नवरात्रि स्वाध्याय ३

विश्व में युद्ध भूमि के लिए या संसाधनों के लिए होते रहे हैं। अभी तीन वर्ष से चल रही रशिया और यूक्रेन के युद्ध का कारण धान की खेती है। यूरोप में चावल का सर्वाधिक उत्पादन यूक्रेन में ही होता है। इसे यूरोप का भात का कटोरा (Rice Bowl of Europe) कहा जाता रहा है। उसी उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण हेतु रशिया ने यूक्रेन के पूर्वी हिस्सों पर आक्रमण किया। यूरोप के देश भी अन्न सुरक्षा के कारण ही यूक्रेन का इस पराजय की निश्चित वाले युद्ध में भी साथ दे रहे हैं। जल-ऊर्जा-अन्न सुरक्षा (Water-Energy-Food nexus) का त्रिकोण अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक प्रमुख कारक बना है। मैत्री और विरोध दोनों ही इन विषयों पर निर्भर हैं।

भारत में अनादि काल से अन्न के महत्व को समझा गया। “अन्नम् बहु कुर्वित।” एक वेद मंत्र है। वेदों का आदेश है कि प्रचुर मात्रा में अन्न का उत्पादन हो। कोई भूखा ना रहें। वेदों का यह भी आदेश है कि अन्न का व्यापार नहीं करना है। ‘अन्नम् – गृहम् – वैद्यम्’ ये तीनों विना शुल्क उपलब्ध कराने की व्यवस्था भारत में रही है। आज भी अनेक सामुदायिक और सांप्रदायिक व्यवस्थाओं में भोजन सभी के लिए निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। अन्नक्षेत्र और लंगर भी लगभग सभी स्थानों पर बड़ी संख्या में होते हैं। बड़े महानगरों के अपवाद को छोड़कर भारत में कोई भूखा रहे यह बड़ा दुर्लभ है।

अष्टलक्ष्मी में तीसरी है धान्यलक्ष्मी। यह अन्न की देवी है। इनका स्वरूप भी पोषणकर्ता है। वस्त्र हरित हैं। आठ भुजाओं में धान की बाली, केले का गुच्छ, गन्ना, कमल, शंख, चक्र, गदा और अभय मुद्रा है। धान्यलक्ष्मी माता समाजपोषण हेतु प्रचुर मात्रा में भोजन उत्पादन का आशीष प्रदान करती हैं। खेती के सभी प्रमुख कार्यों में इनके पूजन का विशेष लाभ प्राप्त होता है। अतः बुवाई से पूर्व और फसल कटाई के बाद अन्न पूजा में धान्यलक्ष्मी का स्मरण, आवाहन और पूजन किया जाता है। भारत में सदियों से धन से अधिक धान्य का महत्व माना गया है। इसलिए बोलचाल की भाषा में भी धन-धान्य का प्रयोग साथ ही होता है। राज्य में धान्य भांडार भरे होना विकास का एक महत्वपूर्ण परिमाण माना जाता है।

वर्तमान व्यावहारिक अर्थतंत्र (Transactional Economics) के युग में भी इसका पर्याप्त स्थान है। भारत में 55-60 वर्ष पूर्व हुए अनाज के अभाव में ही अमेरिका से अत्यंत निकृष्ट गेहूं को मंगवाया गया था। लाल बहादुर शास्त्री ने पूरे देश को सोमवार का व्रत रखने का आह्वान किया ताकि विदेशी अनाज को आयात ना करना पड़े। शास्त्री जी की शंकास्पद मृत्यु के पश्चात इंदिरा गांधी की अल्पमत सरकार ने अमेरिका से गेहूं मंगवाए। बंकिम ने “सुजलाम सुफलाम” कहकर जिस भारतमाता का गुणगान किया था उसी को अक्षम नेतृत्व के कारण अन्न के लिए कटोरा फैलाना पड़ा। समाज ने इसे मन पर लिया और भारत में अनाज का विक्रमी उत्पादन हुआ। अब कई वर्षों से भारतीय अन्न निगम (Food Corporation of India) के भांडार अतिरिक्त अनाज से भरे हैं। देश के 80 करोड़ लोगों को करोना महामारी के बाद से निःशुल्क अनाज उपलब्ध कराने के बाद भी धान्य का निर्यात करनेवाला देश भारत बना है। शास्त्री जी के आह्वान पर साप्ताहिक व्रत रखनेवाले कई वृद्धों ने युगाब्द 5105 अर्थात् 2003 में भारत द्वारा अमेरिका को तूफान में सहयोग हेतु दो जहाज भरकर अनाज भेजा गया तब अपने व्रत का उद्यापन किया।

किसानों का परिश्रम, नेतृत्व की दृढ़ता के रूप में धान्यलक्ष्मी का आशिर्वाद भारत को निरंतर मिल रहा है। यह विषय बड़ा ही गंभीर (Critical) है। संभवतः इसी हेतु इस वर्ष नवरात्रि में तृतीया दो दिन है। अतः कल भी धान्यलक्ष्मी का ही स्वाध्याय करेंगे। तृतीया की देवी चंद्रघंटा का भी स्मरण किया जाएगा।
