नवरात्रि स्वाध्याय १

शक्ति की पूजा का उत्सव प्रारंभ हुआ है। यह भगवती की साधना का पर्व है। भारत सदा से ही शक्ति के सभी रूपों की आराधना करता रहा है। विद्या की देवी महासरस्वती की पूजा ज्ञान के परमोच्च अनुसंधान से हमारे मनीषियों ने सदा ही की है। महादुर्गा की अर्चना वीरता के परम साधन बलोपासना के द्वारा भारत के राजर्षियों ने निरंतर रखी। इसी ने हमारी रक्षा की है और आज भी यही वीरव्रत एकमात्र साधन है। जीवन के महत्वपूर्ण आयामों को आध्यात्मिक साधना के मार्ग बनाना हिंदू जीवनपद्धति की विशेषता है।

जीवन के तीसरे प्रमुख आयाम में भगवती का महालक्ष्मी रूप है। कृषि, गोरक्ष, उद्यम और वाणिज्य द्वारा महालक्ष्मी की साधना होती है। यह केवल आर्थिक विकास की बात नहीं है। जैसे तैसे येनकेन प्रकारेण पैसा कमाना यह जीवन का लक्ष्य नहीं है। महालक्ष्मी की उपासना समग्र, एकात्म और सार्वभौम विकास का भारतीय प्रतिमान है। इसीलिए महालक्ष्मी के आठ रूप हैं। अष्टलक्ष्मी के रूप में भारतीय आर्थिक चिंतन के सभी आयामों का स्वाध्याय इस नवरात्रि में करने का विचार है।

अष्टलक्ष्मी में प्रथम है आदिलक्ष्मी। यह महालक्ष्मी का मूल रूप है। पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन में आदिलक्ष्मी का अवतरण हुआ। यह भगवान विष्णु की अर्धांगिनी बनी। इन्होंने ही गर्भ धारण कर पूरी सृष्टि को जन्म दिया। अतः वे सृष्टि की जननी आदिशक्ति है। इनका स्वरूप कमलासना है। चार हाथ वरदान और अभय प्रदान करते हैं। यह महालक्ष्मी का मूल रूप माना जाता है। आदिलक्ष्मी की साधना का फल केवल भौतिक ही नहीं आध्यात्मिक भी होता है।

आदिलक्ष्मी के इस पौराणिक आख्यान की सामयिक व्याख्या करने से धर्माधिष्ठित विकास (Dharma-based — sustainable Development) के कुछ सूत्र हमें मिलेंगे। भारत की समृद्धि का आधार सदा से ही उत्पादन रहा है। आदिलक्ष्मी जननी है अर्थात सृजन की देवी है। भारतीय अर्थ चिंतन में सर्वाधिक प्रतिष्ठा तथा उच्चतम स्थान कृषि को ही रहा है। उत्तम कृषि, मध्यम व्यापार और अधम चाकरी ये भारत में आजीविका की श्रेणियाँ रही हैं। खेती तो कृषि का केवल एक हिस्सा है। इसमें एक बीज के बोने से सहस्र गुना उपज होती है। प्रकृति में यही एकमात्र मूल उत्पादन है। आगामी सभी उत्पादन (Manufacturing) तो रूपांतरण मात्र है। जैसे खेती में रूई (कपास) का उत्पादन होता है। उसी से धागे और फिर वस्त्र, परिधान बनते हैं। पूरी प्रक्रिया को ही ‘कृषि’ कहा जाता है। मूल उत्पादन खेती से होता है। इस भाव से कालांतर में कृषि का भावार्थ केवल किसानी तक सीमित हो गया। ‘कर्षण’ अर्थात् आकर्षित करनेवाले बल से कृषि शब्द बना है। अतः इसका अर्थ सभी प्रकार के उत्पादक कार्य से जुड़ा है। अतः जब हम कहते हैं कि भारतीय समृद्धि कृषि पर आधारित है तब हम समग्र औद्योगिक उत्पादन की बात कर रहे होते हैं। भारतीय शास्त्रों में खेती के सबसे प्रधान उत्पादन अन्न का विक्रय वर्जित है। अन्न का प्रयोग तो समाज के पोषण के लिए विनामूल्य (free of cost) ही होता रहा है। अतः औद्योगिक उत्पाद और उनके स्रोत सामग्री (कच्चे माल — raw material) के रूप में खेती के उत्पाद भारतीय समृद्धि का आधार रहे हैं। खनिज संपदा भी औद्योगिक उत्पादन की एक अन्य मौलिक स्रोत सामग्री है किंतु इसका स्थान खेती से गौण है क्योंकि लक्षावधि वर्षों से भूगर्भ में संग्रहित खनिजों को निकाल ही सकते हैं। उसी गति से उनका पुनर्भरण (replenishing) संभव ही नहीं है। अतः धार्मिक उद्यम में खनिकर्म का प्रयोग न्यूनतम आवश्यकता तक सीमित होना अपेक्षित है।

आदिलक्ष्मी की उपासना अभ्युदय (Material Growth) से अधिक निःश्रेयस अर्थात् आंतरिक उन्नति (Inner Development) का प्रसाद भी प्रदान करती है। अतः अर्थतंत्र में भी उपभोग में संयम अथवा नियंत्रण (Controlled Consumption) ही भारतीय प्रतिमान रहा है। उत्पादन में पर्याप्त भरण (Abundant Production) किंतु उपभोग में संयम यही भारत की समृद्धि का मंत्र है। इसी से भारत ने विश्वभर में व्यापार के साथ ही संस्कृति का प्रसार भी किया।

नवरात्रि में प्रतिपदा की देवी शैलपुत्री भी इन्हीं सब प्रतीकों को साकार करती हैं। पर्वत की पुत्री भी जननी के कर्तव्य पालन हेतु ही शम्भू की साधना करती हैं। आदिलक्ष्मी भी क्षीरसागर में भगवान नारायण की चरण सेवा कर यही संदेश दे रही हैं कि बिना आध्यात्मिक उन्नति के सारी समृद्धि अधूरी है। आइए संतुलित विकास के प्रतिमान समुत्कर्ष को पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु आदिलक्ष्मी की प्रार्थना करें 🙏🏻

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