अधिशील और अधिचित्त के बाद शिक्षा का अगला स्तर है अधिप्रज्ञ। इसमें बुद्धि के स्तर पर शोधन का कार्य किया जाता है। अशुद्ध बुद्धि केवल भेद को पहचानती है। एकत्व के दर्शन हेतु बुद्धि शुद्ध होना अनिवार्य है। शुद्ध अथवा परिष्कृत बुद्धि ही दृश्यमान विविधता के परे अंतर्निहित एकत्व को देख सकती है। बुद्धि का कार्य तुलना से होता है। चित्त में संग्रहित संस्कारों तथा सूचनाओं के साथ मन द्वारा ग्रहित सूचनाओं की तुलना द्वारा बुद्धि निष्कर्ष पर पहुंचती है। इस निष्कर्ष से ही मनुष्य की क्रिया निर्धारित होती है। इसलिए निष्कर्ष का अचूक होना आवश्यक है। तुलना में जहां भेद देखने है वही समानता भी देखनी होती है। अतः विश्लेषण अर्थात् खंड खंड विभाग करके समझने के साथ ही संश्लेषण अर्थात् विविध भाग जोड़ कर पूर्ण को जानना भी आवश्यक है। इस हेतु बुद्धि का परिष्कार शिक्षा में किया जाना अपेक्षित है।
अधिप्रज्ञ स्तर आयु के 12-14 वर्ष में प्रभावी रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। वर्तमान शिक्षा में यह 6-8 कक्षा की शिक्षा का स्तर है। आधुनिक शब्दावली में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में तार्किक विचार क्षमता (Critical Thinking Ability) को इस स्तर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिगम बताया है। प्रज्ञा तर्क से अधिक गहन अधिगम से प्राप्त होती है। केवल निश्चय करने का कार्य बुद्धि करती है। यह तात्कालिक परिस्थितियों में उपयोगी होता है। इसमें तर्क का प्रयोग सहजता से होता है। किंतु दीर्घकालीन तथा अधिक जटिल परिस्थितियों में जीवन के निर्णय केवल ऊपरी तर्क पर नहीं लिए जा सकते। उस हेतु अधिक सटीक अथवा कुशाग्र (Sharp) बुद्धि की अपेक्षा होती है। अनेक गणनाओं तथा परस्पर पूरक वा विपरीत स्थितियों का एकत्र विचार कर निर्णय लेने की क्षमता जब परिष्कृत बुद्धि में निर्माण होती है तब इस अधिक शुद्ध करण को मेधा कहते है। ऐसी बुद्धि के धारक को मेधावी कहा जाता है।

बुद्धि का कार्य भी स्वाभाविक रूप से अहं के विस्तार अथवा संकुचन से प्रभावित होता है। बुद्धि के निर्णय इस अभिनिवेश से ही होते है और परिणामतः किए कर्म बंधन का निर्माण करते हैं। शुभ कर्म सुकृत और अशुभ कर्म दुष्कृत के निमित्त बनते हैं। चित्त में इनके संस्कार और संग्रहित होते हैं और नए बंधनों को जन्म देते है। गीता इसका उपाय कर्मयोग के रूप में बताती है। निश्चयात्मिका बुद्धि के स्थान पर व्यवसायात्मिका बुद्धि की चर्चा करती है। जब लक्ष्य निर्धारित कर एकाग्र बुद्धि को प्रयोग किया जाता है उसे व्यवसायात्मिका कहते है।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन |
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ||भ गी 2:41||
ऐसी बुद्धि से युक्त होकर किया कर्म ही कुशल माना जाता है क्योंकि वह सुकृत और दुष्कृत दोनों को ही नष्ट करता है।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभेसुकृतदुष्कृते |
तस्माद्योगाययुज्यस्व योग: कर्मसुकौशलम् || भगी 2:50||
यह बुद्धि के परिमार्जन की स्थिति मेधा से परे की है। ऐसी एकात्म बुद्धि पूर्ण विमल होती है इसलिए उसे प्रज्ञा कहते है। प्रज्ञा कर्म के उद्देश्य को परिष्कृत करती है। कर्म का प्रभाव कार्य से नहीं उद्देश्य से होता है। अतः प्रज्ञा कर्म को भी शुद्ध करती है। उद्देश्य का निर्धारण विवेक द्वारा होता है। विवेक का स्तर पशुवत् भय- अभय तथा लाभ हानि से प्रारंभ कर मनुष्य में क्रमशः न्याय-अन्याय तथा धर्म- अधर्म तक विकसित होता है। इससे शुद्ध विवेक सत् असत् के स्तर पर होता है। ऐसी प्रज्ञा को ऋतंभरा प्रज्ञा कहते है जिस स्तर पर ईश्वर और नश्वर को ठीक से जानकर कर्म होता है।
शिक्षा में न्याय और धर्म के स्तर पर प्रज्ञा विकास आवश्यक है।परिवार, समाज और राष्ट्र जीवन में सुव्यवस्थित कर्तव्य पालन के लिए यह आवश्यक है। आगे सत् की साधना व्यक्तिगत हो जाती है। धर्म का संस्कार बुद्धि में जागृत करने के लिए चुनौती का अनुभव, प्रसंग अध्ययन (case study), भूमिका अभिनय (role play) जैसे उपाय प्रभावी होते हैं। हमारे एक शिक्षक छात्रों को चर्चा हेतु व्यावहारिक परिस्थिति देते थे। जैसे रात को निर्जन चौराहे पर लाल बत्ती होने पर प्रतीक्षा करेंगे क्या ? यदि हाँ तो क्यों और ना तो क्यों ? या फिर किराना दुकानदार द्वारा भूल से अतिरिक्त राशि देने पर लौटाएँगे अथवा नहीं? दोनों के कारणों पर चर्चा होती थी। ऐसे उपायों से प्रज्ञा में धर्म दृष्टि विकसित होती है।

नवरात्रि के षष्ठी की देवी है कात्यायनी। कात्य गोत्र के ऋषि कात्यायन की तपस्या से यह नाम आया है। कुछ पौराणिक आख्यानों के अनुसार महिषासुर के विनाश हेतु देवताओं ने अपने तेजांश को दृष्टि से प्रदान किया। इस प्रचंड तेज को स्वरूप प्रदान करने की शक्ति केवल ऋषि कात्यायन में थी। उन्होंने माँ दुर्गा को सिंहवाहिनी का रूप दिया। इस कारण षष्ठी की देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। कुछ अन्य संदर्भों में महर्षि कात्यायन द्वारा पराम्बा की कठोर उपासना देवी को पुत्री के रूप में पाने के लिए की गई। प्रसाद स्वरूप देवी ने उनकी कन्या के रूप में जन्म लिया और इस कारण उनका नाम पड़ा कात्यायनी। माँ का स्वरूप भव्य है वे स्वर्णिम आभा से भासित है। चार भुजाओं में से दाहिनी दोनों में अभय और वर मुद्रा है और बाईं ओर तलवार और कमल हैं। माँ का स्वरूप प्रज्ञा के विकास का द्योतक है। भेदबुद्धि को तलवार काटती है और एकात्म भाव का जागरण पंक में भी खिलता कमल करता हैं। अभय और वर मुद्रा धर्म और न्याय विवेक को दर्शाती। धर्मपालन ही भय को दूर करता है और न्याय बोध ही वर प्रदान कर सकता है।
महिष मानव के भीतर अवशिष्ट पशुत्व का प्रतीक है सब देवताओं के तेजांश से संगठित माँ कात्यायनी ही उस पर आरूढ़ हो उसका मर्दन करती हैं और प्रज्ञासिंह की सवारी कर जीवन के दैवी उद्दिष्ट की ओर अग्रेसर करती हैं।

भैया बहुत ही सुन्दर।
~ निखिल गोयल
सटीक व सरल विवेचन