
कार्यकर्ता चालीसा 4
हमारा प्रत्येक परिचय ही हमें दायित्व देता है। जैसे हम मनुष्य हैं तो अपेक्षा है कि मानवता का आचरण करें। भारतीय हैं तो हमारा देश के प्रति कर्तव्य है। जिसके पुत्र हैं उनके कुल-गौरव, सम्मान की रक्षा का भी दायित्व बनता है। कार्यकर्ता भाव इसी दायित्व बोध का दृढ़ीकरण है। कार्यकर्ता होने का भाव ही प्रत्येक कर्म में दायित्वबोध जगाता है। साथ ही प्रचण्ड मनोवैज्ञानिक सम्बल भी प्रदान करता है। संगठन का सामान्यब कार्यकर्ता भी बड़े बड़े प्रशासनिक अधिकारी से बात करने का आत्मविश्वास रखता है, क्योंकि उसको सदैव यह भान है कि उसके पीछे सारे देश में कार्य कर रहे लाखों कार्यकर्ताओं का मानसिक सम्बल है। वह सम्बल उसे प्रबल आत्मबल प्रदान करता है। इस आत्मविश्वास से ही कार्यकर्ता का प्रशिक्षण होता है और वह अनेक कुशलताओं को ग्रहण करता है। ऐसे में व्यक्तिगत अहंकार के बढ़ने का भी भय रहता है। संगठनात्मक ध्येयबोध ही इस अहंकार का विसर्जन कर सकता है। हनुमान चालीसा में गोस्वामी तुलसीदास जी हनुमान जी के परिचय में सर्वाधिक महत्व देते हैं उनके ध्येयात्मक दायित्व को…
रामदूत अतुलित बलधामा

हनुमान जी अतुलनीय बल के धाम हैं, त्रिलोक में उनके समान और कोई नहीं। बाल्यकाल में इसी बल की उद्दण्डता से उन्हें श्राप मिला किन्तु अब उनका बल ध्येय के प्रति समर्पित हो चुका है। विस्मृत शक्ति का स्मरण उन्हें जीवनध्येय के स्मरण से ही हुआ है। जब जाम्बवन्त ने कहा ‘राम काज लगी तव अवतारा’ तब हनुमान जी को अपने ध्येय के साथ ही अपने बल का भी भान हुआ। गोस्वामी जी कहते हैं – “सुनितहिं भयउ पर्वताकारा” पर यह अतुलित बल अब रामार्पित है, राम कार्य के लिए है। उन्हें अपनी शक्ति पर विश्वास भी है कि वे चाहें तो रावण के सभी साथियों को मार, लंका का आधार – त्रिकूट पर्वत उखाड़ ला सकते हैं। किन्तु दायित्व से प्राप्त समर्पण के कारण निर्णय स्वयं नहीं करते हैं। स्वयं के बल पर तो विश्वास है किन्तु आज्ञा तो संगठन-प्रमुख की ही होनी चाहिए। हनुमान जी कहते हैं – “जामवंत मैं पूँछऊँ तोही। उचित सिखावनु दीनहु मोही।।” यह रामदूत का आचरण है। यही कार्यकर्ता का आदर्श है। संगठन के प्रति समर्पण से ही आत्मविश्वास जगता है, परन्तु कार्य का आधार यह अतुलित बल नहीं अपितु दूत भाव है। संगठन का दायित्व ही परिचय है, व्यक्तिगत सामर्थ्य या कौशल नहीं। दायित्व सतत ध्येय स्मरण भी कराता रहता है। अतः मार्ग से भटकने की सम्भावना भी कम हो जाती है।
माता अंजनी व पिता वायु। हनुमान जी के कुल का वर्णन भी अपने आप में कार्यकर्ता के लिए एक प्रेरणा है। माता अंजनी तपस्विनी हैं, वीर हैं। उनका नाम भी अर्थपूर्ण है। दृष्टि के निर्मल हुए बिना ज्ञान की प्राप्ति सम्भव नहीं है। दृष्टि को निर्मल करनेवाला अंजन होता है। हनुमान दृष्टि को निर्मल करने वाले तत्व से प्रसूत हैं। अतः वे आंजनेय हैं। कार्यकर्ता की दृष्टि सदैव अपने संगठन के ध्येय पर होनी चाहिए। उसे स्वाध्यायरूपी अंजन से अपनी दृष्टि को निर्मल करते रहना चाहिए। गोस्वामी जी लिखते हैं:-

अंजनीपुत्र पवनसुत नामा
हनुमान जी पवन के पुत्र हैं। वायु – जो सबको जीवन देता है, वहन करता है। इसी वायु का गतिमान प्रवाहित रूप है पवन, सतत बहनेवाला। अपने साथ औरों को भी बहा ले जानेवाला। यही हनुमान जी का जीवन है। रामकार्य का जीवन उद्देश्य स्पष्ट हो जाने के बाद वे कभी रुके ही नहीं। आगे हनुमान चालीसा में उनके पराक्रम के अनेक उदाहरण मिलते हैं। उन सभी में उनकी गतिशीलता व सतत कार्य तत्परता ही दिखाई देती है।
कार्यकर्ता के लक्षणों में अपेक्षा हैं कि कार्यकर्ता के सिर पर बर्फ, मुँह में मिस्री व पैर में चक्र हों – इन में से तीसरा गुण कार्यकर्ता को पवनसुत बना देगा। जब कार्यकर्ता ध्येय की स्पष्ट दृष्टि से प्रेरित हो निरंतर कार्यरत रहने लगता है, तब वह बनता है – रामदूत अतुलित बलधामा, अंजनीपुत्र पवनसुत नामा।


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