अन्नदाता पर कृपा रहे धान्यलक्ष्मी की, ना बने अन्न विक्रेता

Mukul Kanitkar 4 मिनट का पठन

नवरात्रि स्वाध्याय 4

25 सितंबर 2025 का सूर्योदय भी तृतीया में ही हुआ। चतुर्थी का सूर्योदय 26 को होगा इसलिए आज भी तृतीय नवरात्रि ही है। तीसरे नवरात्रि की देवी चंद्रघंटा है। इनका वर्ण स्वर्णिम है। तीनों देवों ब्रह्मा-विष्णु-महेश के सात्विक क्रोध की ऊर्जा से अवतरित चन्द्रघंटा माता के दसों हाथों में शस्त्र हैं। इंद्र देवता द्वारा घंटा प्रदान किया गया है। सिंह वाहन है और रक्त (लाल) वस्त्र है। माता की पूजा में शुभ्र व्यंजनों का नैवेद्य लगाया जाता है। दूध, खीर, भात और मधु का भोग लगाया जाता है। साधना के प्रसाद में समृद्धि और धन-धान्य का आशिर्वाद प्राप्त होता है।

धान्य की महता तो सारा विश्व मानता है किंतु भारत में इसे लक्ष्मी का स्वरूप माना है। अष्टलक्ष्मी में तीसरी है धान्यलक्ष्मी। इसलिए भारत में धान्य का कोई मूल्य नहीं लगाया जाता। आज भी न्यूनतम विक्रय मूल्य (MSP) के युग में भी खेती में उपजा 60% अनाज बाजार में नहीं आता। यह स्वयं के भोजन हेतु अथवा दान आदि में प्रयुक्त होता है। अतः अमूल्य है। इसे आधुनिक अर्थशास्त्री स्वपालक खेती (Sustenance Agriculture) कहते हैं और सकल घरेलु उत्पाद (GDP) में योगदान ना होने के कारण अनुत्पादक मानते हैं। सरकारी और निजी व्यापारियों द्वारा खरीद से केवल 40% धान्य ही क्रय-विक्रय में आता है। अतः ये ही सकल घरेलु उत्पाद (GDP) में योगदान करता है। भारतीय दृष्टि से यह सर्वथा उचित स्थिति है। समाज धर्म पर चलता था तब 100% अन्न निःशुल्क वितरित अथवा भोग होता। वर्तमान अनर्थशास्त्र चाहता है कि किसान अन्नदाता के स्थान पर विक्रेता बनें, अपने सारे उत्पाद को बेचें और अपने घर के लिए भी खरीदें। जिससे दोनों व्यवहार (transactions) सकल उत्पाद में जुड़ सकें।

धान्यलक्ष्मी की कृपा है कि भारत के 56% लोग जो खेती से जुड़े हैं वे अभी भी इस विकृत तर्क को नहीं मानते। भोगवादी व्यवस्था में तो खेती की उपज को भी अनुमान व्यापार (Speculative Trading) का अंग बनाया गया है। वायदा बाजार (Commodity Exchange) में आगे आनेवाली फसल पर भी क़ीमत लगाकर बोली लगाई जाती है। इस बात पर अध्ययन होना चाहिए कि इस प्रकार के व्यापार के प्रारम्भ और किसानों की आर्थिक दुर्दशा से आत्महत्या का क्या सम्बन्ध है। भारतीय वाणिज्य दृष्टि में किसी और के परिश्रम पर बोली लगाकर बिचौलियों द्वारा लाभ कमाना ना केवल अनैतिक अपितु अधर्म माना जाएगा।

दूसरी ओर खेती की उपज के बाजार में उपलब्ध बड़े हिस्से को सरकार द्वारा क्रय किया जाता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System — PDS) के माध्यम से समाज के सभी वर्गों में सुगम मूल्यों पर अन्न उपलब्ध कराने का दायित्व इस प्रणाली का है। अनेक राज्य सरकारों ने 2₹ किलो जैसी बहुत नगण्य कीमत पर अनाज वितरण की योजना बनाई। करोना की महामारी के समय जनसंख्या के बड़े हिस्से को रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं थे। तब केंद्र सरकार ने विनामूल्य (Free) धान्य वितरण योजना प्रारम्भ की, जो बाद में भी जारी रखी। अभी भी 80 करोड़ लोगों को इस योजना का लाभ मिल रहा है। भारतीय आदर्शों में तो यह दायित्व समाज का है। वर्तमान व्यवस्था में समाज पूर्ण समर्थ ना होने के कारण शासन को इस धर्म का निर्वहन करना पड़ रहा है।

तथाकथित विकसित देशों में भी भोजन पर्ची (Food Ticket) के रूप में यही कार्य सामाजिक सुरक्षा (Social Security) के महान नाम पर किया जाता है। अनेक पश्चिमी देश इस मद में अपने पूरे व्यय का 40 से 60% तक लगा रहे हैं जिसके कारण उनका ऋण (Debt) अनियंत्रित होता जाता है। यूनान (Greece) जैसे देश इस दबाव में दिवालिए हो गए हैं। भारत में तो इस सार्वत्रिक वितरण के अनेक अप्रत्यक्ष लाभ हुए हैं। राष्ट्रीय सामाजिक सर्वेक्षण संगठन (NSSO) के आंकड़े बताते हैं कि इस योजना के समांतर कालावधि में गरीब और निम्न मध्यम वर्ग में फल और सब्जी का प्रयोग बढ़ गया। जिसका परिणाम रक्ताल्पता (Anaemia) और कुपोषण (Malnutrition) की कमी में हो रहा है।

धान्यलक्ष्मी की कृपा भारत पर बनी रहें। वर्तमान व्यवस्था आदर्श अथवा धार्मिक तो नहीं है किंतु दिशा उचित है। इस नवरात्रि स्वाध्याय के माध्यम से विद्वानों से आव्हान है कि सभी को निःशुल्क ध्यान उपलब्ध कराने के वैदिक आदर्श के युगानुकूल मार्ग पर चिंतन करें 🙏🏻

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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