पशु-असुर का अधिलवण दिव्यत्व का प्रस्फुटन

Mukul Kanitkar 4 मिनट का पठन

अधिजनन के द्वारा अच्छी प्रजा का निर्माण तथा अधि- अयन अर्थात् अध्ययन के द्वारा मनुष्य के जीवन-गठन का मार्ग प्रशस्त करने के साथ ही अतिरिक्त, अनावश्यक वृद्धि का नाश करना भी शिक्षा का उद्देश्य है। इसे अधिलवण कहते है। पाषाण से मूर्ति बनाने की प्रक्रिया यही है। पाषाण खंड में मूर्ति पूर्व से विद्यमान है। केवल अनावश्यक हिस्सों को छिन्नी से हटाना मात्र है और विग्रह स्वतः प्रगट हो जाएगा। उसी प्रकार प्रत्येक मानव में पूर्णत्व पूर्व से ही विद्यमान है उसे प्रगट करना ही अधिगम प्रक्रिया का उद्देश्य है। इस हेतु ‘हेय’ अर्थात् जिसका त्याग करना, छाँटना आवश्यक है उसका भी भान अनिवार्य है। गीता के सोलहवें अध्याय में दैवी संपद का विवरण करने के बाद भगवान आसुरी संपद का भी विस्तार से वर्णन करते है और उसके विमोक्ष का उपाय भी बताते है।  

self Made

शिक्षा की दिशा अंदर से बाहर की ओर होती है बाहर से अंदर की ओर नहीं। सूचना उत्प्रेरक के रूप में बाहर से अंदर की ओर जाती है  और ज्ञान अंदर से बाहर की ओर उद्घाटित होता है। केवल सूचना के सम्प्रेषण को शिक्षा नहीं कहा जा सकता। अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति को जब शिक्षा समझा जाएगा तब विधि का शीर्षासन ठीक हो जाएगा। जानकारी ठुसने के स्थान पर प्रयोग और अनुभूति से ज्ञान साक्षात्कार का यत्न प्रारंभ होगा और तप ही शिक्षणविधि बन जाएगी। 

Mata Chandraghanta

तृतीय नवरात्रि की आराध्या माता चंद्रघंटा हैं। माँ के भाल पर चंद्राकार घंटा है। चंद्र जहां शीतलता प्रदान करता है वही घंटानाद से माँ शत्रुदलन करती है। संहार में भी शांतमन रहना अपेक्षित है। गीता कहती है – यूध्यस्व विगतज्वरः। घंटा निनाद शब्द का प्रतीक है। शब्द अथवा ध्वनि के सूरमय होने से असुर नाश भी अधिलवण का ही उदाहरण है। माँ चन्द्रघंटा दशभुजाओं में शस्त्र धारण किए बाघ अथवा सिंह की सवारी करती है। शस्त्र भी शास्त्र के समान ही शिक्षा का आवश्यक अंग है। विविध प्रकार के त्याज्य को हटाने नानाविध आयुध प्रयोग में लेने होते है। देवी के आयुध जीवन के तथ्य को स्पष्ट करते है कि जीवन में सृजन और संहार साथ साथ चलते है। जीवन के लिए सर्जन जितना आवश्यक है उतना ही संघात भी अनिवार्य है। देवी मातृ स्वरूपा होने से जननी है साथ ही शिव की शक्ति होने के कारण शस्त्र धारी काली भी है। 

मानव शरीर में भी चय- अपचय साथ चलता है। प्रत्येक क्षण लक्षावधि कोशिकायें मरती है और अन्य लक्षावधि नवसृजित हो उनका स्थान लेती है। मनुष्य के जीवित रहने के लिए नव कोशिकाओं के जन्म के साथ ही कोशिका का मरना भी आवश्यक है। यदि कोई कोशिका शरीर का अनुशासन मानने से नकार देती हैं और समय से मरती नहीं तो वह कर्करोग का कारण बनती है। इस विकृत कोशिका से ही गाँठ बनती है। अनुशासनहीन कोशिका अन्यों में इस विकार को फैलाती है और पूरे शरीर के मरण का कारण बनती है। जो कोशिका शरीर के लिए नहीं मरती वह पूरे शरीर को ही मारती है। विराट पुरुष राष्ट्र का भी ऐसा ही है। जिसके राष्ट्रांग देशहित मरने को तत्पर नहीं है उसका विखंडन और पतन निश्चित है। शिक्षा में यह अंगभाव जागृत कर धर्म अर्थात् कर्तव्य हेतु बलिदान करने की तत्परता भी एक महत्वपूर्ण अधिगम फलित है। 

बाघ या सिंह मनुष्य के पराक्रम का प्रतीक है। साहस, बल और वीरता पर जब दैवी शक्ति आरोहण करती है तब ही वह पशुत्व से देवत्व की ओर अग्रसर होता है। मानव में भी यह दोनों ही हैं। पशुत्व का अधिलवण दिव्यत्व प्रस्फुटन का मार्ग है । 

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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  1. विषय से लेकर सारांश तक उच्च कोटि की जानकारी

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