार घरघर तक पहुँच गई इसका वास्तविक रूप दैवी शक्ती ही है । इस शक्ती के कारण घर- घर मे वातावरण प्रसन्न भक्तिमय नादमय आरती मय नवधा भक्ती के माध्यम से प्रफुल्लित हो जाता है। सगुण-निर्गुण भक्ति रस मान कर

  8. अद्भुत व्याख्या ,अत्यंत गहन अध्ययन द्वारा ही संभव है।परमेश्वर और मां सरस्वती की कृपा सदैव बनी रहे🙏

  9. बहुत सुंदर ज्ञानवर्धक लेख,
    उत्तरापथ की इस संकल्प यात्रा में अगले लेख का इंतजार रहेगा ।
    आपको शुभ नवरात्रि आदरणीय।

  10. सदा के लिये मार्गदर्शी है – इसलिये इन विचारोंका पून :स्मरण करते रहना आवश्यक | 

  11. सुर-असुर की व्याख्या में एकत्व का जो महत्व आपने बताया है वह बहुत व्यापक है। यह लेख आध्यात्मिक, धार्मिक, लौकिक जीवन दृष्टि की स्पष्टता मां भगवती की ऐसी साधना से ही संभव है। ऋतु परिवर्तन से प्रकृति के साकार रूप की साधना का भी पर्व है । दादा यह एकत्व से देवत्व की प्राप्ति का सूत्र है।

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