सूचना के बाद सोचना नहीं

Mukul Kanitkar 7 मिनट का पठन

कार्यकर्ता के जीवन में सूचना का बड़ा महत्व है। संगठन में कहावत है कि ‘सूचना के बाद सोचना नहीं’। अतः संगठन शास्त्र में सूचना पद का अर्थ केवल जानकारी नहीं है। यह एक प्रकार से कृति का अनिवार्य संकेत है। इसलिए संगठन के विस्तार और दृढ़ीकरण में तीसरा ‘स’ है – सूचना। संपर्क में जुड़े नूतन व्यक्ति के साथ संवाद स्थापित होने के बाद उन्हें संगठनात्मक सूचना के द्वारा सीधे संगठन के कार्य से जोड़ा जाता है। अतः सूचना देना भी सूचना का पालन करने जितना ही गंभीर कार्य है। सूचना सामाजिक संदेशवाहक उपकरणों (App) पर दिया गया सार्वजनिक निमंत्रण नहीं है।

प्रारंभ में सूचना सुयोग्य व्यक्ति को संगठन के कार्य में सहभाग का व्यक्तिगत अनुरोध है। संपर्कित व्यक्ति से संवाद स्थापित होने के बाद जब कार्यकर्ता को ऐसा विश्वास होता है कि मित्रता और विचार के स्तर पर वह व्यक्ति संगठन से जुड़ने को तत्पर है तब उसे कार्यक्रमों की सूचना देना प्रारंभ किया जाता है। प्रारंभ केवल अनुरोधात्मक होता है। एक बार आकर स्वयं अनुभव करने का निवेदन।

कुछ सफल-असफल प्रयासों के बाद जब दो-तीन सूचनाओं का पालन हो जाता है तब फिर अनुरोध आग्रह में बदल सकता है और तब सूचना की भाषा भी आग्रही होती जाती है। अनुरोधात्मक सूचना में ‘आप आमंत्रित हैं’, ‘कृपया पधारें’ ऐसी शब्दावली का प्रयोग होता है। जिसका अर्थ – यदि सुविधा हो, सहज संभव हो तो इस कार्यक्रम, आयोजन, एकत्रीकरण, बैठक में सम्मिलित हो – ऐसा होता है। जब दोनों ओर से अग्रिम सोपान चढ़ा जाता है तब भाषा – ‘आप अपेक्षित हैं’, ‘अवश्य समय से पूर्व उपस्थित हो’ – ऐसी आग्रही हो जाती है। इस सूचना में सुविधा, असुविधा का विचार अथवा न आने का विकल्प नहीं दिया जाता।

अनुरोधपरक सूचना अनेक संपर्कित साथियों को बार बार दी जाती है। ऐसी सूचना में अनुपालन का अनुपात कम ही होता है। संपर्क और संवाद के बाद बनाई सूची को अनुरोध की सूचना देने पर इसके पालन होने की संभावना केवल दस प्रतिशत होती है। केवल संपर्क सूची हो और अभी प्रत्यक्ष संवाद स्थापित होना बाक़ी हो तो यह अनुपात एक प्रतिशत के लगभग ही रहता है। अतः ऐसी सूचना से संगठन का अधिक लाभ नहीं होता। इस प्रकार की प्रसार सूचना को केवल प्रगट, सार्वजनिक, संख्यात्मक आयोजनों में ही प्रयुक्त किया जाता है। इसमें आमंत्रित व्यक्ति से श्रवण के अतिरिक्त और कोई अपेक्षा नहीं की जाती। संवाद स्थापित होने के पश्चात प्रथम छटनी के बाद दी गई सूचना अधिक गंभीर, क्रियात्मक अथवा वैचारिक आयोजनों के लिए उपयोगी होती है। इसमें क्रियात्मक सहभाग की अपेक्षा होती है। जैसे संगोष्ठी, मुक्त चर्चा, विमर्श अथवा आयोजन बैठक में आनेवाले सभी को सक्रिय सहभाग और वैचारिक अथवा क्रियात्मक आदान-प्रदान करना होता है। ऐसे कार्यक्रमों में संवाद के द्वारा सुपरिचित संपर्क ही बुलाये जाते हैं। ये दोनों स्तर अनुरोधी सूचनाओं के ही हैं। इसके सूक्ष्म भेद को समझकर इनका प्रयोग करने से क्रमशः अगले सोपान पर आग्रही सूचना योग्य सूची का चयन हो सकता है।

आग्रही सूचना का प्रयोग संगठन के आंतरिक आयोजन यथा नियमित बैठकें, प्रशिक्षण कार्यक्रम, आनंदशाला, शिविर आदि में होता है। यह कार्यकर्ता निर्माण की प्रथम सीढ़ी है। इस सूची में सम्मिलित व्यक्ति कार्यकर्ता कहने के लिए योग्य हो जाते हैं। कार्यकर्ता ही आमंत्रित के स्थान पर अपेक्षित हो सकते हैं। यदि उचित संवाद तथा पूर्वतैयारी के बाद इस स्तर की आग्रही सूचना की सूची बनी हो तो इसमें अनुपालन का अनुपात पचास प्रतिशत से अधिक हो सकता है। इस सूचना के अनुपालन में सहभागी होनेवाले संभावित कार्यकर्ता उन आयोजनों, प्रसंगों में स्वेच्छा से सक्रिय होते हैं। इन में से कुछ स्वयंसेवी स्वभाव के व्यक्ति कार्यकर्ता बन जाते हैं और आगामी आयोजनों में आयोजक की भूमिका में आ जाते हैं।

ऐसे स्तर पर सूचना आदेश का रूप ले लेती हैं। स्वयंसेवी संगठनों में सहभाग का कोई प्रत्यक्ष दबाव नहीं होता। सब स्वेच्छा से ही अनुशासन का पालन करते हैं इसलिए प्रत्यक्ष आज्ञा अथवा आदेश का कोई स्थान नहीं होता। क्योंकि उसके उल्लंघन पर किसी प्रकार के दंड अथवा हानि का प्रावधान भी स्वप्रेरित संगठन में नहीं हो सकता। संगठन (Organisation) और संस्थान (Institution) में यही भेद है। संस्थान में कर्मचारी होते हैं जो एक अनुबंध के अन्तर्गत निर्धारित कार्य को वेतन, मानधन अथवा अन्य किसी प्रतिफल के साथ करते हैं। अतः आज्ञा के उल्लंघन पर दंड अथवा हानि या चरम स्थिति में निलंबन का प्रावधान होता है। किंतु स्वयंसेवी संगठन में कर्मचारी नहीं स्वयंसेवक कार्यकर्ता होते हैं जो किसी अनुबंध के कारण नहीं अपितु कार्य के पावित्र्य, महत्व तथा परिणाम के कारण समर्पित भाव से जुड़े होते हैं। ऐसी परिस्थिति में संगठन की सूचना एक समर्पित कार्यकर्ता के लिए आदेश के समान ही होती है। देनेवाले के अधिकार भाव के कारण नहीं अपितु सूचना पानेवाले के कर्तव्यबोध के कारण सूचना आज्ञा के समान ही अनिवार्य बन जाती है।

जो कार्यकर्ता सूचना देने के दायित्व का निर्वाह करता है उसे स्वयं को प्राप्त सूचनाओं के प्रति आदेश बोध रखना होता है। ऐसे समर्पित, अनुशासित, श्रद्धावान कार्यकर्ता को ही अन्य कार्यकर्ताओं को ऐसी अनिवार्य अनुपालन योग्य सूचना देने का अधिकार होता है। ऐसी सूचना की भाषा सीधी तथ्यात्मक भी हो सकती है – ‘स्थान, समय, विषय – समय से पूर्व स्थान ग्रहण करें’, ‘आपको आना है और आगे सूचना भी करनी है’ । कभी कभी आग्रही सूचना के समान ही ‘अपेक्षित है’ का प्रयोग भी हो सकता है किंतु सूचना ग्रहण करने वाले का भाव – ‘जहाँ अपेक्षित वहाँ उपस्थित’ ऐसा होने के कारण सूचना आदेशात्मक रूप ले लेती है। संगठन की नियमित कार्यपद्धति यथा साप्ताहिक मंडल, नियमित बैठकें, अभ्यास वर्ग, कार्यकारिणी सभा आदि की सूचना इस श्रेणी में आती है। आग्रही सूचना के फलस्वरूप कार्यक्रमों में सतत आनेवाले सहभागियों में से कार्यकर्ता भाव के व्यक्तियों का सतर्कता से चयन कर उन्हें नित्य कार्यपद्धति में जोड़ने के लिए सूचना दी जाती है। यह चयन इतना कठोर होना अपेक्षित है कि इस स्तर की सूचना का शतप्रतिशत अनुपालन होता है। स्वास्थ्य अथवा पारिवारिक, व्यावसायिक अपरिहार्य विवशता ही सूचना से अवकाश का कारण होती है। अनुपालन में असमर्थता की पूर्वसूचना भी संबंधित अधिकारी को दी जाती है।

यह सूचनाएँ ही संगठन का मेरुदंड बनती है। जितनी श्रद्धा से जितने अधिक कार्यकर्ता इन सूचनाओं का पूर्ण अनुपालन करते हैं संगठन उतना ही सुदृढ़ होता जाता है। संपर्क से संवाद और उसके आधार पर सूचना की सूची का चयन यह संगठन के जैविक (organic) विस्तार का माध्यम है। इस क्रमिक विकसन में समय लगना नैसर्गिक है। इसे अतिरिक्त गति नहीं दी जा सकती। अतः सूचना देने और प्राप्त करने योग्य कार्यकर्ता बनने के लिए धैर्य आवश्यक होता है। धीर ही वीर बनता है। आइए मित्रता को संगठन में समर्पित कर सच्चे सूचनावीर बनें और आज्ञाकारी स्वयंसेवक से स्वावलंबी कार्यकर्ता की यात्रा संपन्न करें।

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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2 Comments

  1. संगठन विस्तार मै सूचना का उपयोग एवम् सम्पर्क की स्थिति मै सूचना के स्तर का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है। यथा, बिना प्रत्यक्ष सम्पर्क के क्या या मानसिकता को जाने बिना, गोष्ठियों या कार्यक्रम के लिए शुरू आती सम्पर्क हेतु, भी कुछ चयन प्रक्रिया होना आवश्यक है। यह प्रश्न भी विचारणीय है। सूचना से सम्पर्क या सम्पर्कित को सूचना, यह क्या सिद्धांत रुप मै संगठन के लिऐ कार्यकर्ता निर्माण हेतु उपयोग किया जा सकता है। अनुरोध, अपेक्षा या दायित्व बोध, तभी प्रभावी होगा जब सम्पर्क मै सरसता हो या अपेक्षित को वैचारिक स्पष्टता हो।

  2. मैं कुछ दिनों से विचार कर रही थी की किसी कार्यक्रम में जाना चाहिए या नहीं। यह लेख पढ़ कर मुझे उत्तर मिल गया और सब स्पष्ट हो गया।

    आभार

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