
आज आषाढ़ शुक्ल एकादशी, देवशयनी एकादशी के नाम से जानी जाती है। यह चातुर्मास का शुभारंभ है। वर्षा ऋतु है, सर्वत्र सृष्टि नवसृजन में लगी है। आगामी चार मास अर्थात कार्तिक शुद्ध एकादशी, जिसे ‘देवोत्थान एकादशी’ कहा जाता है, तक विशेष अनुष्ठान होंगे। किंतु सामान्य कर्मकांड बंद रहेंगे। देवों के विश्राम का यह काल है। इसलिए अब हमें प्रसाद की अपेक्षा के बिना स्वयं संकल्प के साथ साधना करनी होगी। यह उत्सवों से भरा काल है किंतु इन सामाजिक उत्सवों में भी भक्तों को सजग रहकर दायित्व लेते हुए ही नैमित्तिक कार्य करने होते हैं। इस अद्भुत परंपरा को प्राकृतिक अर्थात् प्राण स्तर पर, सामाजिक, धार्मिक अर्थात् उपासना के रूप में और आध्यात्मिक आधार पर समझने का यत्न करते हैं।

प्रकृति का भी यह चातुर्मास है। वर्षा के कारण धरती के गर्भ में छिपे अज्ञात बीज भी इस स्नेह स्पर्श से अंकुरित हो उठते हैं। धरती सर्वत्र हरी-भरी दिखने लगती है। अनेक बहुपद, शतपद कृमि, केचुएँ, सर्पादि भूमि पर सरपटने वाले जीव, पतंग, मशक (मच्छर) जैसे अल्पजीवी कीटक ना जाने कहाँ से आ जाते हैं। वर्षा में कष्ट बढ़ने पर भी पक्षी भी प्रसन्न होते हैं। पूरी सृष्टि ही मानो आनंद मनाती है। यह प्राण के विकसन का काल है। इसलिए इस प्राणप्रगटन को ध्यान में रखते हुए ही उत्सव और परंपराएँ भारत में प्रचलित हैं। हरियाली तीज, नाग पंचमी, सागर पूजा, पोला (वृषभ पूजा), वट पूर्णिमा से वसुबारस (बछबारस) तक अधिकतर उत्सव वनस्पति, प्राणी आदि के पूजन और जीवन में महत्व को स्थापित करने के लिए होते हैं। यहाँ तक कि मध्य में आनेवाला पितृपक्ष भी प्राणों का ही उत्सव हैं। मृत्यु के पश्चात सूक्ष्म शरीर के रूप में विचरण करने वाले प्राण अर्थात् पितरों के उद्धार के लिए यह पर्व है। सतत् भ्रमण में रहनेवाले संत, साधु और मुनि भी इस काल में एक स्थान पर रहते हैं। सनातन, जैन, बौद्ध की श्रमण परंपरा में यह समानता है। अहिंसा के निमित्त अथवा उपासना के लिए सृष्टि के नवसृजन में बाधा ना बनने के लिए ही यह संचार संयम है।

सामाजिक समरसता का भी यह अद्भुत उत्स है। सारे उत्सव भिन्न-भिन्न कार्य करनेवाले विभिन्न समाजों के साथ जुड़े हैं। सागर यात्रा, नौवाहन, पट्टन कार्य (port duty), मत्स्य आदि का उत्सव है रक्षाबंधन की पूर्णिमा। क्षेत्र (खेती), कृषि, गोरक्षण से जुड़े कार्य करनेवाले सभी वर्ग इनके भी अनेक उत्सव हैं। भारत में इस बहुसंख्य कृषि निर्भर समाज का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण कालावधि है। वर्षा ऋतु पर अधिकतर खेती निर्भर होने के कारण चातुर्मास भारत के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है। सभी इसके निर्विघ्न और उत्पादक होने की प्रार्थना करते हैं। वर्ण व्यवस्था में भी जिसे स्थान नहीं मिला ऐसे स्मशान कार्य में रत चांडाल आदि समाजों को भी श्राद्धों में उत्सव का अवसर होता है। इन्हें दान देने की परंपरा पूरे देश में हैं। अतः चातुर्मास सच्चे अर्थ में सामाजिक समरसता का पर्व है।

जैसे मनुष्य का प्रकृति से प्राणिक संबंध, अन्य मनुष्यों के साथ सामूहिक संबंधों के नवीनीकरण के समान ही चातुर्मास ईश्वर से संबंधों के सुदृढ़ीकरण का भी अवसर प्रदान करता है। इसी कारण उपासना के भी सभी अवसर इस कालखंड में उपलब्ध होते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा पर गुरुपूजन, श्रावण मास में कांवड़ और अन्य शिवाभिषेक, भाद्रपद में गणेशोत्सव, अश्विन में शारदीय नवरात्रि और कार्तिक में दीपावली जैसे प्रमुख उपासना प्रसंगों के साथ ही जन्माष्टमी, रक्षाबंधन, गंगा दशहरा जैसे अनेक उत्सव भी इसी मध्य आते हैं। चातुर्मास का हर दिन ही विशेष उपासना का दिन है। अनेक व्रत, यज्ञ, कथा, कीर्तन, अभिषेक, रास, गरबा आदि का आल्हाददायक आयोजन इस पर्वावधि में होता है। उपासना भक्ति के सन्मार्गी के लिए यह अनुपम स्वर्णिम अवसर है। हिमालय के चारों धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग, सभी शक्तिपीठों के साथ लोकदेवताओं तथा ग्राम एवं स्थान देवताओं के वार्षिक उत्सव इसी पावन मासों में मनाएँ जाते हैं। व्यक्तिगत उपासना के साथ ही उसे पुनर्भावित (Recharge) करने सामूहिक उपासना का धार्मिक अवसर हर भक्त को चातुर्मास प्रदान करता है।

आध्यात्मिक साधना के लिए भी यह सर्वोत्तम मुहूर्त है। पूरी प्रकृति साधना के लिए पोषक है। ग्रह भी अनुकूल रचना बनाते हैं। भारत में प्राणप्रवाह भी ऊर्ध्व होता है। अतः किंचित यत्न भी अनंत परिणाम देते हैं। अंकुरण केवल भौतिक बीजों का ही नहीं होता, आध्यात्मिक संकल्प बीज भी इस अवधि में निश्चित फलित होते हैं। ईशत्व से परिपूर्ण पूरा जगत ही मानो साधना के लिए अनुकूल होता है। शत, सहस्र, लक्षगुणित सुफल की निश्चित प्राप्ति का अवसर चातुर्मास प्रदान करता है। अपने नित्य साधन की परिपुष्टि हेतु पुरश्चरण, कोटि जप जैसे संकल्प लेने के लिए यह अनुत्तम काल है।
शरीर-मन-बुद्धि व्यक्तित्व के सभी आयामों में संकल्प द्वारा चातुर्मास का अनुष्ठान किया जा सकता है। शरीर के स्तर पर जल तत्त्व का प्राधान्य होने से आहार के संयम हेतु कोई संकल्प लेना अत्यंत परिणामकारी होता है। स्वादेन्द्रिय तप हेतु मधु, कट्व, तिक्त, कषाय, अम्लादि षड् रसों में से किसी एक रस का त्याग कर सकते हैं। जो प्रिय हो उसका त्याग किया जाता है। किसी एक द्रव्य अथवा अन्न का त्याग भी संयम का साधन है। शरीर के साधन हेतु बल, तितिक्षा, चापल्य और संतुलन के विकास हेतु नित्य सूर्यनमस्कार, व्यायाम, योगाभ्यास, प्राणायाम आदि का संकल्प भी करना उपयुक्त है। मन के तप हेतु मौन, जप, अर्घ्य जैसे किसी नित्य साधन का संकल्प कर सकते हैं। बुद्धि की शुद्धि का भी यह अद्भुत अवसर है। अतः श्रवण-मनन-निदिध्यासन द्वारा नित्य स्वाध्याय का संकल्प अवश्य करना प्रभावी व्यक्तित्व गठन का सहायक है। वर्तमान समय में स्वाध्याय प्रवचन के सहज साधन पठन और लेखन हो गए हैं। प्रतिदिन न्यूनतम १० पृष्ठ पढ़ना और कम से कम एक पृष्ठ अथवा ५०० शब्द मौलिकता से लिखने का संकल्प लिया जा सकता है। चातुर्मास में व्यक्तिगत संकल्प के साथ ही सामूहिक साधना भी अवश्य करनी चाहिए।

ज्ञान, राज, भक्ति और कर्म इन चारों योगमार्गों के लिए यह समान रूप से परिणामकारी है। स्वाध्याय और अंतरंग योग से ज्ञानयोग की साधना हो सकती है। आसन, प्राणायाम, धारणा के द्वारा राजयोग सिद्ध करने का अवसर है। तीर्थयात्रा और उपासना से अहंकार विसर्जन कर प्राप्त परिस्थिति को प्रसाद रूप में स्वीकार कर भक्ति का साधन हो सकता है। बाढ, भूस्खलन जैसी आपदाओं में निस्वार्थ सेवा तो सभी को करनी है किंतु निष्काम भाव से सतत सेवा करना ही कर्मयोग है। ‘मैं कर रहा हूँ’ के बोध को भूलकर किया कार्य ही निष्काम होता है और सुकृत-दुष्कृत दोनों के बंधनों से मुक्त करता है। अपने-अपने स्वभाव के अनुसार संकल्प ले साधना करने से शीघ्र और बहुगुणित परिणाम मिलते हैं। संचित कर्मों से बना स्वभाव और साधना में किए पुरुषार्थ का पराक्रम दोनों एक दिशा में होने से मुक्ति मार्ग की गति बढ़ती है और यात्रा अधिक सुगम हो जाती है। कम प्रयत्नों में अधिक परिणाम प्राप्त होता है।
इसलिए चातुर्मास के प्रारंभ पर देवता शयन करने जा रहे हैं तो हम अपने धर्म का स्वयं दायित्व संभालें और चातुर्मास के लिए संकल्पबद्ध हो सजग हो जाएँ। देवता जब पुनः उठेंगे तो अपने भक्तों पर अभिमान कर सकें कि हमने जगत को सत्य संकल्प से धारण किया।
जागो कि अब देव सोएंगे।

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