सनातन विकास प्रतिमान – 5



सारे विश्व में लगातार बढ़ती आर्थिक विषमता वर्तमान समय में विश्व की सबसे बड़ी चुनौती है। अविकसित और विकासशील देशों से भी अधिक विषमता तथाकथित विकसित देशों में है। विश्व की प्रतिष्ठित शोध संस्था प्यू रिसर्च (Pew Research) के अनुसार वैश्विक मंदी के समय भी विकसित देशों में सर्वाधिक संपन्न 5% लोगों की संपत्ति बढ़ी है। संपन्न-विपन्न के मध्य की खाई भी देशों की संपन्नता के अनुपात में ही है। जितना GDP अधिक, उतनी विषमता भी भयावह। वर्तमान प्रतिमान में बंधे अर्थशास्त्रियों द्वारा उपाय के समय इस खाई के ऊपरी कारक ही सोचे जा रहे हैं। जैसे आंतरराष्ट्रीय मुद्रा निधि (IMF) के अनुसार आर्थिक विषमता के कारण दो प्रकार के हैं। वैश्विक स्तर पर तकनीक, भूमण्डलीकरण (Globalisation) और उन्नत कौशल के अभाव तथा घरेलू स्तर पर राजस्व नीति, उदारता, श्रमिक अधिनियम आदि को इस विषमता का कारण माना है। इस संपन्न-विपन्न खाई के दुष्परिणाम पर सभी विशेषज्ञ सहमत हैं। बेघर, भूखों और बेरोज़गारों की संख्या में वृद्धि के साथ ही इस खाई के कारण हिंसा, व्यसन, नशा ये सभी बढ़ रहे हैं। अनेक विचारक इन बातों पर लिख रहे हैं, किंतु वर्तमान प्रतिमान में उसके पूर्ण निवारण का कोई ठोस मार्ग किसी को दिखाई नहीं दे रहा।

प्रतिस्पर्धा के कारण एकाधिकार (Monopoly) का प्रयास वर्तमान मुक्त बाज़ार आधारित विकास प्रतिमान का अनिवार्य परिणाम है। लाभ बढ़ाना ही विकास का परिमाण होने से अधिकाधिक लाभ के लिए प्रयास किए ही जाते हैं। ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ और केवल ‘सुयोग्य की सुरक्षा’ ये डार्विनीय सिद्धांत स्वभावत: आर्थिक विषमता को बढ़ाते हैं। दो अविश्वसनीय भयावह उदाहरण इसे स्पष्ट करते हैं। विश्व बाज़ार के एकाधिकार से संचालन हेतु पूरे विश्व की नीतियों को प्रभावित करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद इन सभी के दुष्प्रयोग में मुख्य भूमिका निभाने वाले 25-26 परिवारों में से एक रॉकफ़ेलर के पूर्वज जॉन डी रॉकफ़ेलर ने युगाब्द 4972 (1870 CE) में ‘स्टैण्डर्ड आयल’ की स्थापना की। तेल व्यापार पर एकाधिकार हेतु छोटे व्यापारियों को खा जाना, दलालों को प्रलोभन, क़ीमतों में आक्रामक घट आदि अनेक खटकर्म किए। केवल व्यापारिक अनाचार ही नहीं, अनेक देशों में शासन की नीतियों को भी कपटपूर्वक प्रभावित किया। रॉकफ़ेलर फाउंडेशन के नाम से ग़ैर सरकारी संस्थान के माध्यम से विश्वभर में विश्वविद्यालयों के शोध को प्रभावित करने से लेकर, समाज में सेवा के नाम पर सामान्य लोगों पर परीक्षण, छवि निर्माण (Image Building) ऐसी सभी गतिविधियों से एकाधिकार बनाए रखा। पश्चिमी बाज़ारी अर्थव्यवस्था का यह विकृत उदाहरण लगभग सभी अतिसंपन्न परिवारों अथवा निगमों का सामान्य इतिहास है। फोर्ड, जनरल मोटर्स, रोल्स रॉइस जैसे वाहन निर्माता हो या यूनिलीवर, प्रोक्टर एंड गैम्बल जैसे उपभोक्ता वस्तु उत्पादक, इनके प्रचंड लाभकारी (Profit-making) व्यापार की कहानी कपट, असत्य और मानवता के शोषण की कहानी है। औषधि उत्पादन और अन्न उत्पादन में लगे निगमों के षडयंत्र तो और भी अमानवीय, भयंकर और विनाशकारी हैं। व्यापार में हो रहा नरसंहार पर्याप्त नहीं था इसलिए इनमें से अधिकतर का निवेश शस्त्र उत्पादन में भी है। ‘लाभ के लिए कुछ भी’ इस मंत्र को माननेवाली इस व्यवस्था में एकाधिकार से भी आगे केंद्रीकरण को प्रोत्साहन दिया है। 5097 युगाब्द (1995 CE) से प्रारंभ तीन दशकों में इसे वैश्विक कर दिया है।




यह एकाधिकार की मानसिकता व्यापार के साथ ही राजनयिक विश्वनीति का भी अंग बन गई है। इसका दूसरा उदाहरण पहले से भी भयावह है। सुयोग्य की सुरक्षा (Survival of the fittest) का आर्थिक-राजनीतिक राष्ट्रीयता में और अतिरेक हो गया और ‘केवल सुयोग्य को ही जीने का अधिकार है’ ऐसा भाव प्रतिस्पर्धात्मक विकास प्रतिमान का आधार बन गया। पुरातन आदेशपत्र (Old testament) में वर्णित ईर्ष्यालु ईश्वर के नवीनतम मसीहा के तथाकथित जन्म युगाब्द 3102 से प्रारंभ गत दो सहस्र वर्षों के विश्व इतिहास में वंशीय महानता (Racial Superiority) ही यूरोपीय आक्रमण और उपनिवेश का बहाना रही है। विश्व के 4 महाद्वीपों उत्तर-दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में हुए वंशनिर्मूलन का ऐतिहासिक समर्थन करने ‘श्वेत मनुष्य का कर्तव्य’ (White man’s Burden), ‘असभ्यों का सभ्यीकरण’ (Civilizing the Barbarics) जैसे तर्क गढ़े गये। हिटलर ने भी उच्च वंश (superior race) के आधार पर ही द्वितीय महायुद्ध में अकल्पनीय अत्याचार किए। उसे खलनायक माननेवाले मित्र देशों की विचारधारा आज भी वैसी ही है। बढ़ती जनसंख्या को विकास में बाधा बताने का प्रचार ऊपर से कितना भी कल्याणकारी दिखाई पड़ता हो अंतस्थ हेतु तथाकथित नीची मानव प्रजातियों का वंश निर्मूलन ही रहा है। हेनरी किसिंजर द्वारा युगाब्द 5076 (1974 CE) में प्रकाशित जनसंख्या नियंत्रण आख्या (Population Control Report) में स्पष्ट कहा है कि भारत जैसे अविकसित देश में जनसंख्या नियंत्रण आक्रामक योजनाओं से किया जाना चाहिए। तर्क यही था कि इन उनकी दृष्टि में निम्नस्तरीय वंशों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग से उच्च वंश अर्थात् गोरे पश्चिमी लोगों के विकास में बाधा उत्पन्न हो रही है। जब भारतीय विद्यालयों में यह सिखाया जाता था कि अधिक जनसंख्या धरती पर बोझ है तो वह आंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा प्रेरित प्रचार होता था। युगाब्द 5077 (1975 CE) में आपातकाल की आड़ में प्रधानमंत्री पुत्र संजय गांधी द्वारा आक्रामक परिवार नियोजन कार्यक्रम इसी अमेरिकी षडयंत्र का भाग था।

व्यापारी एकाधिकार हेतु निर्णयों का एक केंद्र होना आवश्यक है। इसीलिए राजनीतिक तंत्र और नीतियों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करना वैश्विक केंद्रीकरण का माध्यम रहा है। दोनों महायुद्धों के बाद बनाये राष्ट्र संघ (League of Nations) और संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO), युगाब्द 5046 (1944 CE) में गठित विश्व अधिकोष (World Bank) तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ये अभी बहुराष्ट्रीय संगठन मूल रूप से वैश्विक व्यापार में संपन्न परिवार, निगमों तथा राष्ट्रों के एकाधिकार हेतु नैतिक और कूटनीतिक आधार प्रदान करने का ही कार्य करते रहे हैं। अनेक स्वार्थी युद्धों को मानवीय दृष्टिकोण प्रदान करने के लिए इन मंचों का प्रयोग होता रहा है। युगाब्द 5091 (1989 CE) में सोवियत रुस के विघटन के बाद प्राप्त अति विश्वास के चलते पूरे विश्व को बाज़ार बनाने के उद्देश्य से युगाब्द 5097 (1995 CE) में स्थापित विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने इन मंचों के मूल उद्देश्य को प्रगट कर ही दिया। इसी के साथ बनी व्यापार एवं मूल्य आम सहमति (General Agreement on Trade and Tariff – GATT) ने तो पूर्ण निर्लज्जता से एकाधिकारवादी व्यापार की खुली घोषणा कर दी। राष्ट्रों के मध्य आर्थिक विषमता को इस संधि ने वैधानिक मान्यता प्रदान की। दो देशों द्वारा आपसी व्यापार की संधि करने के स्थान पर एक बहुपक्षीय संधि से व्यापार में दरों का निर्धारण करने का तंत्र सभी हस्ताक्षरकर्ता देशों पर थोपा गया। स्पष्ट था कि वैश्विक व्यापार में इसका लाभ विकसित देशों को ही अधिक होना था। भारत जैसे देश में शीघ्र ही उत्पादन और निर्यात के अनेक क्षेत्रों में हानिकारक परिणाम दिखायी दिया। वस्त्रोद्योग जिसके निर्यात में भारत विश्व का नेतृत्व करता था वह GATT के द्वारा अमेरिका की दादागिरी में चौथे स्थान पर पहुँच गया। सूरत, अहमदाबाद, नागपुर, सोलापुर, काँची जैसे अनेक स्थानों पर वस्त्र उत्पादन उद्योग लगभग समाप्त हो गए। इस प्रकार राष्ट्रों के मध्य आर्थिक विषमता विश्व जनसंख्या में भी बढ़ती गई। तथाकथित विकसित देश भी इस एकाधिकारमुखी प्रतिस्पर्धा से बच नहीं पाये और आर्थिक विषमता के भयावह परिणाम इन देशों में दिखायी दे रहे हैं। बड़ी जनसंख्या की क्रयशक्ति (Purchasing Power) कम होना वैश्विक मंदी का मुख्य कारण है।

एकाधिकार की कामना से किया केंद्रीकरण ही इसकी जड़ में है। बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा सभी कार्य अपने हाथ में लेने की होड़ लग गई। बड़े भौगोलिक क्षेत्र में व्यापार करने हेतु उत्पादन और विपणन (Marketing) तो विकेंद्रित करना ही पड़ता है किंतु निर्णय, वित्तीय नियंत्रण, प्रक्रियाओं का मानकीकरण आदि में प्रचंड केंद्रीकरण आज की अर्थव्यवस्था में दिखायी देता है। युगाब्द 5097 (1995 CE) में जॉर्ज रिट्ज़र ने अपनी पुस्तक ‘समाज का मैकडोनाल्डीकरण’ (The Mcdonaldization of Society) में इस केन्द्रीकृत व्यवस्था का सैद्धांतिक महिमामंडन करने का प्रयत्न किया। उन्होंने मैकडॉनल्ड्स इस खाद्यव्यापार की शृंखला को आदर्श मानते हुए समाज में भी इसके प्रबंधन की चार विशेषताएँ लागू करने की अनुशंसा की। क्षमता (Efficiency), गण्यता (Calculability), पूर्व कथनीयता (Predictability) और नियंत्रण (Control) इन चारों में केंद्रीकरण ही महत्वपूर्ण है। पूर्वानुमान के लिए प्रत्येक प्रक्रिया का मानकीकरण (Standardisation) आवश्यक होता है। गुणवत्ता और कार्यक्षमता हेतु भी नवीनता और कल्पकता के स्थान पर यांत्रिक एकसूत्रता अपेक्षित है। यही उसे गणनीय बनाता है और व्यापारिक एकाधिकार के लिए निर्णय का केंद्रीकरण अनिवार्य है। इन सबसे मानवीय स्वातंत्र्य और विविधता समाप्त हो जाती है। इस तथ्य की भयावहता को समझे बिना इसे समाज में भी लागू करने का विचार भौतिकवादी विचारधारा से ही संभव है। इसी तत्व पर अनेक व्यापार शृंखला गत दो दशकों में विश्वभर में पनपी हैं। नामाधिकार (Franchisee) द्वारा व्यापार में प्रत्यक्ष कार्य तो विकेंद्रित ही होता है किंतु प्रक्रिया का केंद्रीकरण करने के लिए अवास्तव शुल्क लिया जाता है। विज्ञापन के आकर्षण में ऐसी शृंखलाएँ चल पड़ती हैं। मूल रूप से शोषण पर लाभ निर्भर होता है। अतः प्रत्यक्ष श्रम अथवा सेवा प्रदाता सबसे कम लाभांश पाता है। यही आर्थिक विषमता का कारण है।



लाभ वृद्धि के लोभ से किए इन सब प्रयासों के कारण एकाधिकार और निगम मूल्य (valuation) में वृद्धि तो प्रचंड दिखायी देती है किंतु क्या वास्तविक समृद्धि अथवा प्रगति हो रही है? वॉलमार्ट सहित सभी बड़े केन्द्रीकृत व्यापार असफल हो रहे हैं। विश्व के सबसे बड़े खाद्य शृंखला मैकडोनाल्ड के विक्रय में भी लगातार कमी हो रही है। भारत में भी बिग बज़ार और विशाल मेगामार्ट जैसे केन्द्रीकृत व्यापार भी दिवालिया होने की कगार पर पहुँच चुके हैं। इन सबकी असफलता का कारण केंद्रीकरण है। मानव का मूल स्वभाव ही केंद्रीकरण पोषक नहीं है। आज अन्तरताने (Internet) पर हो रहे सचल (online) व्यापार को इस गिरावट का कारण बताया जाता है। किंतु यही स्थिति बड़े औषधि, कृषि निगमों की भी हो रही है। उन क्षेत्रों में तो अभी सचल व्यापार नहीं है। फिर भी सजग ग्राहक पड़ोसी विक्रेता पर अधिक विश्वास कर रहा है और विज्ञापनों के परे तथ्य जाँचकर क्रय करने लगा है। खाद्य उद्योग में चल दूरभाष पर उपलब्ध स्विगी, ईटशुअर, झोमॅटो जैसे संग्राहक उपकरणों (Aggregator Apps) की सफलता का कारण उनकी विकेंद्रित संरचना में है। भिन्न-भिन्न स्थानीय विक्रेताओं को केवल एक मंच प्रदान कर सेवा प्रदाता के रूप में ग्राहक को विविध विकल्प उपलब्ध कराना विकेंद्रित अर्थव्यवस्था का युगानुकूल प्रयोग है।

आर्थिक विषमता को दूर कर सबके विकास को सुनिश्चित करने हेतु ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के तत्त्व पर आधारित सनातन विकास प्रतिमान का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है विकेंद्रीकरण। भारतीय इतिहास में इसके अनेक साक्ष्य मिलते हैं। विविध कालखंड में भिन्न-भिन्न स्थानों पर ग्राम, नगर, अरण्य, पर्वत आदि निवास के अनुसार युगानुकूल तथा देशानुकूल विकेंद्रित अर्थतंत्र का विकास भारत में हुआ। आगामी आलेख में उसके कुछ उदाहरणों की मीमांसा करते हुए वर्तमान समय में क्रियान्वयन पर विचार करेंगे।

Saadhuvaad !!!
Aaj samajh aaya ki Decentralisation is the key to sustain.
स्वार्थपरता की ओर अग्रसर होना केन्द्रीकरण और परमार्थ की ओर जाने में विकेंद्रीकृत प्रतिमान स्थापित होना संभव।
आध्यात्मिक विज्ञान से ही ब्रह्मांड की सुक्ष्म समझ और आनन्द की वृद्धि करने वाले आर्थिक विकास का प्रतिमान स्थापित करने का सामर्थ्य मिलता है।
पदार्थवादी या भौतिकवादी अनित्यता को ही नित्यता का भ्रम पाल लेते हैं, जो प्रतिमान इस भौतिकवादी समझ पर ही विकसित किए गए, अनित्यता अर्थात विफलता को प्राप्त हो रहें हैं।
हम सब का अद्भुत सौभाग्य है जो श्री मुकुल कानिटकर जी जैसे आध्यात्मिक समझ वाले ऋषि से स्थुल और भौतिकवादी प्रतिमानों की कमियां दृष्टांत के साथ समझने को मिल रहा है।
बहुत ही सुंदर लेख, समाज के विभिन्न क्षेत्र पर विभिन्न देश को लेकर किया जाने वाला एक अच्छा रिसर्च. जो बातें आज हमें समझ आ रहे हैं जैसे विश्वविद्यालय में एक खास विचारधारा को लेकर ही पठन-पाठन और रिसर्च पर जोर दिया गया या फिर दिलवाया गया. और कैसे विभिन्न अंतरराष्ट्रीय NGO, समाज सेवी संगठन और समाज सेवकों ने बस एक एजेंट के तहत एक विचारधारा को प्रेरित करने के लिए ही यह समाज सेवा का नाटक गढ़ा. इन सब विषयों को बहुत महत्वपूर्ण लेना चाहिए. इन सभी विषयों पर खुल के चर्चा हो, उनके नकारात्मक प्रभाव से देशों से बचने के लिए एक ठोस कदम उठाने जाना चाहिए, समाज के द्वारा और प्रशासन एवं देश के द्वारा.
विकेंद्रीकरण से आर्थिक शक्ति का वितरण अधिक समान हो जाएगा, जिससे आर्थिक विषमता कम होगी।Jai Hind. Jai Bharat.
यह प्रतिमान अद्भुत है। विशेषतः मेरे विषय के अत्यंत निकट। आर्थिक विषमता पर चित्रित यह प्रतिमान तत्कालीन आर्थिक परिदृश्य को परोसता है।यद्यपि यह बात सत्य है कि आर्थिक विषमताओं से आवरित यह वसुधा *वसुधैव कुटुम्बकम* के मार्ग मे बाधा है। आर्थिक विकास के पैमाने पर प्रश्न चिन्ह है तथापि इस प्रकार के प्रतिमान कहीं ना कहीं आर्थिक संतुलन के मार्ग का मुखोटा बनेगा। जहां से वसुधैव कुटुम्बकम का ध्वजवाहक बनकर समानता की आदर्श अवधारणा का मार्ग प्रशस्त करेगा।
प्रतिमान संग्रहण योग्य है।
लेखक को बधाई। प्रणाम।