
विद्यार्जन के क्षेत्र में सबसे दुष्कर किंतु महत्वपूर्ण कार्य अधिगम फलित का मात्रात्मक निर्धारण है। अध्ययन की प्रक्रिया अर्थात् अधिगम से हम क्या परिणाम चाहते है ? इसको जितना सटीकता से निर्धारित कर सकें उतना शिक्षा तंत्र सुव्यवस्थित विकसित हो सकेगा। अधिगम मानव के समग्र एवं सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर कार्य करता है अतः फलित भी ऐसा हो जो सभी स्तरों पर प्रभावी तथा मापन करने योग्य हो। भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी संपद के रूप में मानवी गुणों की सूची प्रदान की है जो सभी के लिए व्यक्तित्व विकास का अंतिम लक्ष्य हैं। दूसरी ओर असुरी संपद का भी विवरण दिया है जिसका त्याग करना है। यह दैवासुर संपद विभाग विद्या का स्पष्ट ध्येय बन सकता हैं। इनमें से प्रत्येक संपादन अर्थात् विकास करने योग्य गुण संपद बहुआयामी है और अधिगम के हर स्तर और विधा में परिभाषित किए जा सकते है। प्रथम दैवी संपद है ‘अभय’। यह हर आयु, स्तर और विद्याशाखा में उचित परिभाषित किया जा सकता है। शिक्षा के तीनों लक्ष्य ज्ञान, कौशल और व्यवहार में अभय आवश्यक है और हर स्तर पर इसका मूल्यांकन भी सम्भव है।

सभी 26 दैवी संपद वास्तव में ऐसे ही मात्रात्मक, सर्वग्राही अधिगम फलित का कार्य करते है। उनका युगानुकूल विवरण मात्र करना है। यह सभी दैवी शक्तियाँ शाश्वत हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन हम शिक्षा के इस बीज का विचार इसलिए कर रहे है कि यह उत्सव ही दैवी शक्तियों की एकात्मता से उत्पन्न दुर्गा की उपासना का उत्सव है। प्रथम दिन की जाने वाली घटस्थापना भी उसी शक्ति संचय का प्रतीक है। विश्व में शाश्वत रूप से विद्यमान दैवी संपद को अपने व्यक्तिगत घट में उद्घाटित करने की साधना ही नवरात्रि उपासना है। साधक अपने स्वभाव के अनुरूप बहिरंग अथवा अंतरंग साधन से दैवी संपद के सम्पादन का कार्य करता है। इसीके प्रतीक रूप हम बीज बोते है। उनका 9 दिन में होनेवाला अंकुरण हमारे मन में दैवी गुणों के पल्लवन का द्योतक है।

प्रथम दिन की देवी है शैलपुत्री। शैल अर्थात् पर्वत हिमराज। उनकी पुत्री है माता शैलपुत्री। यही गिरिजा – गिरी की जन्मी, पार्वती- पर्वत से उत्पन्न कही जाती है। शिक्षा में भी यही मन की संकल्प दृढ़ता साधना का आधार है इसलिए अधिगम का प्रारंभ सत् संकल्प के पर्वत से होता है। मन की शुद्धि का प्रतीक श्वेत, शुभ्र वस्त्र भी शिक्षा की प्रक्रिया का संकेत करता है। चित्त शुद्धि की साधना का नाम है नवरात्रि। उनका वाहन वृषभ है। बैल शक्ति और उत्पादकता का लक्ष्यबोध कराता है। देवी का वाहन ही उसे हम तक पहुँचाएगा। अतः बिना शारीरिक बल के शिक्षा का वहन कैसे होगा। हम अपने जीवन में जितना पाए उससे अधिक प्रदान कर सकें इस हेतु शिक्षित होना है। इसके लिए उत्पादक होना आवश्यक है। यही माँ शैलपुत्री का सभी शिक्षा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को संदेश है।
आइए शरद के रमणीय ऋतु में मन के उपजाऊ भूमि में शुभ संकल्प के बीज बो इस नवरात्रि की साधना का प्रारम्भ करें।

प्रासंगिक माहिती संकल्प लेकिन यह संकल्प विद्यार्थी को भी समझ मे आना चाहिए .
इसलिये विद्यार्थीयों के भी व्हाट्सअप ग्रुप में अधिक से अधिक प्रकाशित करे
सारगर्भित
BHAI SAB NAMASKAR
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प्यारे भैय्या, अद्भुत लेख।