भाद्रपद मास की पूर्णिमा से अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष होता है। अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का यह अवसर है। श्रद्धा से ही श्राद्ध है। तथाकथित आधुनिकता के नाम पर इस प्रक्रिया की आवश्यकता और वैज्ञानिकता पर शंका की जाती है। तर्पण के शास्त्र को समझे बिना ही पूछा जाता है कि यहाँ से अर्पण किया जल पितरों को कैसे मिलेगा? श्राद्ध भोज पर भी उपहास होता है कि ब्राह्मणों ने अपना पेट भरने के लिए सारी परंपरा बनाई है। पृथ्वी पर किया भोजन पितरों को कहाँ से प्राप्त होगा? ये सभी शंकाएँ पश्चिम के भौतिकवादी विचार का परिणाम है।

जेरुसलेम से निकलें तीनों सेमेटिक रिलिजन — यहूदी, ईसाई और इस्लाम में पुनर्जन्म का विचार नहीं है। मरने के बाद कब्र में गड़े रहने की मान्यता है। पश्चिम के भोगवाद का मूल भी इसी विचार में है। पुनर्जन्म के सिद्धांत के अभाव में नैतिकता व्यक्तिवादी हो जाती है। कर्म करते समय उसके परिणाम का विचार न्यून हो जाता है और भोग से प्राप्त सुख महत्वपूर्ण। भारत में भी ऐसे विचार प्रतिपादित हुए हैं। चार्वाक ने ऋण लेकर भी अमर्याद भोग के सिद्धांतों का समर्थन इसी बात से किया कि एक बार जल जाने पर देह वापस नहीं लौटती। इसलिए जब तक जीवन है, यौवन है, भोग करो।
यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥

वर्तमान युवा पीढ़ी ने अपने तरीके से इसी बात को प्रचलित किया है। युवा — YOLO अर्थात् You Only Live Once – आप केवल एक बार ही जीते हैं — कहते हैं। मद्यपान, धूम्रपान इससे भी आगे के मादक द्रव्यों का सेवन, मुक्त रति क्रीड़ा आदि के लिए प्रेरित करने हेतु ऐसे पदों का प्रयोग किया जाता है। मना करनेवाले छात्रों/ युवाओं को लज्जित किया जाता है कि वे किसी महत्वपूर्ण अनुभव को खो रहे हैं, पीछे छूट रहे हैं। इस टिप्पणी के लिए भी एक लघुशब्द (Abbreviation) — FOMO अर्थात् Fear Of Missing Out – बनाया है। यह बहिर्मुख भोगदृष्टि ही ऋषियों की शास्त्रीय (Scientific) परंपराओं पर शंका उत्पन्न कर उन्हें नकारने अथवा अनमने भाव से करने पर प्रेरित करती है।

जब जीवन की नित्यता को शास्त्रीय तरीके से समझा जाता है तब ध्यान में आता है कि हमारा यह जन्म अपने आप में पृथक नहीं एक अखंड यात्रा का भाग है। पूर्व जन्मों में किए कर्म के परिणामस्वरूप इस जन्म में परिवार, समाज, संपन्नता-विपन्नता, अवसर-कठिनाई जैसे वातावरण प्राप्त होते हैं। प्रत्येक जन्म में मनुष्य को कर्म का स्वातंत्र्य है। जिसके माध्यम से मनुष्य जन्मयात्रा से मुक्त भी हो सकता है और बंधन बढ़ा भी सकता है। कर्म का संस्कार चित्त में संचित होता है, जो जीवात्मा के साथ जन्म-जन्म में प्रवाहित होता है। हर जन्म में उसमें घट-बढ़ होती रहती है।
जैसे जन्मों में सातत्य व्यक्तिगत होता है वैसे ही वंशगत भी होता है। माता-पिता का चयन नहीं होता। कर्म के अनुरूप गोत्र-वंश प्राप्त होता है। अतः जैसे पितरों के गुणसूत्र (Chromosomes) पीढ़ियों में अग्रेषित होते हैं उसी प्रकार चित्त के संचित संस्कारों के कारण मन भी पूर्वजों से जुड़ा होता है। श्राद्ध का संबंध इसी मन के जुड़ाव से है। श्रद्धा का प्रकटीकरण व्यक्ति के मन में संचित कर्म की शुद्धि करता है। पूर्वजों की जीवात्मा भी जिस योनि में अथवा आगामी जन्म में हो उसका भी जुड़ाव होने से श्रद्धा से किए कर्म का फल उन्हें भी प्राप्त होता है। श्राद्ध इस सनातन संबंध को निर्वाह करने का माध्यम है।

पूर्वजों का स्मरण तो प्रतिदिन करना अपेक्षित है। श्रद्धा भी नैमित्तिक नहीं नित्य ही होती है। प्रत्येक कर्म के समय अपने पितरों का स्मरण करना आत्मविश्वास और मनोबल में वृद्धि ही करता है। कुछ विशेष पर्वों पर स्मरण के साथ श्रद्धा की विशेष अभिव्यक्ति अधिक परिणामकारी होती है। मृत व्यक्ति की तिथि पर स्मरण का अवसर होने से चित्त के द्वार खुले होते हैं और इस समय श्रद्धा से किया कर्म — श्राद्ध प्रचंड लाभदायी होता है। गया, त्र्यंबकेश्वर, हरिद्वार आदि कुछ तीर्थस्थलों पर किसी भी मुहूर्त में श्राद्ध कर्म किया जा सकता है। इसका संबंध पूर्वजों की मुक्ति से जितना है उससे कई गुना अधिक श्राद्ध करनेवाले साधक के मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास से है। अतः पितरों के उद्धार के लिए श्राद्ध में श्रद्धा ना भी हो तब भी आत्मोद्धार के लिये श्राद्ध अवश्य करें। भाद्रपद मास उत्तरायण के मध्य में आता है इसके कृष्ण पक्ष के समय ग्रह स्थिति और जगत की प्राणशक्ति भी श्राद्ध हेतु अनुकूल होती है। इसी कारण इसे पितृपक्ष अथवा श्राद्धपक्ष कहते हैं। अपने ज्ञात पूर्वजों की मृत्यु तिथि को उनके लिये श्राद्ध किया जाता है। सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों हेतु अमावस्या को श्राद्ध कर्म का विधान है। इस पर्व का नाम ही सर्वपितृअमावस्या है।


श्राद्ध की शास्त्रीय विधि का अपना महत्व है। तर्पण, पिंडदान आदि शास्त्रोक्त विधि से कर्म करने का सुफल श्रुति-स्मृतियों में वर्णित है। प्राणविद्या के माध्यम से उसके विज्ञान को समझा जा सकता है। प्रकृतिस्थ शक्तियों-देवताओं को समर्पण हेतु जैसे अग्नि अधिक प्रभावी माध्यम है वैसे ही जल भी है। जल का अर्घ्य भी हवन में दी आहुति के समान ही परिणामकारी है। पितरों को समर्पण करने में प्रवाहादि गुणधर्मों के कारण जल अधिक प्रभावी माध्यम है। इसलिए अर्घ्यदान के समान ही तर्पण का श्राद्ध कर्म में बड़ा महत्व है। पानी पूर्वजों तक नहीं पहुँचता किंतु उसकी धारा पर केंद्रित हमारे चित्त के माध्यम से संचित संस्कारों का परिशोधन होता है। साथ ही जिस जन्म कर्म संबंध से वह संस्कार संचित हो उन पितरों के चित्त से भी जुड़ाव होता है। परस्पर लाभ का ही यह कर्मकांड है। श्राद्ध में उपयोग किए जानेवाले काले तिल समान द्रव्य भी उनकी प्राणशक्ति की विशेषता के कारण श्रद्धा के वाहक बनते हैं।
सनातन हिंदू धर्म और उसके सतत परिपालन से विकसित भारतीय संस्कृति ‘नित्य नूतन चिर पुरातन’ कही जाती है। इसमें हर परंपरा का युगानुरूप कालसुसंगत नवीनीकरण किया जाता है। श्राद्ध कर्म के पारंपरिक विधि का पालन करना ही सर्वोत्तम है किंतु प्रशिक्षित पुरोहितों के अभाव, आजीविका की व्यस्तता आदि के चलते पूरी विधि अपनाने में असमर्थ होने पर कुछ युगानुकूल उपाय भी किए जा सकते हैं। चित्त की एकाग्रता और त्याग ही श्रद्धाभिव्यक्ति का मूल आधार है। अतः दान सर्वसुलभ और सर्वोत्तम उपाय है। अन्न-वस्त्र का दान, भूदान, गोदान, विद्यादान यह क्रमशः अधिकाधिक मुक्तिदायक है। जैसे गोमाता क्रय कर सत्पात्र व्यक्ति को ढूँढकर दान देना संभव ना हो तो गोशाला को दान देना भी गोदान ही है। स्वयं विद्यादान करना सर्वोत्कृष्ट है किंतु कठिन होनेपर गुरुकुल को दान देना विद्यादान का युगानुकूल रूप है।

जीवित माता पिता की श्रद्धा से सेवा अपने वंशगत संस्कारों के शुद्धीकरण का माध्यम होने से सर्वोत्तम श्राद्ध है। श्राद्धपक्ष में दिवंगत माता-पिता से प्रारंभ कर अपने समस्त पूर्वजों तथा देश-धर्म के लिए वीरगति प्राप्त सभी बलिदानियों व प्राकृतिक अथवा मानवनिर्मित आपदाओं में अकाल मृत्यु प्राप्त बांधवों के प्रति श्रद्धा से स्वयं अपने सामर्थ्य के अनुसार उपरोक्त में से एक, अधिक अथवा सभी दान करें। स्वयं व्यवस्था करना कठिन होने पर उचित व्यक्ति अथवा संस्था को अनुपातिक राशि दान कर उनके माध्यम से श्राद्ध संपन्न करें। सामर्थ्य का निर्णय वैसे तो स्वयं ही करना है किंतु पितरों हेतु दशांश (आमदनी के 10%) दान की महत्ता है। पितृ ऋण से मुक्ति का यह माध्यम है। जैसे ऋषि ऋण से उऋण होने के लिए दशांश गुरुदक्षिणा वैसे ही श्राद्ध में भी यही अपेक्षा है।
यह भारत ऋषियों के तपस से जन्मा राष्ट्र है और हम सभी उसके राष्ट्रांग। ऋषियों की तपस्या से पोषित शास्त्रीय (scientific) परंपराओं पर श्रद्धा और यथासंभव उसका पालन सभी का राष्ट्रीय कर्तव्य अर्थात् राष्ट्रधर्म है। आईये श्रद्धा से इस धर्म का पालन कर पूर्वजों की मुक्ति के साथ ही स्वयं की चित्तशुद्धि का साधन करें! श्राद्ध के निमित्त दान करें।

सादर नमस्कार 🙏💕🚩
बहुत ही सुंदर आलेख है,,,
अपनी संस्कृति और परंपरा को जीवंत रखना चाहिए,,,
बहुत बढ़िया
कृपया करवा चौथ पर भी हमारी जानकारी बढ़ाएं बहुत लोग हैं तरह तरह का बोलते हैं लेकिन हमारे पास प्रतिउत्तर नहीं होता
मार्गदर्शन करें धन्यवाद
अति उत्तम लेख । जीवन में पहली बार अनुभव हुआ है, की जो अर्पण जैसे पानी, तिल, आदि करते हैं उसका पित्रों से अधिक स्वयं पर भी लाभ होता है ।
यह लेख यह भी बड़े ही उत्तम तरीक़े से दर्शाता है की कैसे, पित्रों के स्मरण से हम व्यक्तिगत भौतिकता से बच कर समाज एवं धर्म केंद्रित जीवन व्यतीत कर सकते हैं ।
बहुत ही अच्छे प्रकार से श्राद्ध विषय का वैज्ञानिक विश्लेषण आपके माध्यम से प्राप्त हुआ, धन्यवाद।