शुभ संकल्प का उत्सव

Mukul Kanitkar 2 मिनट का पठन

दीप तो केवल प्रतीक हैं
उत्सव तो युद्ध विजय का है
उत्सव धर्म रक्षा का है
लक्ष्मी की उपासना और
शक्ति की साधना का है

युद्ध जीतकर अ-योध्या
लौटने पर जली दीपमाला
उसके प्रकाश में छिपा है
पराक्रम, उद्यम और संगठन
वा-नर को नर बनाती
संगठित कार्यपद्धति
सागर लांघने सेतु बंधन का उद्यम
अधिक प्रगत शत्रुओं के
संहार का पराक्रम

दीप तो केवल निमित्त हैं
उत्सव तो है तितिक्षा का
उत्स त्याग, तपस्या, समर्पण का
आज्ञापालन और लोकसंग्रह का
दुष्टदलन और ऋषिपूजन का

युद्ध से पूर्व वनवास
सतत संयम की तितिक्षा
पिता के धर्म हेतु
विमाता का आज्ञापालन
राज्य का त्याग
सपत्निक तप और
बंधु का समर्पण
निषाद, शबरी, सुग्रीव
का लोक संग्रह
खर-दूषण-कबंध का दलन
सुतीक्ष्ण, शरभंग, अगस्ति, अत्रि
लोपामुद्रा और अनुसूया का पूजन

दीप तो केवल संकेत हैं
उत्सव तो है श्री का
शुभ लाभ का
अष्टलक्ष्मी की उपासना
दान और दक्षिणा का

कल्याणकारी संपदा
जीवनध्येय को साधक श्री
आय धर्म से व्यय सेवा में
यही है लाभ की शुभता
महालक्ष्मी आठों रूपों का ध्यान
धन ही नहीं धान्य, वीरता, विद्या
विजय, सौभाग्य और संतति
सब की आदि विष्णुपत्नी
सत्पात्र को सविनय देय दान
सेवा का प्रतिफल दक्षिणा
द्यूत, कपट से पाने का नहीं
देने, चुकाने और धन्यता का भाव

दीप तो केवल द्योतक हैं
उत्सव तो है जागरण का
शक्ति के उग्र साधन का
यंत्र, तंत्र, मंत्र का
घोर-अघोर कालरात्रि का

अमावस के तम में
जागृत सर्व इंद्रियाँ
देवी माँगे बलि
अहं, भोग और संकीर्ण का
दृश्य पर त्राटक हेतु
आबद्ध प्राण यंत्र का
आकाश तरंग अजप जप
स्पंदन शब्द बद्ध मंत्र का
ऊर्जा-मूल पर एकाग्र मन
कुलसर्प जागे तंत्र का
स्वल्प का अनंत फल
महारात्रि में साधना का

केवल दीपोत्सव नहीं
वत्स के पालन
गो संपद की युक्ति
नरक पर विजय
नारी की शक्ति
पाताल पर विजय
बलि की मुक्ति
गोवर्द्धन जय
प्रकृति और भक्ति
यम पर बंधुत्व विजय
काम से विरक्ति

इतना गहन गंभीर
व्यक्ति, परिवार, समाज
राष्ट्र, मानवता और सृष्टि
सबके कल्याण का उत्सव
केवल दीपोत्सव नहीं
केवल प्रसन्न (happy) नहीं
केवल शुभ कामना या इच्छा से नहीं
मनाया जा सकता है
संकल्प से
पराक्रम, उद्यम, संगठन
कल्याण, त्याग, तप
सभी शिवकर कर्मों के
संकल्प से
क्षमता से अधिक
स्वार्थ से रहित
सर्वहितकारी संकल्प से

संकल्प दीपों की आवली
आओ मनाएँ दीपावली

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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16 Comments

  1. “उत्साहाची आणि आनंदाची उधळण करीत येणारा दीपोत्सव आणि सोबत येणारे नवे वर्ष आपणा सर्वांना सुख समृद्धीचे, उत्कर्षाचे व आरोग्यदायी जावो”

    मृण्मयी, प्रथमेश, सौ. आदिती, गिरीश कुळकर्णी (धानोरकर) परिवार

  2. बहुत सुंदर काव्य पद संयोजन।

    मन, वचन और कर्म जोड़े निज कर
    संकल्प अश्रु धरती कहती
    आत्मोसर्ग प्रथम अर्पण कर..!

    चंद्रकांत तिवारी

  3. बहुत सुन्दर, सारगर्भित एवं अर्थपूर्ण है जो कविता के माध्यम से दीपावली पूजन को सार्थक बनाया है।

  4. बहुत सुन्दर रचना
    रचना कार बधाई के पात्र हैं

  5. दीप तो केवल संकेत है ! वाह ! अत्यंत सरल और प्रभावशाली काव्य रूपी सारा, सार माहाकाव्य रामायण का ! धन्यवाद ईस काव्य को साझा करने के लीये.

  6. ह्रदय से निकली शब्द कविता . भाव -भक्ति से पूर्ण कहीं भी कोई कमी नही . अति सुंदर.

  7. आदरणीय भाई साहब प्रणाम 🙏🙏

    बहुत ही सारगर्भित व युवाओं व सभी पीढ़ी के लिए सटीक अर्थपूर्ण दिवाली व्याख्या 🙏

  8. सचमुच, दीप तो केवल संकेत है। पर्व है जागरण का ही, अंतस के दीप जलाने का, चेतना के विस्तार का, आत्म दीपो भव होने का ! स्वयं के उत्सर्ग के पूर्व, स्वयं की शक्ति का जागरण, स्वयं को जानना, और वसुधा के निमित्त उत्सर्ग करना, निश्चित ही चेतना की गति की उर्ध्वगामी दिशा है! अद्भुत संदेश आपके द्वारा काव्य के माध्यम से!! सादर प्रणाम💐💐

  9. बहुत सुंदर रचना है। शब्द संयोजन और भाषा प्रवाह अद्भुत और बहुत ही अनुपम है

    • मन कर्म और धर्म से परिपूर्ण आपकी काव्य रचना बहुत ही उम्दा है। हम सभी आपके चिंतन का अनुसरण करते हैं।

      आपको और आपकी लेखनी को प्रणाम भैया।

      प्रोफेसर रोहिणी प्रसाद

      रायपुर, छत्तीसगढ

  10. सही मै दीपावली का उत्सव सदियों से पूरा जन मानस पूरा विश्व मना रहा है जिसे भी ज्ञात हुआ वो मना रहा है तो ये मात्र किसी राजकुमार के वनवास के पश्चात राजमहल में लौटने का उत्सव नहीं हो सकता। ये उत्सव आपकी काव्य के अनुरूप त्याग, तप, कौशल, पुरुषोत्तम, चरित्र, पुरुषार्थ, शक्ति, सामर्थ्य, सत्य, दया, भक्त वत्सल, के लिए उत्सव है। इसलिए इस दीपावली उत्सव को उसी परिपेक्ष्य में लेना है। संकुचित नहीं। 🙏 प्रणाम मुकुल जी

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