नाभि का संधान !!

Mukul Kanitkar 2 मिनट का पठन

एकादशी की सुबह
दशहरा मैदान में
जले रावण की राख समेटते
बूढ़ा वाल्मीकी पोते से बोला

सदियों से हर बार रावण जलता है
और अगले साल फिर खड़ा
पहले से विशाल चुनौती बन
राम के धर्म के लिए..
इतनी बार जलने के बाद
बचा कहाँ से है रावण आज भी???

आज के रावण अपने अहंकार से
नहीं ललकारते शिव के कैलास को
ना ही है इतना तप
कि अपने हृत्तंत्री की वीणा से
जटाकटाह का करे गान
पर हाँ
अपने ऋषितुल्य पिता को
कैद कर वृद्धाश्रम की सलाखों में
जकड़ते अवश्य हैं!!

भ्रष्ट लूट की नींव पर
सोने की अट्टालिकाओं को
भी उभारते हैं|स्वर्ग तक सीढ़ी लगाने
का स्वप्न भी संजोते हैं|

आज के रावण
हर सीता की ओर
दुष्ट वासना से देखते हैं|
छद्म वेश धारण कर अपहरण के बाद
मंदोदरी के अभाव में
ना जाने आज की अशोक वाटिका
में सत्व और शील की कैसे हो रक्षा??

हर बार जलने के बाद
और अधिक विशाल बन कैसे
आ जाते हैं फिर
रावण
अपने फैलते साम्राज्य
के दसों मुखों के साथ
आलसी कुंभकर्ण और
मदमस्त इंद्रजीत के साथ

राम कहाँ हो??
वानरों की आबादी तो
हर गणना में कोटि कोटि बढ़ती
पर
कौन इन्हें सेना में बाँधेगा?
अनुशासन और संगठन का पाठ
पढ़ाएगा??
यहाँ तो जाम्बवान प्रेरणा के स्थान
पर स्वयं ही सदा
रथ पर सवार

मस्तक तो कई बार गिरे
रावण के
पर फिर वही उन्मत्त अट्टहास
राम फिर हताश !

भरत पादुका लिए
युग युग से राम के राज्य
की स्थापना कर
कर रहा प्रतीक्षा
रावण है कि हर विजया पर
जलकर भी मरता ही नहीं
दिवाली की जगमग युद्धमय
अ-योध्या चिर प्रतीक्षा में …

हुश्श
भर एक हताश उच्छ्वास
बोला वाल्मिकी
हे विभीषण ! कहते हैं
तुम तो हो चिरंजीव
फिर आओ !
मातली के रथ पर चढ़ जाओ
कहो राम से

राम !! काम नहीं सर काटते
चंद्रमुखी बाणों का
सीधे साधे नुकीले
लक्ष्यवेधी शर का करो संधान
प्राणों का केंद्र जहाँ
राक्षस के
उस नाभि को छेदों !

छोटे-बड़े परिवर्तनों से नहीं होगा पार
सीधे विदेशी शिक्षा पर ही करो अब वार

हे राम !
अब के नाभि का ही हो संधान !!

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

लेखक के सभी लेख →

One comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *