
कार्यकर्ता चालीसा 6
दीपक का प्रकाश कितना प्रखर होगा यह ईंधन की पवित्रता व लौ की स्थिरता पर निर्भर करता है। उसी प्रकार कार्यकर्ता के चरित्र की पवित्रता व संगठन ध्येय के प्रति उसका समर्पण उसे तेज प्रदान करता है। ऐसे कार्यकर्ता के मुख पर आत्मविश्वास से उत्पन्न दीप्ति को स्पष्ट देखा जा सकता है। बाह्य दृश्य तो आंतरिक व्यक्तित्व का प्रकटीकरण मात्र होता है। हनुमान जी के प्रखर ब्रह्मचर्य व रामकार्य के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा के कारण उनके पूर्ण शरीर से ही आलोक प्रकाशित होता था, जिसे देख गोस्वामी जी ने लिखा है:
कंचन बरन बिराज सुवेसा।
कानन कुण्डल कुंचित केसा।।

कंचन सोने का शुद्ध रूप है। भट्टी से तपा कर अशुद्धियों को दूर करने के बाद आभूषण के रूप में ढलने के लिए तत्पर कंचन के समान ही रामभक्ति में तप कर परिष्कृत हनुमान जी का वर्ण प्रभासित हो गया है। कार्यकर्ता के जीवन में भी तप का वर्ण दिखाई देता है। केवल वर्गों की व्यस्त दिनचर्या में ही नहीं अपितु सामान्य कार्य के मध्य भी कार्यकर्ता को स्वयं के शरीर की प्रसाधनिक सुश्रुषा करने का समय नहीं मिलता। किसी उबटन, विशेष मुखधावन (Face Wash) का प्रयोग भी दुर्लभ ही होता है। केवल पूर्णकालिक प्रचारक ही नहीं दायित्ववान गृहस्थी कार्यकर्ता की व्यस्तता भी उनके भोजन, व्यायाम, विश्राम की नियमितता में बाधा ही होती है। ऐसे में शारीरिक सौंदर्य का प्रश्न ही नहीं उठता। ना उसकी कोई आकांक्षा होती है ना ही अवसर। पूरी आवश्यक नींद का समय भी यदा-कदा ही मिलता है। इतनी बाहरी विपरीतताओं के बाद भी सामान्य शुचिता के पालन मात्र से सभी कार्यकर्ताओं के मुख पर एक विशिष्ट तेज प्रगट होता है। मन-विचार का पावित्र्य और राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार भी त्वचा के स्वच्छ और आलोकित होने में सहायक होता है। वैसे भी शुद्धि ही सौन्दर्य का मूल है। पवित्र मन ही शरीर में सौन्दर्य से अभिव्यक्त होता है। स्वार्थ के स्थान पर देशहित का विचार भी भाव और वचन दोनों में स्पष्टता और प्रखरता प्रदान करता है। यही हनुमानजी का स्वर्णिम रंग – कंचन वर्ण है। वर्ण तो वर्ग वाचक भी होता है। अतः उस अर्थ में यदि कार्यकर्ता प्रेरणा लेना चाहे तो हनुमान जी पवित्रता की प्रतिमूर्ति हैं। हम अपने आप से प्रश्न करें, हम किस वर्ण के कार्यकर्ता हैं।

यदि हमारी देह सुवर्ण के समान पवित्र कार्यकर्ता की हो जाएँ तो फिर लाल लंगोट भी सच्चे भक्त को सुवेष दिखने लगेगा। यदि अन्दर पवित्रता ना हो व ऊपरी वस्त्र शुभ्र धवल भी हो, तब भी वे सुवेष प्रतीत नहीं होंगे। सुवेष का अर्थ सरल है – अच्छे वस्त्र। केवल मूल्य अधिक होने से ही सुवेष नहीं होता। वास्तव में सादगी का बड़ा प्रभाव होता है। सादे खादी अथवा सूती वस्त्र भी स्वच्छ धुले और ठीक से पहने जाय तो आकर्षक लगते हैं। भारतीय वेशभूषा में एक विशेष मांगल्य होता है। मा एकनाथ जी रानडे जैसे वरिष्ठ प्रचारक नए कार्यकर्ताओं को अपने वस्त्रों की चिंता करने का प्रशिक्षण देते थे। विशेषकर संपर्क में जाते समय आपका वेष ही प्रथम प्रभाव (First Impression) बनाता है अतः उसपर ध्यान देना आवश्यक। विराज पद का अर्थ ही प्रभाव से है। राज का अर्थ है आलोक और वि उपसर्ग लगाने से विशेष का बोध होता है। इस प्रकार विराजने का अर्थ हुआ विशेष विशेष रूप से चमकनेवाला। आलोकित वर्ण और सुवेष के मेल से कार्यकर्ता का विशेष प्रभाव पड़ता है। कार्यकर्ता के केश-वेष-भूषादि प्रस्तुति के योग्य होने चाहिए। सादगी तो अत्यावश्यक है पर दारिद्र्य का प्रदर्शन नहीं करना है। हम अपने संगठन का प्रतिनिधित्व करते हैं। अतः हमारा बाह्य स्वरूप संगठन की विचारधारा के अनुरूप ही होना चाहिए।
ऐसा ही ध्यान केशों पर भी देना अपेक्षित है। केवल बाहरी प्रभाव के लिए ही नहीं अपितु प्राण विद्या के अनुसार जीवन और स्वभाव में तामसिकता के प्रबंधन हेतु भी केशविन्यास महत्वपूर्ण होता है। मृत कोशिकाओं से बने होने के कारण उनका सूर्य से जीवंत संपर्क नहीं होता। इसलिए स्वभाव और कार्य के अनुरूप केशबंधन करना आवश्यक है। कुंचित केश का अर्थ तो घुँघराले बालों से है। हनुमान जी के वर्णन में यह संदर्भ सुंदरता की उपमा है किंतु कार्यकर्ता के संबंध में इसे सुव्यवस्थित होने के रूप में लिया जाना चाहिए। कानन कुण्डल का अर्थ कानों में कुंडल पहनने से है। कार्यकर्ता के लिए इसका अर्थ है श्रवण क्षमता से है। कार्यकर्ता के कान सतत खुले होने चाहिए। अपने साथियों, समाज की सज्जन शक्ति के वचनों को सुनने से ही कार्यकर्ता आगे बढ़ता है। लोगों के मन को जानना श्रवण से ही संभव है। इसलिए यह श्रवणशक्ति ही कार्यकर्ता का वास्तविक आभूषण अर्थात् कुण्डल है। शारीरिक रूप भी कार्यकर्ता की अमूल्य निधि है। आदर्श कार्यकर्ता हनुमंत इस विषय में भी अनुकरणीय हैं।
