स्वभाव, स्वधर्म और स्वकर्म द्वारा ही स्वतंत्र का निर्माण

Mukul Kanitkar 6 मिनट का पठन

विचार नवरात्रि – 4

देवी जगत्जननी है इसका अर्थ केवल यह नहीं है कि उसने विश्व को जन्म दिया है। भारत में हर जन्म ही दिव्य है। प्रत्येक रूप में ईश्वर ही अवतरित होता है। हम दिव्य के अंश नहीं, स्वयं दिव्यता ही हर रूप में अभिव्यक्त हुई है। इसी के चलते भारत में सभी नाम अर्थपूर्ण, पावन और ईश्वराभिमुख होते हैं। हर देवता के सहस्रनाम स्तोत्रबद्ध कर अर्चना में प्रयुक्त होते हैं। यह सभी नाम गुणवाचक अथवा महिमा दर्शक होते हैं। ये सब नाम घर के नवीन सदस्य के नामकरण का आधार बनते हैं। देवताओं के नाम रखने के पीछे दो उद्देश्य बताए जाते हैं। एक तो उस नाम से परिचय होने के कारण जीवन को एक आदर्श और उद्देश्यI मिल जाता है कि इस नाम को अपने पराक्रम और आचरण से साकार किया जाए। दूसरी बात पूरा परिवार उस नाम से पुकारता है तो उनका भी अनायास नामस्मरण और जप हो जाता है। देश की सभी भाषाओं में बालक बालिकाओं को इसी प्रकार के अर्थपूर्ण नाम देने की अखंड परम्परा है। आधुनिकता के प्रभाव में नवीनता की आस में कभी-कभी विपर्यास हो जाता है अथवा मिंटू, पिंटू, मोनू, बबलू, पिंकी, रिंकी, लड्डू, गुड़िया जैसे अर्थहीन नाम भी प्रचलित हो जाते हैं। इसका बालक/ बालिका के स्वभाव, व्यवहार और भविष्य पर विपरीत परिणाम होता है।

चतुर्थी की देवी कूष्माण्डा है। विश्व उत्पत्ति के ब्रह्म अण्ड के धारण करने के कारण यह नाम पड़ा है। नवरात्रि में होनेवाली घटस्थापना तथा साथ में बोए जानेवाले बीजों का अंकुरण भी इसी जन्म की दिव्यता का प्रतीक है। ईश्वरीय रचना का मूल स्वयं ब्रह्म की एक से बहू होने की इच्छा है — एकोऽहम् बहु स्याम् । इसलिए वही एक स्वयं ही नानाविध रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। केवल अनेक नहीं, केवल विविध नहीं, नानात्व दिव्यता का प्रमुख लक्षण है। प्रत्येक ईश्वरीय अभिव्यक्ति अद्वितीय (Unique) है। पेड़ के दो पत्ते भी पूर्णतः समान नहीं हैं। जगत् की लीला में मानव सहित प्रत्येक प्राणी की रचना, कार्य और भूमिका अद्वितीय है। हमारे परिचय का आधार हमारी उँगलियों के चिन्ह (निशान) जैसे अद्वितीय हैं वैसे ही प्रत्येक का जीवनध्येय, कार्य और उसके परिवार, समाज, राष्ट्र में उसकी भूमिका भी अद्वितीय है। इस प्रत्येक की समग्र विशिष्टता को ही पारिभाषिक (तकनीकी) शब्दावली में चिति कहते हैं। चिति को व्यक्त करता है वह व्यक्ति। जो पूर्ण पारदर्शिता से अपनी चिति को व्यक्त करता है उसे व्यक्तित्व कहते हैं। अतः व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया बाहर से कुछ आरोपित करना नहीं है अपितु भीतरी स्व को पूर्णतः प्रगट करना है।

स्वभाव अर्थात् जैसे हैं। भू – भवति धातु से बना भाव अर्थात् होना। स्व का भाव अर्थात् अपनी अद्वितीयता को पहचान कर स्वयं की अस्मिता (स्वयं के प्रति दृष्टि) और परिचय (औरों को किया प्रदर्शन) को उस के अनुसार करना। इस भाव को जब कृति में उतारते हैं तो उसका माध्यम है कर्म। जब कर्म स्व के अनुरूप होता है तब उसे स्वकर्म कहते हैं। कूष्माण्डा देवी के हाथों के उपकरण कर्म का प्रतीक हैं। घट अथवा अण्ड स्वभाव का और उपकरण स्वकर्म का संकेत करते हैं। जब जन्म ही ब्रह्म से हैं अर्थात् दिव्य है तब स्वभाव भी दिव्य ही होगा। अतः कर्म भी उसी ईश्वरीय योजना के अनुरूप करना होगा। इस योजना का विचार करते समय अकेले का पृथक और एकांगी विचार नहीं कर सकते। जिस परिवेश, परिवार, समाज और राष्ट्र में जन्म हुआ है उसके अन्य सदस्यों का भी स्वभाव और स्वकर्म है। ईश्वरीय योजना में जड़-चेतन सबकी भूमिका है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भूमिका को समझ कर अन्यों के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करना होता है। इसे कहते हैं स्वधर्म। स्वभाव और स्वकर्म ये दोनों भी स्वधर्म में आते हैं।

जैसे शरीर में हर कोशिका (Cell) का अद्वितीय अस्तित्व होता है। एक ही बीज से उत्पन्न हुई प्रत्येक कोशिका अपनी अद्वितीय संरचना, कार्य और भूमिका के अनुसार शरीर के अंगों (Organs) का निर्माण करती है और स्वधर्म का पालन करते हुए शरीर के जीवन उद्देश्य और कर्म में योगदान देती है। कोशिका का स्वधर्म क्रमशः ऊतक (Tissue) और अंग के कार्य और भूमिका के अनुरूप होता है। अंग अंततः शरीर के स्वधर्म के पूरक ही होते हैं। किसी भी स्तर पर यह शृंखला खंडित हुई तो विकार होता है और शरीर रुग्ण होता है। कूष्माण्डा के अण्ड में पूरा ब्रह्मांड विद्यमान है। पूरा अस्तित्व ही एक विराट पुरुष है। राष्ट्र उसके अंग हैं। राष्ट्र का भी जैविक विराट पुरुष सा अस्तित्व है। समाज, परिवार, उसके अंग और व्यक्ति उस समष्टि पुरुष के अंग। इस प्रकार परस्परावलंबी, निर्भर और पूरक रचना विश्व में हैं। कुल, समुदाय, समाज और राष्ट्र हर स्तर पर स्वधर्म होता है। ईश्वरीय योजना के अनुसार इस धर्म को निभाना होता है। राष्ट्र अस्मिता का सबसे उदात्त स्तर है। इसलिए उसके स्वभाव और स्वधर्म की विश्व के सुचारू संचालन में सबसे बड़ी भूमिका है।

राष्ट्र का स्वभाव उसके इतिहास, संस्कृति और दर्शन से व्यक्त होता है। भारत में यह हिंदुत्व के रूप में सनातन (सभी काल में) अभिव्यक्त होता रहा है। इसलिए हिंदुत्व ही भारत की राष्ट्रीयता है। कर्तव्य को अधिकार से, त्याग को भोग से और समष्टि को स्वयं से अधिक महत्व देना भारत का सहज स्वभाव है। इसी को यहाँ धर्म कहते हैं। स्वभाव, गुण, कर्तव्य, भूमिका, दायित्व इनके अनुरूप आचरण को समग्रता में धर्म कहते हैं। इसलिए धर्म भारत का प्राण है। समाज का आपसी व्यवहार इसी से परिचालित होता है। सभी परंपराओं का इसी के अनुरूप निर्माण हुआ है। जन्म दिव्य होने के कारण जीवन ध्येय भी उस एक को फिर प्राप्त करना ही हो सकता है। इसी कारण व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में अध्यात्म ही भारत का विश्व को संदेश है। विश्व को इस अद्भुत जीवन दर्शन और पद्धति का प्रशिक्षण देना भारत का राष्ट्रीय जीवन ध्येय है। अंततः अपनी पूर्ण क्षमता, वैभव और ऐश्वर्य को प्राप्त करने पर विश्वगुरु के पद को पाना ही इसकी नियति, गंतव्य और भवितव्य है। मानव निर्मित व्यवस्थाओं में इस स्व की अभिव्यक्ति राष्ट्र की उद्देश्यपूर्ति हेतु अनिवार्य है। अभी भारत में संघर्ष काल के अवशेष मानसिक दासता से प्रारंभ कर राज्य नियंत्रित सभी तंत्रों में भी हैं। ब्रिटिश राज के समय शिक्षा के अभारतीय होने के बाद सभी व्यवस्थाएँ स्वाधीनता के पश्चात भी औपनिवेशिक ही बनी रहीं हैं। स्वाधीनता से स्वतंत्रता की यात्रा में तंत्र स्व पर आधारित करना होगा।

नवरात्रि बीज बोने का समय है। विश्वकल्याण के लिए शुभ संकल्पों के बीज बोने पड़ेंगे। चतुर्थी की देवी माता कूष्माण्डा हमें आशीष, सामर्थ्य और बुद्धि प्रदान करें कि हम अपने राष्ट्रीय संकल्प को धारण कर सही अर्थ में राष्ट्रांग बनें।

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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5 Comments

    • स सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनीं विनिश्चितार्थामिति वाचमाददे ||
      ऐसी ही उपाशंसनीय वाणी को महाकवि भारवि के यें शब्द दिये |

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