कार्यकर्ता चालीसा 1

पवनसुत हनुमान प्रत्येक कार्यकर्ता का आदर्श है। स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं का आह्वान किया था कि वे महावीर हनुमान के आदर्श का अनुसरण करें। उनका चरित्र, जीवन एवं गुण सभी कार्यकर्ताओं के व्यक्तित्व विकास में पूर्ण मार्गदर्शक है। युगाब्द की 48वीं (ग्रेगोरियन पंचांग की 17वीं) सदी में समर्थ गुरु रामदास ने मारुति के मंदिरों की स्थापना कर गाँव-गाँव में बलोपासना, धर्मनिष्ठा व स्वराज्य-साधना की भावना का जागरण किया था। मारुति के सम्मुख उद्घाटित इन अखाड़ों में तैयार मावला सैनिकों से ही शिवाजी की सेना का निर्माण हुआ था।

जैसे राम के समय रावण की सत्ता व शक्ति को चुनौती देना एक असम्भव कार्य था, वैसे ही समर्थ रामदास स्वामी के समय आलमगीर औरंगजेब, प्रयाग के कवि पंडित जगन्नाथ ‘दिल्लीश्वरों वा जगदीश्वरों वा’ कहकर जिनका गुणगान करते हैं, को ललकारना मिर्ज़ाराजे जयसिंह जैसे वीर राजपूतों के लिए स्वप्न में भी अचिन्तनीय था। दोनों असम्भव कार्यों को महाबलि के नेतृत्व में अतिसामान्य बहुजन समाज ने संगठित हो कर दिखाया। वानरसेना के निर्माण में भगवान श्री रामचन्द्र का निष्ठावान सहयोगी, शिवाजी की सेना के निर्माण में समर्थ रामदास का प्रेरणास्रोत बना।

वर्तमान समय में भी अधर्मी भ्रष्ट आचरण का भोगवाद व स्वार्थ इस प्रकार मन पर हावी है कि इस अनाचार के दानव का विनाश हो ही नहीं सकता, ऐसा निराशाजनक विचार जन-सामान्य में दृढ़ हो गया है। ऐसे में धर्म स्थापना के कार्य में लगे कार्यकर्ताओं को बाहर की बाधाओं के साथ ही, मन में व्याप्त निराशा की चुनौती का भी सामना करना पड़ता है।
ऐसे में तुलसीदास रचित हनुमान चालीसा हम सबका मार्गदर्शन करता है। संगठन का कार्य करने वाले प्रत्येक कार्यकर्ता में संगठन के ध्येय के साथ ही अपने वरिष्ठ अधिकारियों के प्रति पूर्ण श्रद्धा व आदर होना आवश्यक है। वही हमें सदैव सम्बल प्रदान करता है। अतः हनुमान चालीसा के पूर्व-प्रार्थना के दोहे में तुलसीदास जी श्रीगुरु के चरणों को स्मरण कर, फिर अपने ध्येय रघुवीर के यश-गौरव का वर्णन करते हैं –
श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज-मन मुकुर सुधार। बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चार।।
जिसके मन का पुष्प गुरु की कृपा से परिपूर्ण है, वही अपने ध्येय के प्रति अडिग रहता है। वह जानता है कि अपने आचरण से वह संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है। रघुवीर के यश का वर्णन ही उसकी प्रत्येक कृति में होता है। संगठन का लक्ष्य ही, उसके जीवन का लक्ष्य बन जाता है। ऐसे में उसकी पूर्ण सफलता संगठन के कार्य को पूर्णता देने में ही होती है। यही उसका धर्म बनता है। उसकी समस्त अर्जित योग्यता, संगठन कार्य में समर्पित होती है। उसकी कामनाएँ भी संगठन के अनुशासन के अनुरूप ही होती हैं। इसी साधना से उसकी मोक्षप्राप्ति भी सम्भव हो पाती है।
पवनसुत हनुमान की जय
