जनसंख्या बोझ नहीं संतानलक्ष्मी का वरदान

Mukul Kanitkar 5 मिनट का पठन

नवरात्रि स्वाध्याय 6

जनसंख्या संपदा है या जिम्मेवारी यह प्रश्न कई सदियों से अर्थशास्त्रियों की चर्चा का विषय रहा है। धरती में प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं अतः जनसंख्या नियंत्रित ना रहे तो समस्या होगी यह तर्क देकर सभी विकसनशील देशों को परिवार नियोजन के लिए विवश किया गया। पश्चिमी देशों के वंश उच्चता (Racial Superiority) के सिद्धांत का यह एक अंग था। पश्चिम का विकास प्रतिमान अस्तित्व के लिए संघर्ष (Struggle for Existence) और केवल सुयोग्य का बचाव (Survival of the Fittest) के सिद्धांत पर विकसित हुआ। इस कारण निम्न वंश (Inferior Races) की जनसंख्या कम करने से ही उच्च वंशीय यूरोपीय लोगों के लिए पर्याप्त संसाधन बचेंगे ऐसे विचार हर्बर्ट स्पेन्सर सहित अनेक समाजशास्त्रियों ने व्यक्त किए।

द्वितीय महायुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से अमेरिका ने विश्व को अपनी सुविधानुसार आकार देना प्रारम्भ किया। अमेरिकी रणनीतिकार हेनरी किसिंजर ने तृतीय विश्व (Third world) के लिए लिखी योजना में परिवार नियोजन के द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के लिए विशेष उपाय लिखे हैं। उनका मानना था कि नैतिक व अनैतिक दोनों प्रकार के उपायों से नीच वंशों की जनसंख्या को कम करना पश्चिम के उच्च वंशी गोरे लोगों के विकास के लिए आवश्यक था। भारत और चीन को विशेष रूप से लक्ष्य किया गया। आपातकाल के समय जबरन नसबंदी जैसे जिन उपायों का प्रयोग भारत में परिवार नियोजन के लिए किया गया वे सभी शब्दशः इस वृत्तांत (report) में से लिए गए थे। ‘छोटा परिवार सुखी परिवार’ तथा बलपूर्वक अपनायी ‘एक संतान’ नीति की हानि अब चीन को भी समझ में आ रही है। भारत में अभी-अभी जनसंख्या असंतुलन पर चर्चा प्रारंभ हुई है।

अष्टलक्ष्मी में पाँचवी संतानलक्ष्मी हैं। आगामी पिढ़ी केवल परिवार के लिए नहीं, समाज और राष्ट्र के लिए भी समृद्धि का साधन है। लक्ष्मी के रूप में पुत्र/पुत्री को देखना भारत की सनातन परंपरा है। संतान में कोई लिंगभेद नहीं है। अतः ‘अष्ट पुत्र सौभाग्यवती भव’ इस आशिर्वाद में पुत्र-कन्या दोनों ही सम्मिलित हैं। कालांतर में पुत्र को महत्व देने की विकृति आयी जिसके परिणामस्वरूप कन्या भ्रूण हत्या के समान कुप्रथाओं का जन्म देश के कुछ भागों में आया। किन्तु मूल संस्कारों में समर्थन ना होने से दशक मात्र के सघन प्रयास से यह विषमता कम हो गयी। हरियाणा-राजस्थान जैसे राज्य ‘बेटी बचाओ’ की सामाजिक क्रांति के उत्तम उदाहरण हैं।

संतानलक्ष्मी जनसंख्या को समृद्धि का साधन मानने के सिद्धांत का आध्यात्मिक रूप है। संतान का अर्थ ही सातत्य (Continuity) है। संस्कृति की निरंतरता का दायित्व जिनपर है वे संतति या संतान हैं। इसलिए हर पिढ़ी को पूर्व से अधिक विकसित होना होता है। इससे मानवता का सतत् विकास संभव है। सही शिक्षा, कौशल और अवसर की सुनिश्चितता की जाए तो जनसंख्या बोझ नहीं अपितु संपदा बनती है।

आज सारा विश्व ठोकर खाकर इस बात को समझ रहा है। यूरोप में मूल जनसंख्या इतनी कम हो गई है कि अब अधिक बच्चों के लिए पुरस्कृत करने की योजनाएँ बनानी पड़ रही हैं। विवाह और परिवार संस्था का ही क्षरण हो जाने के कारण यह और भी कठिन होता जा रहा है। दूसरी ओर चार-चार शादियों की अनुमति वाले कट्टरपंथियों की संख्या शूकरवत् बढ़ रही है। अब यूरोप के अनेक देश शरीया की चपेट में आने की कगार पर पहुँचें हैं। फ़्रांस, ब्रिटन, इटली सहित अनेक स्थानों पर इस विषय पर असंतोष सड़कों पर आ रहा है।

किसी भी एकपत्नी परंपरा वाले सभ्य समाज में जब तक हर दंपति के तीन संतान ना हो तब तक जनसंख्या का अनुपात नहीं बना रह सकता। सांख्यिकीय गणना में सकल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) कम से कम 2.1 प्रति महिला कहा गया है। वर्तमान स्थिति में भारत के बहुसंख्य शिक्षित परिवार 1-2 बच्चों तक ही सिमट गए हैं। दूसरी ओर विपन्न समुदायों में अधिक संतानोत्पत्ति हो रही है। इससे सांप्रदायिक और आर्थिक असंतुलन हो रहा है। अतः तीन संतान परिवार को सभी स्तरों पर बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

मूल विषय समाज के मानस का है। प्रजा को बोझ मानने का विचार जबतक प्रचलन में रहेगा तब तक इस स्थिति में सुधार नहीं है। बढ़ी जनसंख्या केवल जिम्मेवारी नहीं है संसाधन भी है। 140 करोड़ जनसंख्या में इतने पेट भरना प्रश्न नहीं रहेगा यदि 280 करोड़ हाथों को उत्पादक कार्य का संकल्प, कौशल और अवसर हम प्रदान कर सकें। संतानलक्ष्मी से यही प्रार्थना है कि सनातन भारतीय समाज और हिंदूराष्ट्र को इस महत्वपूर्ण दायित्व को निभाने का सामर्थ्य और प्रेरणा दोनों का प्रसाद प्रदान करें।

पंचमी नवरात्रि की देवी स्कन्दमाता हैं। ये देवताओं के सेनापति षण्मुख स्कन्द की जननी का रूप हैं। सिंहवाहिनी माता की गोद में छह मुख वाले स्कंद, कार्तिकेय विराजमान हैं। माता का शिवजी से विवाह ही इस ध्येय के साथ हुआ कि असुरनिर्दलन हेतु देवताओं की सेना के सेनापति को जन्म दे सकें। आज के विषय के अनुरूप ही यह स्वरूप है। विवाह का उद्देश्य भोग नहीं उदात्त सन्तति को जन्म देना ही रहा है। आज फिर इस जागरण को करने की आवश्यकता है। स्कन्दमाता देवी भारतीय समाज को पुनः इस उदात्त ध्येय की ओर अग्रसर करें यही विनम्र निवेदन। 🙏🏻

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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