
कार्यकर्ता चालीसा 5
यदि ईश्वर में विश्वास व ध्येय पर दृष्टि अडिग हो तो प्रत्येक बाधा विकास का अनुपम अवसर बन जाती है। एक संगठन के कार्यकर्ता को अपने दैनिक कार्य में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उसे अपनी सृजनशीलता द्वारा उन कठिनाइयों के मध्य मार्ग खोजते हुए राष्ट्रसेवा का दुर्गम कार्य करना होता है। किसी और द्वारा बनाये गये क्रम से वह नहीं चल पाता, वह तो स्वयं का विशेष क्रम बना लेता है। यही उसका विक्रम है। विक्रम हेतु केवल सूझबूझ व नवीनता से सोचने की कल्पनाशीलता ही पर्याप्त नहीं होती। किन्तु प्रचण्ड बाधा के सम्मुख भी वैकल्पिक मार्गों का चिंतन प्रारम्भ होने के लिए आवश्यक होती है। दृढ़ मानसिक शक्ति उसमें साहस भर देती है; संयम व तितिक्षा देती है। ऐसा कार्यकर्ता ही सच्चा वीर है। अपनी वीरता से संकटों को मात दे सकता है। हनुमान जी तो वीर ही नहीं महावीर हैं, अतः संजीवनी औषधि को न पहचान पाने की स्थिति में पूरा का पूरा द्रोणाचल ही उठा लाएँ।

साहस व विक्रम का साथ देने के लिए बलवान शरीर भी अत्यावश्यक है। हनुमान जी कार्यकर्ता के लिए आदर्श हैं। उन्हें उनके वज्र समान शरीर के कारण ही वज्रांग – बजरंग कहा गया है। कार्यकर्ता भी बजरंगी होने चाहिए। शारीरिक बल, तितक्षा (Stamina) और चपलता (Agility) तीनों वज्रांग बनने के लिए आवश्यक है। नित्य शाखा में खेले भारतीय खेलों में इन तीनों शक्तियों का विकास सहज होता है। यंत्रों की सहायता से बने आधुनिक आखाड़ों (Gym) में किए व्यायाम में तीनों का समन्वित विकास दुष्कर ही है। हनुमानजी में शारीरिक बल के साथ ही लचीलापन और तितिक्षा भी है। इसीलिए बजरंग बली कार्यकर्ताओं के लिए आदर्श है। मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक तीनों स्तरों पर आदर्श का तुलसीदास जी विशेषणों की इस श्रृंखला के साथ वर्णन करते हुए पवनसुत से प्रार्थना करते हैं कि यही सारे गुण हम भक्तों में भी आएँ।

महावीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
पूजा का वास्तविक अर्थ ही यह है – जिसका पूजन करें वैसे ही बन जाएँ। सामर्थ्य का उद्देश्य भी सकारात्मक होना अपेक्षित है। बल, विद्या अथवा धन का उपयोग परपीड़ा, विद्वत्ताका प्रदर्शन अथवा भोग के लिए करने के स्थान पर दुर्बलरक्षा, ज्ञानदान और दान के लिए करना अपेक्षित है। मारुति हनुमान इसका भी आदर्श है। यह सकारात्मक उद्देश्य मन में आने का विवेक ही सुमति है। अपने सामर्थ्य का विपरीत अथवा हानिकारक प्रयोग करने की बुद्धि कुमति है। अतः प्रार्थना है कि बजरंगबली हमारी बुद्धि को सुमति कर दें। क्षुद्र, स्वार्थी, संकुचित विचार कुमति और विस्तारित, समर्पित, त्यागी विचार सुमति है। हनुमान जी सुमति के संगी हैं। वे कृपा कर हमारी कुमति को हटा देंगे यह कार्यकर्ता की प्रार्थना है।

संघ की प्रार्थना में वीरव्रत को कार्य का आधार माना है। वीरता मानसिक क्षमता है उसका सर्वोत्तम रूप महावीर है। विपरीत स्थिति में भी व्यवहारकुशलता से मार्ग निकालने की बौद्धिक योग्यता का नाम विक्रम और शारीरिक सामर्थ्य का सर्वोच्च आदर्श वज्रांग है। कार्यकर्ता को इन तीनों शक्तियों की सतत आवश्यकता होती है। उसी के साथ उनके सदुपयोग का विवेक भी अनिवार्य है। जब हम इन तीनों स्तरों पर बलोपसना कर हनुमानजी से प्रार्थना करेंगे तब वे हमारी बुद्धि को शुद्ध कर हमारे सहयात्री अर्थात् साथी अथवा संगी बनेंगे।
