शिष्य के शिष्यत्व से ही है गुरु की महिमा

Mukul Kanitkar 21 मिनट का पठन

कहते हैं कि अपवाद नियम को सिद्ध करता है। उसी प्रकार किसी शब्द के अर्थ को अधिक स्पष्टता से समझना हो तो उसके विलोम की ओर ध्यान देना कई बार उपयोगी होता है।भाषाशास्त्र में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधा है। गुरु शब्द का भी अर्थ अनेक रूपों में हमारे सामने आता है। अतः बिना किसी सन्दर्भ के गुरु शब्द का अर्थ क्या होगा? उसके शुद्ध स्वरुप को समझने के लिए हम उसके विलोम का उपयोग कर सकते हैं।गुरु का विलोम है लघु। अर्थात् गुरु वह है जो छोटा नहीं, बड़ाहै। गुरु याने बड़ा। गुरुत्व याने बड़प्पन।

जब द्रवमान (भार) की बात हो तो खगोलपिंडों में भी जो सबसे बड़ा ग्रह है उसे ही गुरु कहते हैं। हमारी सूर्य की ग्रहमाला में बृहस्पति ही सबसे बड़ा ग्रह है और उसे भारत में गुरु कहा जाता है। यहाँ भी हम देखते हैं कि गुरु का अर्थ है बड़ा। संगीतया काव्य में भी जब मात्राओं की गणना होती है तब उसमें भी गुरु और लघुमात्रा कहा जाता है। दीर्घ इ का उच्चारण होता है तब वह गुरुमात्रा होती है। र्हस्व इ हो तब वह लघुमात्रा होती है।यहाँ भी हम देखते हैं कि गुरु का अर्थ है ‘बड़ा’। अतः जब हम गुरु की महिमा के बारे में विचार कर रहे हैं तब उस पद के अर्थ को हम समझ लें तो ज्यादा अच्छी तरह से इस बात को समझ सकते हैं।

एक और सन्दर्भ में गुरु शब्द आता है जो भौतिक विज्ञान का सन्दर्भ है। भौतिक विज्ञान में गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत है।वह सिद्धांत भी यही कहता है कि जिस पिंड का द्रवमान अधिकहोगा वह कम द्रवमान वाले पिंड को अपनी ओर आकर्षित करेगा। चन्द्रमा का द्रवमान पृथ्वी से कम है इसलिए पृथ्वी के गुरुत्व से आकर्षित होकर चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करता है। सूर्य का द्रवमान पृथ्वी से अधिक है, गुरु है। इसलिएसूर्य के गुरुत्व से आकर्षित पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है। इस प्रकार किसी भी सन्दर्भ में यदि गुरु शब्द को देखें तो उसका अर्थ बड़ा ही होता है।

जब हम शिक्षा अथवा दीक्षा के साथ गुरु शब्द को जोड़कर देखते हैं तब यह बड़प्पन कैसे काम आएगा? तब इसपद का विचार कैसे होगा? क्योंकि पद यदि एक है तो उसका अर्थ भी एक ही होना चाहिए। पद और पदार्थ को जोड़नेवाले प्रत्यय को पकड़े बिना गुरु की महिमा को नहीं समझा जा सकता। पद गुरु है तो उसका पदार्थ क्या होगा। बाकि सभी सन्दर्भों में हमने देखा कि गुरु शब्द का अर्थ बड़ा या अधिक होता है। जिसका द्रवमान या वजन अधिक हो, जिसमें यदिमात्रा हो तो अवधि अधिक लगती है। लघुमात्रा में कम अवधि लगती है, गुरुमात्रा में दो गुना अवधि लगती है। याने जो अधिक है, जो बड़ा है, जो भारी है उसे गुरु कहते हैं।

फिर शिक्षागुरु अथवा दीक्षागुरु इस संदर्भ में इस भाषा को कैसे समझाया जाए? यहाँ पर गुरु और शिष्य के संबंध के रूप में इसे देखा जाना चाहिए। अपने आप में तो कोई गुरु होगा नहीं। कोई शिष्यत्व ग्रहण करेगा तभी तो गुरु बनेगा। इसलिएबिना शिष्य के कोई गुरु नहीं बन सकता। भगवद्गीता में इस बात को बहुत अधिक स्पष्टता से हम देखते हैं। भगवान कृष्ण का और अर्जुन का संबंध वास्तविकता में गुरु-शिष्य का संबंध नहीं है। उनके जीवन में वे एक दूसरे के संबंधी हैं। वासुदेव माताकुंती के बंधू होने के नाते कुंती कृष्ण की बुआ है। इसलिएअर्जुन बुआ का बेटा है, फुफेरा भाई है। कृष्ण अर्जुन के मामा का बेटा है तो ममेरा भाई है। तो उस अर्थ में दोनों भाई हैं।बचपन से दोनों एक दूसरे के साथ खेले, कूदे, मस्ती, ठिठोलीकी, हंसी-मजाक भी किया। उस अर्थ में दोनों एक दूसरे के सखा हैं, मित्र हैं। अर्जुन कृष्ण को कह भी रहा है कि तू मेरा सखा है (सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं। हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं। मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।11.41।। यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि। विहारशय्यासनभोजनेषु। एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं। तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ।।11.42।।) विश्वरूप दर्शन देखने के बाद भयग्रस्त होकर अर्जुन कृष्ण को कहता है कि इस रूप सेमैं भयचकित हूँ। तुम्हारी वहीं सावली-सलोनी सूरत दिखा दो।फिर कहता है कि मैं तो जानता ही नहीं था कि तुम इतने बड़े हो!इतने महान हो! सारा विश्व तुममें समाया हुआ है। ऐसे तुम परमपिता परब्रह्म हो। मैं तो तुमको अपना सखा ही मानता था और ऐसे ही तुम्हारे साथ खेला-कूदा, सोया, खाया, हंसी-ठिठोली की। मुझे क्षमा कर दो। इस प्रकार कृष्ण और अर्जुन का संबंध यह सखा का संबंध है। इसलिए अर्जुन विपदा में है,विषाद में है, त्रस्त है। दोराहे पर खड़ा है। नहीं जानता कि किस ओर जाऊँ। ऐसे समय अपने सारथी को, जो उसका मित्र भी है,अपने हृदय की बात बताता है। कहता है कि इस युद्ध में मेरा मन नहीं है। मैं मारना नहीं चाहता। इससे अच्छा तो मैं संन्यास लेकर, भिक्षा मांगकर जीवनयापन कर लूँ। राज्य पाकर भी क्या होगा? अपने ही स्वजनों को मारकर यदि मुझे राज्य मिल भी गया तो ऐसे राज्यसुख के लोभ से युद्ध करना कहाँ तक उचित है? धर्म याने स्वयं का कर्तव्य भूला हुआ अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़होकर अपने सखा से अपने हृदय की बात कह रहा है। प्रश्न नहीं पूछ रहा। पहले अध्याय में अर्जुन ने कृष्ण को पूछा नहीं है, बताया है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा। “रथोपस्थ उपाविश”(भगवद्गीता 1.47) अपने रथ में धनुष्यबाण छोड़कर बैठ गया।पूरे पहले अध्याय में अर्जुन ने मित्र को हृदय की बात, अपनी पीड़ा बताई है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने इस बात पर उसको प्रताड़ित किया कि “यह तुझे शोभा नहीं देता, यह तेरी उपपत्ति नहीं है, ऐसा तुझे नहीं करना चाहिए” (भगवद्गीता 2.3) यह बात जब कही तब अर्जुन के अन्दर पता नहीं क्या भाव जगा और तब उसके सारे तर्क दूर हो गए और उसके मन में आया कि मेरी अब समझ में नहीं आ रहा, मुझे अब अपने से बड़े से पूछना चाहिए।तब उसने माना कि कृष्ण उससे बड़े हैं, अधिक जानते हैं। उनके तर्क अधिक सुसंगत हैं। इस युद्ध के पूरे वातावरण से वे प्रभावित नहीं हैं और अभी भी वैसे ही मुस्कुरा रहे हैं जैसे अन्य समय में भी मुस्कुराते हैं। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो डांट लगायी है कि “तु क्लिबता को मत प्राप्त कर, अपौरुषेय बात मत कर। यह किन्नरों की भांति रोना तुझे शोभा नहीं देता” (भगवद्गीता 2.3)। इस प्रकार से प्रताड़ित करते समय भी भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुरा रहे हैं। संजय धृतराष्ट्र से कह रहा है “प्रहसन्निव भारत” (2.10) – मुस्कुराते हुए कृष्ण ने अर्जुन से ये शब्द कहे। इसलिए अर्जुन समझता है कि जो इस संकट की घडी में, इस विषम परिस्थिति में भी विचलित नहीं हो रहा है,इसका अर्थ ये मुझसे बड़े हैं, मुझसे अधिक कोई न कोई बात इनमें है। यह बात समझने के बाद भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के सातवे श्लोक में अर्जुन ने शिष्यत्व ग्रहण किया। उसने प्रकटकिया कि मैं तुम्हें शरण आया हूँ यह स्वीकार करता हूँ, “शिष्यस्तेऽहं शाधिमां त्वां प्रपन्नं”, मैं तुम्हें प्रपन्न हूँ अर्थात पूरी तरह से शरण आ गया हूँ। तुम्हारे अलावा अब मेरा कोई आधार नहीं है। तुम ही एक हो जो मुझे बचा सकते हो, “शाधिमां”, मुझे बचा लो। किस बात का प्रश्न लेकर शिष्यत्व ग्रहण किया?“यत् श्रेयः स्यात् निश्चितम् ब्रूहि तन्मे”, जो मेरे लिए श्रेयस्कर है वह तुम निश्चित करके मुझे बता दो क्योंकि मैं कार्पण्यदोष से, हृदय के छोटेपन से, कृपणता से ग्रस्त हो गया हूँ। उदारता गुरु के पास है, शिष्य के पास कृपणता है। उसका हृदय छोटा हो गया है। “कार्पण्यदोषोsपहतस्वभावः”, कार्पण्यदोष से अपहत मेरा स्वभाव (वास्तविक स्वरुप) ढँक गया है, मैं नहीं जानता कि मुझे क्या करना चाहिए इसलिए आप ही मुझे निश्चय करके बता दो। मैं नहीं देख पा रहा हूँ कि मेरे लिए धर्म क्या है।“निश्चितं स्यात् ब्रूहि तन्मे” वह मुझे बता दो। अर्जुन ने यह शिष्यत्व ग्रहण किया तब श्रीकृष्ण गुरु बने। नहीं तो तब तक कृष्ण ममेरा भाई है, सखा है। कृष्ण का गुरु बनना, अर्जुन के शिष्यत्व ग्रहण करने पर निर्भर करता है।

गुरुता लघुता से जुड़ी हुई है। जब तक शिष्य अपनी लघुता से श्रद्धा नहीं प्रकट करता तब तक गुरु की गुरुता नहीं प्रकट हो सकती। शिष्य यदि स्वयं को गुरु से बड़ा समझता रहे, समझे कि ‘गुरु को बात ही समझ में नहीं आती, वे क्या जानते हैं? वे मुझे समझते नहीं है। वे मेरी परिस्थिति को नहीं जानते।उन्हें मेरे जितनी जानकारी नहीं है।’ तो ऐसी स्थिति में गुरु गुरु नहीं रह सकता क्योंकि शिष्यत्व ही नहीं है। शिष्यत्व बिना लघुता के नहीं हो सकता। और जहाँ लघुता नहीं है वहाँ गुरुता नहीं हो सकती। गुरुता नहीं है तो गुरुत्व नहीं है और गुरुत्व नहीं है तो गुरु नहीं है। अतः गुरु को गुरु शिष्य बनाता है। गुरु को गुरु स्वयं का स्वभाव नहीं बनाता। उसकी अपनी क्षमता गुरु नहीं बनाती। उसका अपना आचरण गुरु नहीं बनाता। इस बात का यह कदापि अर्थ नहीं है कि गुरु सारे दायित्वों से मुक्त है। उसे तो यह सब करना ही पड़ेगा। उसे तो अपनी गुरुता को निभाना ही पड़ेगा। जब तक वह अपना बड़प्पन नहीं रखेगा तब तक वह गुरु कैसे होगा? किंतु उसके बड़प्पन का स्वीकार जब तक शिष्य नहीं करता तब तक वह गुरु नहीं बन सकता। शिष्य की श्रद्धा ही गुरु को गुरु बनाती है। इसलिए जितना गुरुत्व का विचार करने की आवश्यकता है उतना ही शिष्यत्व का विचार करने की भी आवश्यकता है।

गुरुपूर्णिमा के अवसर पर गुरु का मान-सम्मान करना है, आदर करना है ताकि शिष्यत्व हमारे मन में सदा जागृत रहें।हमारा शिष्यत्व जागृत रहेगा तो गुरु हमारे लिए गुरु बन सकेगा।एकलव्य का शिष्यत्व जागृत है। एकलव्य अपने आप को बड़ा नहीं मान रहा है। उसके अन्दर उद्दंडता है। वह अपने आप को आवश्यकता से अधिक योग्य मानता है। ये सारी बातें हैं, किन्तुद्रोणाचार्य के प्रति उसके मन में पूर्ण श्रद्धा है कि ये मुझसे बड़े हैं। ये धनुर्विद्या मुझसे अधिक जानते हैं। अर्जुन, दुर्योधन और भीम से वह स्वयं को श्रेष्ठ मान रहा है। इन राजकुमारों में राजघराने में जन्म लेने के अलावा कोई विशेषता नहीं है। मैं भले ही वनवासी हूँ, भील राजा का पुत्र हूँ किंतु मुझमें धनुर्वेद सीखने की क्षमता, योग्यता इन राजकुमारों से अधिक है। उनकी तुलना में वह स्वयं को लघु नहीं समझ रहा है। किंतु द्रोणाचार्य के पास मुझसे अधिक ज्ञान है और उनसे मुझे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए यह उसके मन में शिष्यत्व प्रकट है। इसलिए वह अपने मन में श्रद्धा लिए हुए द्रोणाचार्य की मूर्ति की स्थापना करता है। उस मूर्ति के अन्दर प्रतिष्ठित द्रोणाचार्य की गुरुता को वह मानता है और स्वयं की लघुता को पहचानता है इसलिए वह पाषाण की मूर्ति भी उसको धनुर्वेद सिखा पाती है। शिष्य की श्रद्धा उसकी लघुता को गौरवान्वित, महिमान्वित कर देती है। और उसी से गुरु की महिमा जागृत होती है। गुरु का गुरुत्व जागृत होता है।

आधुनिक समय में हम देखते हैं कि अनेक लोग दीक्षागुरु भी बन जाते हैं। शिक्षागुरु बनना भी कठिन है। दीक्षागुरु बनना तो उससे भी कठिन है। वहाँ केवल शिष्य के शिष्यत्व ग्रहण कर लेने से ही काम नहीं चलता, गुरु के अन्दर भी शिष्य को आध्यात्मिकता में आगे बढ़ाने की क्षमता, वास्तविक गुरुत्व होना आवश्यक है। सच्चे अर्थ में तो दीक्षागुरु या आध्यात्मिक गुरु वे ही बन सकते हैं जो शिष्य के चित्तगत प्राणों की स्थिति देखकर उनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसे दिशा दे सके। उसकी चिति और स्वभाव के अनुरूप उसे साधना बता सके। वही दीक्षागुरु बन सकते हैं। लेकिन आज हम देखते हैं कि अनेक कथाकार, प्रवचनकार, संन्यासी दीक्षागुरु बन जाते हैं। अनेक लोगों को शिष्यत्व दे देते हैं, दीक्षा, मंत्रदीक्षा, माला दे देते हैं, गंडा-तावीज बांध देते हैं। अनेक लोग इस बात से परेशान होते हैं कि बड़ा पाखंडी गुरु है, इतने शिष्यों का नुकसान कर दिया।गुरु के पाखंडी होने से शिष्य के नुकसान होने का कोई संबंध नहीं है। शिष्य की श्रद्धा यदि पक्की होगी तो गुरु चाहे जैसा भी हो, उसका भला होगा। गुरु ने मंत्र दिया है, शिष्य श्रद्धा से उसका जप करे। गुरु जप न करता हो तो नुकसान गुरु का होगा। गुरु पाखंडी होगा नुकसान उसका होगा। गुरु साधना नहीं करेगा, तो गुरु का भला नहीं होगा। गुरु को सिद्धि नहीं मिलेगी।गुरु साधना में, आध्यात्मिकता में कही आगे नहीं बढ़ेगा। शिष्य का उससे कोई नुकसान नहीं होनेवाला। शिष्य का नुकसान तो यदि वह गुरु के प्रति अश्रद्धा रखता है तब होगा। इसलिए शिष्य के मन में यदि श्रद्धा बनी रहे तो गुरु का गुरुत्व उसके मन में बना रहता है। गुरु के पाखंडी होने से भी शिष्य का उद्धार हो सकता है। कई गुरु ऐसे भी हैं जो स्वयं पान, तंबाकू खाते हैं लेकिन उनके शिष्य अपने जीवन में व्यसन से मुक्त हो गए। चाय छोड़ दी, तंबाकू छोड़ दी। गुरु पर श्रद्धा है, गुरु कैसा है, उसका चरित्र कैसा है इससे अंतर नहीं पड़ता। श्रद्धा है, श्रद्धा से गुरुमंत्र की माला नियमित जपते हैं तो उनकी आध्यात्मिक उन्नति निश्चित है, होती रहेगी।

गुरु का गुरुत्व शिष्य की महिमा पर निर्भर करता है। शिष्य किस श्रद्धा से गुरु को ग्रहण करता है। इसलिए भगवद्गीता कहती है “श्रद्धावान् लभते ज्ञानं” (4.39) – जिसके मन में श्रद्धा का जागरण हुआ वही ज्ञान प्राप्त करता है। श्रद्धा जागृत हो जाए तो निसर्ग गुरु बन जाता है। भगवान दत्तात्रय के 24 गुरु थे। उपनिषदों में सत्यकाम जाबाला की कथा आती है।सत्यकाम की माता को नहीं पता कि कौन उसका पिता है।उसका गोत्र पता नहीं। वह सबको कहता है कि “जाबाल मेरा गोत्र है, मैं जाबाली का पुत्र हूँ।” साथी, सहपाठी सब उसपर हँसते हैं। गुरु के मन में अनुकंपा जगती है कि इसे इस प्रकार के अवमान से, लज्जा से बचाया जाए। इसलिए गुरु उसे जंगल में भेज देते हैं। वे कहते हैं कि ‘100 गाएं लेकर जाओ, 1000 हो जाएँगी तब लौटना। तुम्हें ब्रह्मज्ञान हो जाएगा।’ सत्यकाम मन में गुरु के शब्दों के प्रति पूर्ण श्रद्धा धारण किये, थोड़ा सा भी संदेह न रखते हुए कि ‘100 गायों के 1000 गाएं बनने में पता नहीं कितना समय लगेगा; केवल 100 की 1000 गाएं हो जाने से ब्रह्मज्ञान कैसे हो जाएगा या मैं केवल गोपालन करता रहूँगा तो वेद कैसे सीखूंगा; मैं तो इनके पास ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने आया हूँ, वेदपठन सीखने के लिए आया हूँ।’ इस प्रकार का कोई भी ‘किंतु’ मन में रखे बिना पूर्ण श्रद्धा से गुरु ने जो बताया वही मेरा एकमात्र उद्धार का मार्ग है इस बात को मन में धारण करके सत्यकाम 100 गाएं लेकर जंगल में जाता है। उपनिषद कहते हैं कि प्रकृति सत्यकाम को दीक्षा देती है। पेड़, पौधे, वल्ली उसे दीक्षा देते हैं। उनसे वह सीखता है। पक्षियों की भाषा सीख जाता है। पक्षी उसे ब्रह्मज्ञान की दीक्षा देते हैं। अनेक गुरुओं से ज्ञान प्राप्त करते हुए सहस्त्र गाएं होने के बाद गुरु की श्रद्धा को मन में धारण किये हुए जब 12 वर्ष बाद सत्यकाम वापस गुरुकुल लौटता है तो उसके चेहरे पर ब्रह्मतेज है।

गुरु उसे देखकर कहते हैं, “सत्यकाम वास्तविकता में सत्य का आकांक्षी है। तूने अपनी श्रद्धा से सत्य को पा लिया।”

अपने सारे शिष्यों को वे कहते हैं, “ये तुम्हारा साथी तुमसे कई गुना आगे निकल गया क्योंकि इसकी श्रद्धा जागृत रही।अब यह वेदपठन एक वर्ष में ही सीख जाएगा क्योंकि इसे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त हो गया।”

शिष्य की श्रद्धा गुरु को गुरुत्व देती है। इसलिए ‘गुरु रूठे ठौर नहीं’ यह एक अच्छा पद है और यह शिष्य के मन में रहना आवश्यक है कि मैं गुरु की सेवा करुँ, गुरु को प्रसन्न रखूँ।उसकी श्रद्धा का प्रकटीकरण होता रहे कि गुरु मुझसे रूठे नहीं।किंतु वास्तविकता तो यह है कि यदि शिष्य रूठ जाए तो गुरु की गुरुता की कोई महिमा नहीं। यदि शिष्य रूठ जाए और गुरु को गुरु मानना बंद कर दे, उस शिष्य के लिए गुरु की गुरुता कोई काम नहीं कर सकेगी। गुरु के रूठने से बचना यह आवश्यक है क्योंकि शिक्षा प्राप्त करने के, उपदेश प्राप्त करने के तीन तरीके भगवद्गीता बताती है – परित्राण, परिप्रश्न और सेवा। इन तीन तरीकों से ही जो ज्ञानिनः हैं, जो ज्ञानवान गुरु हैं, वे हमें ज्ञान देते हैं, उपदेश करते हैं।

उपदेक्षंती ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्व दर्शिनः। तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।| (4.34)

ये तीन विधियाँ बताई। प्रणिपात – पूरी तरह से शरण जाना कि तुम ही एकमात्र हो। परिप्रश्न करना – अपने मन में ढ़ंग से मथकर सारी शंकाओं को दूर करके प्रश्न का रूप धारण करने के बाद, पूरे चिंतन-मनन के बाद प्रश्न करना। इसलिए परिप्रश्न है, सादा प्रश्न नहीं है। मन में आया पूछ लिया ऐसा नहीं है। और तीसरा है परिसेवया – पूर्ण श्रद्धा से सेवा। ये तीन काम करोगे तो ज्ञानिनः तत्वदर्शिनः उपदेक्षंती – आपको उपदेश करेंगे। इस अर्थ में गुरु रूठे ठौर नहीं को याद रखना आवश्यक है। श्रद्धा शिष्य के मन में रहेगी तभी तक गुरु का गुरुत्व रहेगा यह बात भी महत्वपूर्ण है। इसलिए गुरु-शिष्य संबंध में गुरु के भाव से अधिक शिष्य का भाव महत्वपूर्ण है। शिष्यत्व का भाव महत्वपूर्ण है।

गुरु का आचरण महत्वपूर्ण तो है ही पर कई बार गुरु के आचरण के अर्थ नहीं पता चलते। गुरु किसी-किसी को बड़ी मृदुता से, प्रेम से समझाता है और दूसरे शिष्य को हमेशा डांटता रहता है। तब शिष्य के मन में यह दूजा भाव आता है कि मुझसे ऐसा व्यवहार करते हैं, उससे तो नहीं करते। लेकिन सच्चा गुरु जानता है कि किसको किस प्रकार से शिक्षा-दीक्षा देनी चाहिए। इस अर्थ में वह आचरण करता है। शिष्य के मन में यदि यह श्रद्धा रहे कि गुरु मुझसे जैसा आचरण कर रहा है वही मेरे लिए सही है, वही मेरे लिए प्रसाद है तब उस शिष्य की श्रद्धा ही गुरु को गुरु बनाती है और तभी वह कुछ ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

भौतिक विज्ञान का नियम है कि जहाँ पर अधिक ऊर्जाहोगी वहाँ से कम ऊर्जा की ओर ऊर्जा प्रवाहित होगी। ऊर्जा हाई वोल्टेज से लो वोल्टेज की ओर जाती है। घनता (density) के बारे में भी ऐसा ही है। मान लीजिए किसी जल में अधिक क्षार है, दूसरे जल में कम क्षार है और बीच में कोई इस प्रकार का पर्दा है कि जिसमें से घनता इधर से उधर हो सकती है। तब अधिक क्षार जिसमें है वहाँ से कम क्षार की ओर घनता का प्रवाह होगा। Physics में भी यह नियम है ‘गुरुता से लघुता की ओर’। जहाँ द्रवमान अधिक होगा उससे कम द्रवमान की ओर आकर्षण का स्वरुप होगा। अतः गुरु से लघु की ओर, अधिक से कम की ओर यह गति हमें पता है। ज्ञान की भी यही गति है –गुरु से शिष्य की ओर। इसलिए शिष्य अपने लघुत्व को धारण करेगा तभी गुरु से ज्ञान प्राप्त करेगा।

रामकथा का एक प्रसंग है। रावण मृत्युशैय्या पर पड़ा हुआ है। उसकी नाभि में रामबाण लगा हुआ है। मरने से पहले अंतिम श्वास ग्रहण कर रहा है। ऐसे समय में उसकी मृत्यु से पहले भगवान श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं कि रावण राजनीतिशास्त्र का बड़ा प्रकांड पंडित है। उसके पास इस शास्त्र का सिद्धांत और व्यवहार दोनों का ज्ञान है। वह theory भी जानता है और practice भी उसने की है। अब उसका अंतिम समय है। उसका शरीर चला जाएगा तब इतना बड़ा ज्ञान उसके साथ चला जाएगा। जाओ और उससे ज्ञान ग्रहण करो। उससे राजनीति का पाठ सीखो। लक्ष्मण के मन में राम के प्रति गुरुता का भाव है। राम के प्रति श्रद्धा है इसलिए राम की बात को वह नकार नहीं सकता। वह राम की आज्ञा का पालन करता है। किंतु रावण के प्रति गुरुता का भाव नहीं है। रावण को तो वह छोटा ही मानता है। ‘यह अहंकारी, यह दंभी, यह पाखंडी, यह राक्षस, यह चरित्रहीन व्यक्ति, यह लंपट, दूसरे की पत्नी को भगानेवाला यह मेरा गुरु कैसे हो सकता है! इससे मैं कैसे ग्रहण करूँगा!’ ऐसे भाव मन में ले वह रावण के सिरहाने जाकर खड़ा होता है और उद्दंड भाव से कहता है, “हे रावण, मेरे बड़े बंधू ने कहा है इसलिए मैं तेरे पास आया हूँ। तेरे पास राजनीति का जो भी ज्ञान है वह मुझे तेरे मरने से पहले दे दे जिससे वह ज्ञान तेरे मरने के बाद भी टिका रहे नहीं तो तेरे ही साथ चला जाएगा। बोल, मैं सुनने के लिए तैयार हूँ।” रावण मुंह फेर लेता है। लक्ष्मण वापस आकर अपने बड़े भाई राम जी को कहता है, “राम जी देखो मैंने कहा था यह बड़ा घमंडी, अहंकारी है। यह किसी को अपना ज्ञान क्यों देगा? मैंने जाकर उससे पूछा तो इसने मुंह फेर लिया!इतने अहंकारी के पास आपने मुझे क्यों भेजा?” राम जी मुस्कुराये। स्वयं रावण की शैय्या के पास गए, उसके चरणों के पास जाकर खड़े हुए और कहा, “हे प्रभु, हे दशानन, हे पुलत्स्य ऋषि के ब्राह्मणपुत्र। आपने घोर तपस्या की। भगवान शिव के आत्मलिंग को प्राप्त किया। आप बड़े तपस्वी हैं। आप राजर्षि हैं। आपने राजधर्म का पालन किया और राजनीति के शास्त्र को न केवल अध्ययन के द्वारा अपितु अभ्यास के द्वारा पूर्णता तक प्राप्त किया है। अपनी साधना से भी उसे और ऊँचाई प्रदान की है। मैं रघुनन्दन दशरथपुत्र राम अपने चौदह वर्ष के वनवास को पूर्ण करने के बाद अयोध्या जाकर धर्म के राज्य की स्थापना करना चाहता हूँ। आपका ज्ञान उस दिशा में मुझे अत्यंत सहायक होगा। मुझपर कृपा करें और वह ज्ञान मुझे प्रदान करें।” कहते हैं कि उस अंतिम समय पर अत्यंत श्रद्धा से द्रवित होकर रावण ने राम जी को राजनीतिशास्त्र का ज्ञान दिया। इसे कहते हैं परित्राण। अपने शत्रु के प्रति भी जब तक शिष्यत्व ग्रहण नहीं करेंगे, ‘मैं लघु हूँ, इस विषय में मैं कम जानता हूँ। आप गुरु हैं, आप इस विषय में मुझसे अधिक जानते हैं।’ यह भाव जब तक मन में नहीं होगा तब तक ज्ञान का प्रवाह नहीं हो सकता।

‘गुरु रूठे ठौर नहीं’ बिलकुल सही है। शिष्य को इस बात का भान रखना चाहिए पर साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि शिष्य को गुरु से रूठने का कोई अधिकार नहीं। गुरु को अधिकार है रूठने का तो शिष्य मनाएगा, गुरु की गुरुता का बखान करेगा, उसको बड़ा बनाएगा। शिष्य को गुरु से रूठने का कोई अधिकार नहीं क्योंकि शिष्य रूठे तो गुरु ही नहीं। गुरु रूठे कोई ठौर नहीं पर शिष्य रूठे तो गुरु ही नहीं। शिष्य यदि रूठ गया तो गुरु की गुरुता समाप्त हो गयी। गुरु की गुरुता शिष्य की श्रद्धा से है इसलिए हम अपने मन में शिष्यत्व को धारण किये रहें। आज यदि सारे शिक्षक अपने मन में शिष्यत्व का भाव धारण किये रहेंगे तो उनके शिष्य भी उनके प्रति गुरुता का भाव धारण करेंगे। हम अपने गुरु के प्रति अपने शिष्यत्व को जिवंत रखेंगे तो हमारे शिष्य भी हमारे प्रति गुरुता का भाव धारण करेंगे। अतः प्रत्येक गुरु शिक्षक अपने जीवन में गुरुत्व को धारण करने के लिए शिष्यत्व का जागरण करें क्योंकि याद रहें ‘शिष्य रूठे गुरु नहीं, गुरु रूठे ठौर नहीं।’ अतः शिष्य शिष्यत्व का जागरण करें तभी वह एक दिन गुरु भी बन सकेगा।

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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9 Comments

  1. Very nice, clear & elaborative explanation covering Science & Vedic -Knowledge.

  2. ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।
    मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।परम आदरणीय गुरु जी के श्री चरणों में सादर नमन वंदन 🙏🌺🙏🌺🙏🙏🌿

  3. गुरूता का सुंदर एवं सरल विवेचन, सत्यकाम जाबाल की गुरु दक्षिणा वाली कथा अदभुत है, गुरू पूनम का समग्र दृष्टिकोण इस लेख में आया है ….

  4. यह केवल एक लेख नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा का सुंदर प्रस्तुतीकरण है। आज के समय में ऐसे चिंतन की नितांत आवश्यकता है।

    आदरणीय दादा आपको साधुवाद एवं सादर प्रणाम।

  5. यह केवल एक लेख नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा का सुंदर प्रस्तुतीकरण है। आज के समय में ऐसे चिंतन की नितांत आवश्यकता है।

    आदरणीय दादा आपको साधुवाद एवं सादर प्रणाम।

  6. आप ने नई दृष्टि दी है गुरु जी ।

    सादर

  7. आदरणीय गुरु जी के श्री चरणों में सादर नमन वंदन | “अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥”गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥🙏🙏

  8. सदानीरा नदी के स्वच्छ प्रवाह सा आलेख है. कभी संघनित तो कभी उद्दाम लहरों सा विचार-भूमि को विचलित कर गहरा उतरने को विवश करता है.

    पढ़ते हुए बहते रहने का अनुभव हुआ. लेख के पूर्ण होते-होते नहाने के बाद स्फूर्ति और शुचिता का बोध होता है, वैसा ही हुआ.

    बहुत सुन्दर प्रकटीकरण है, गरिष्ठ होते हुए भी सुपाच्य है. लिखा हुआ शास्त्रोक्त है अथवा भाव-बोध से अनुप्राणित है, स्वीकार है इसीलिए टिप्पणी भी क्यों! जोड़ने से बढ़ेगा नहीं, हटाने से घटेगा नहीं. इसलिए पुनः पुनः पढ़ते रहने का आनंद उठाते रहेंगे.

    आपको साधुवाद. श्री व्यास पूर्णिमा की पवित्र वेला में पढ़कर हृदय आनंद से भर गया.

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