धन अर्थात् जोड़ना

Mukul Kanitkar 5 मिनट का पठन

नवरात्रि स्वाध्याय २


द्वितीया की देवी है ब्रह्मचारिणी। सामान्यतः माता जी के सभी अवतार में वे शिवजी को प्राप्त करने के लिए तपस्या करती हैं। इस अवतार में ब्रह्मचर्य ही माँ की साधना है। हिंदुत्व में सृजन के साथ ही शक्ति का संयम भी पूजनीय है। मातृत्व के साथ ही ब्रह्मचर्य भी वंदनीय है। संयम भी संतोष के समान ही उत्तम धन है। अष्टलक्ष्मी में दूसरी धनलक्ष्मी है। महालक्ष्मी का यह सबसे लोकप्रिय स्वरूप है। दिवाली में भी इसी स्वरूप का पूजन होता है। इस स्वरूप में एक हाथ से धनवर्षा ही विशेष है। समाज में यही प्रचलित है कि धन लाभ से ही सब समस्याओं का समाधान होगा। प्रतिष्ठा सुख सब धन से ही मिलते हैं। इसी कारण सभी धन की ही आकांक्षा करते हैं और उसी अपेक्षा में धनलक्ष्मी का पूजन करते हैं।

धन का अर्थ पैसे के रूप में लिया जाता है। सारा जीवन पैसा कमाने में ही लगा दिया जाता है। किंतु पैसा तो क्रयशक्ति का साधन है। धन का वास्तविक शब्दार्थ भी अधिक गहन है। गणित में जोड़ने की क्रिया (Addition) सबसे पहले सिखाई जाती है। जोड़ने के चिह्न + को अंग्रेजी भाषा में plus कहते हैं, उसे ही हिंदी में ‘धन’ कहते हैं। जैसे चार धन पाँच नौ (4+5=9) होंगे। धन का अर्थ ही जोड़ना अथवा वृद्धि करना है। समृद्धि का मुख्य भाग वृद्धि का है। वर्तमान में भी किसी भी देश के विकास को वृद्धि दर (Growth Rate) से ही नापते हैं। धनलक्ष्मी की उपासना भी इसी प्रकार हो सकती है।

मुद्रा (currency) धन का पर्याय नहीं हो सकती। धनलक्ष्मी के स्वरूप में भी आशिर्वाद के रूप में स्वर्णमुद्राओं की वर्षा दिखाई जाती है। संपदा का प्रतिनिधित्व करने का यह सबसे प्राचीन तरीका है। इसमें मुद्रा का मूल्य धातु के मूल्य के अनुरूप ही होता है। धीरे-धीरे मुद्रा का अवमूल्यन होता गया। स्वर्ण, रजत जैसे मूल्यवान धातुओं का स्थान तांबा, कांसा और फिर लोहे जैसे अधिक उपलब्ध किंतु कम मूल्य के धातुओं ने लिया। मुद्रा पर अंकित मूल्य से मुद्रा का वास्तविक मूल्य कम होता गया। यही मुद्रास्फीति (Inflation) का प्रारम्भ है। लकड़ी और भूर्जपत्र की मुद्राओं का भी संदर्भ कई स्थानों पर मिलता है। कागज के नोट चलन में आना पहला सबसे बड़ा अवमूल्यन कहा जा सकता है।

मुद्रा के रूप में केवल एक वचन पत्र (Promissory Note) का प्रयोग सुविधाजनक तो था किंतु इससे धन का संदर्भ ही बदल गया। कुछ जोड़े बिना धन नहीं बढ़ता। किसी को भी दे सके ऐसे सहज हस्तांतरणीय वचन पत्र से आर्थिक व्यवहार में सुविधा और क्रयशक्ति तो बढ़ गई किंतु वास्तविक संपदा का निर्माण कम हो गया। चलन मात्र से मुद्रा की क्रयशक्ति बढ़ती रही। किसी भी नोट में भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर द्वारा वचन और हस्ताक्षर होते हैं जो उसका मूल्य होता है। वास्तविक उस नोट का मूल्य उस पर मुद्रित मूल्य से कई गुना कम होता है। दूसरी ओर मात्र एक हाथ से दूसरे में हस्तांतरण से 100₹ के एक नोट से कई गुना अधिक क्रय संभव होता है। यही चलन धन का आभास उत्पन्न करता है। प्रारंभ में मुद्रा के छापने हेतु स्वर्ण भंडार का आधार हुआ करता था। देश के केंद्रीय बैंक के पास जितना स्वर्ण भांडार (Gold reserve) होता था उतनी ही मुद्रा छापकर चलन में रखी जा सकती थी।

क्रमश: अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी मुद्रा डॉलर का प्रचलन हो गया। फिर मुद्रा भी एक विनिमय वस्तु (Commodity) बन गई। उसका भी क्रय-विक्रय प्रारम्भ हुआ। मांग आपूर्ति के नियमों से उसका मूल्य भी बदलने लगा। तब अमेरिका ने स्वर्ण आधार (Gold Standard) को समाप्त कर दिया। आज अमेरिका चाहे जितने डालर छापकर विश्व में भेजता है। किंतु इससे मुद्रास्फीति भयानक बढ़ गई। आज अमेरिका में सकल उत्पादन (GDP) के 134% ऋण (Debt) इसी कारण हो गया है। यांत्रिक व्यापार बढ़ने के बाद तो नोट की भी आवश्यकता समाप्त हो गई। केवल digital माध्यम से आंकड़े बदलने से ही धन का आभास होने लगा है। अब तो Crypto currency (छद्म मुद्रा) भी प्रारम्भ हो गई है। अभी तक पूर्ण रूप से वैधानिक मान्यता सभी देशों ने नहीं दी है किंतु प्रचलन बढ़ रहा है। इसके नाम में ही crypto अर्थात् आभासी है। यह सब धन नहीं है क्योंकि इसने कुछ जोड़ा (add) नहीं है।

धन का विलोम ऋण (Minus) है। कुछ घटता है तो उसे ऋण कहते हैं। इसलिए कर्ज लेने को ऋण कहा गया। लेखा (Accounts) में भी ऋण (Debt) को दायित्व (Liability) में ही दिखाया जाता है। उसे अर्जित संपदा (Asset) नहीं मानते। आज धन के आभासी होने के साथ ही ऋण का चलन भी बढ़ गया है। ऋण प्राप्ति को अधिकाधिक सहज बनाया जा रहा है। ऊपरी रूप से यह भले ही सुविधाजनक लगे किंतु अंततः विपन्नता (Poverty) और क्लेश (Stress) बढ़ाने का ही कार्य करता है।

धनलक्ष्मी की उपासना मनुष्य को उत्पादक बनाती है। जो भी उसे प्राप्त होता है उसका मूल्यवर्द्धन करना ही धन का उपार्जन है। अपने ज्ञान, कला-कौशल, श्रम अथवा सेवा से यह मूल्य वृद्धि संभव है। ये ही कमाई के धार्मिक साधन हैं। यही धन का सही अर्थ है। द्युतादि (Gambling etc) क्रीड़ा से धन वृद्धि नहीं होती। आजकल खेलों के नाम से ऐसे जुआं प्रचलित हो रहा है। इन सबसे वास्तविक धनप्राप्ति नहीं होती। अतः अंततः इन माध्यमों से हुई कमाई हानिकारक ही होती है।

आइए सच्चे अर्थ में धनलक्ष्मी की पूजा करें। संपदा अर्जित करें। मूल्य वृद्धि का उसमें कुछ जोड़ें। यही सुख और शांति का मार्ग है।

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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