नवरात्रि स्वाध्याय 5

विकास का एक प्रमुख आधार संचार व्यवस्था है। अनादिकाल से जो समाज परिवहन के मार्ग विकसित कर पाए वे ही आर्थिक विकास में आगे बढ़े। भारतीय संस्कृति में इस बात को सदा से ही महत्व दिया गया है। सहस्रों वर्षों पूर्व ही उत्तरापथ, दक्षिणापथ जैसे महामार्गों का प्रचलन भारत में रहा है। उत्तरापथ के मार्ग से ही भारत का पूरे विश्व में व्यापार चलता था। हिमालय पार से छात्र भी इन्ही मार्गों से भारतीय विश्वविद्यालयों में आते थे। व्यापार के साथ ही संस्कृति के संचार और प्रचार में इन प्रगत मार्गों ने बड़ी भूमिका निभाई है। भारत में आए अनेक विदेशी प्रवासियों ने भारत की समृद्धि और सामर्थ्य का आश्चर्य के साथ वर्णन किया उसमें इस आधार संरचना का बड़ा योगदान है।

अष्टलक्ष्मियों में चतुर्थ लक्ष्मी गजलक्ष्मी हैं। इनका स्वरूप दो हाथियों से सुशोभित है। हाथी ये सबसे पुरातन वाहन है। देवताओं के प्रमुख इन्द्र का भी यह वाहन है। अतः गजलक्ष्मी का प्रतीक यही संकेत करता है कि संचार भी समृद्धि का एक मुख्य कारक है। व्यापारी, कच्चा माल, उत्पाद इन सभी का निर्बाध परिवहन किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है। इसी कारण यह अष्टलक्ष्मी में स्थान पाता है। अष्टलक्ष्मी की संकल्पना ही भारत के समग्र एवं एकात्म विकास की द्योतक है। हिंदू जीवनदृष्टि में महालक्ष्मी की उपासना केवल आर्थिक विकास के लिए नहीं है अपितु सम्पूर्ण जीवन को समृद्ध बनाने के लिए है। गजलक्ष्मी भी इस समग्र प्रतिमान का एक अंग है।

भारत में केवल भूमार्ग ही नहीं जलमार्ग भी प्रचलित थे। व्यापार के लिए अंतर्गत एवं सामुद्रिक जलमार्गों का उपयोग भारत में अनादि काल से होता रहा है। नदियों के किनारे संस्कृति के विकास का यह एक प्रमुख कारण था। सत्यनारायण की कथा में भी वाणी द्वारा समुद्री मार्ग से व्यापार हेतु जाने का संदर्भ आता है। अगस्त्य संहिता में नावगति के केवल सिद्धांत ही नहीं सचित्र वर्णन भी प्राप्त होते हैं। यूनानी संस्कृत विद्वान निकोलस कज़ानस के अनुसार नावगति से ही ग्रीक भाषा में होते हुए इंग्लिश में नेविगेशन यह शब्द रूढ़ हुआ है। अगस्ति द्वारा सिंधु को एक आचमन में पी जाने के पौराणिक आख्यान का भी मौलिक अर्थ यही है की समृद्ध नौकानयन के द्वारा अगस्ति जी ने सागर पर विजय पायी थी। चोल साम्राज्य में भी समुद्रपार व्यापार के अनेक उल्लेख मिलते हैं। सागर किनारे अनेक पत्तन हैं ही किंतु गोदावरी, कावेरी जैसी नदियों के किनारे भी पत्तन नामक नगर मिलते हैं। ओडिशा में आज भी पूरी से बाली यात्रा के शुभारंभ का बाली महोत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इसी समृद्ध विश्व-संचार के माध्यम से भारत विश्वगुरु के साथ ही जन-जन की आवश्यकता की आपूर्ति कर विश्वमित्र और विश्वबंधु भी बना।

ब्रिटिश उपनिवेश की स्थापना के समय तक भारत की नदियों और सागर मार्ग से व्यापार के प्रमाण मिलते हैं। अंग्रेज़ों ने रेल मार्ग का प्रसार करने हेतु जलमार्ग दुर्लक्षित किये। भारत की विशेषता यही है सभी आक्रमणों को अवसर में परिवर्तित करता है। आज भारत का रेलमार्ग जाल अपने विस्तार और लंबाई में विश्व में अग्रणी है। यात्री संख्या में तो विश्व के 180 देशों की जनसंख्या से अधिक लोग किसी भी समय भारतीय रेल में होते हैं। सड़क परिवहन में भी भारत आज विश्व के प्रमुख 2-3 देशों में एक है। विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने में इस परिवहन संजाल का भी बड़ा योगदान है।

समयानुकूल संचार के साधन भी परिवर्तित होते हैं। आज जितना महत्व परिवहन का है उतना ही सूचना के प्रगत और त्वरित प्रसारण का भी है। अतः महामार्गों के साथ ही सूचना महामार्ग का संजाल भी अनिवार्य है। आज भारत इस क्षेत्र में भी अग्रणी है। दृष्टि तार (Fibre optic) का सुदूर गांवों तक पहुँचाना भी गजलक्ष्मी की पूजा का माध्यम है। बेतार भ्रमणध्वनि (Mobile) में भी भारत में सबसे सस्ता और तेज तंत्र (Network) सर्वत्र उपलब्ध है। इन्हीं सब कारणों के चलते अमेरिकी इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल से लेकर चीनी राष्ट्राध्यक्ष शी जिंग पिंग तक सभी भारत की सतत वृद्धिंगत अर्थव्यवस्था को मस्त गज की उपमा देते हैं।
चतुर्थ नवरात्रि की माता कूष्मांडा है जो सृष्टि का गर्भधारण करती हैं। इस रूप में वे सृजन को बढ़ावा देती हैं। आज हमारे नवयुवकों को इस सर्जनशक्ति के आशिर्वाद की भी महती आवश्यकता है। माता गजलक्ष्मी और कूष्मांडा दोनों की कृपा भारत पर बरसती रहें और हम अपने विश्व-संचार से विश्वमित्र बने रहें।

भूगोल के विद्यार्थियों के लिए उत्तम दिशाबोध भाई साहब 🙏
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