श्राद्धों में दान का महत्व

Mukul Kanitkar 6 मिनट का पठन

हिंदुओं में नई पिढ़ी के लिए जो शब्द हैं वे हमारी संस्कृति के एकात्म भाव के द्योतक हैं। एक संबोधन है ‘संतति’। इसका संबंध सातत्य से है। संस्कारों, मूल्यों, परंपराओं का सतत पालन करने का दायित्व संतति का है। पूर्वजों की उपलब्धियों को आगे बढ़ाकर विकास की निरंतरता को बनाए रखना संतति का कार्य है। आगामी पिढ़ी पूर्वजों से अधिक उन्नत हो यह संकल्पना होती है। पुत्रात् इच्छेत् पराजयम् — हर पिता की यही इच्छा होती है कि उसके पुत्री/पुत्र उसे पराजित करने के योग्य हो जाए। सवाई की संकल्पना यही है। हर पिढ़ी में कम से कम सवा गुना उन्नति अपेक्षित है। भगिनी निवेदिता अपने लेख ‘आक्रामक हिंदुत्व’ (Aggressive Hinduism) में कहती है कि हर हिंदू की प्रार्थना होती है कि संतति उनसे उन्नत हो अर्थात् उनसे अधिक त्याग और योगदान करने में सक्षम।

नई पिढ़ी के लिए दूसरा शब्द है — प्रजा। प्रचलन में यह राजा के साथ जोड़कर प्रयोग में आता है अतः इसका अर्थ शासित माना जाता है। किंतु निरुक्ति के अनुसार इस शब्द का अर्थ है — प्रकर्षेण जायते इति प्रजा। जिनका जन्म अधिक प्रकर्ष से अर्थात् अधिक पवित्रता से हुआ है। हर गृहस्थ की यही प्रार्थना होती है। विवाह के तुरंत बाद पुंसवन और गर्भाधान संस्कारों का उद्देश्य भी यही होता है कि संतान उत्तम हो। प्रजनन की इस शास्त्रीय उदात्तता से ही ‘प्रजा’ यह संबोधन है।

मानव जीवन का अंतिम संस्कार भले ही अन्त्येष्टि हो किंतु जीवन की निरंतरता वहाँ समाप्त नहीं होती। हर जीवात्मा की यात्रा जन्म-जन्मांतर की यात्रा है। साथ ही वंशजों के रूप में भी यह सातत्य बना रहता है। हर नई पिढ़ी उस निरंतर यात्रा की एक कड़ी है। इसलिए पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण, सम्मान और समर्पण प्रत्येक मनुष्य का अस्तित्वमूलक कर्तव्य है। साथ ही यह हमारे स्वयं की उन्नति के लिए अनिवार्य भी है। इसी को श्राद्ध परंपरा के रूप में संस्थागत कर दिया है। पूर्वजों की पुण्यतिथि पर वार्षिक श्राद्ध अपेक्षित है। साथ ही भाद्रपद/अश्विन मास का कृष्ण पक्ष श्राद्ध पक्ष के रूप में मनाया जाता है। पूर्णिमा से ही श्राद्ध प्रारम्भ होते हैं। इस प्रकार सोलह तिथियों के अनुसार पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति का प्रावधान है।

हिंदू धर्म में वैज्ञानिकता से प्राणशक्ति के स्तर पर कर्मकांड को विकसित किया जाता है। श्राद्ध की भी शास्त्रीय विधि है और विद्वान पुरोहित के मार्गदर्शन में पूर्वजों की तिथि पर श्राद्धकर्म करना सर्वोत्तम है। समय अथवा उचित व्यवस्था के अभाव में यदि शास्त्रोक्त विधि का पालन कठिन अथवा असंभव हो तो हिंदू जीवन पद्धति में सुविधाजनक पर्याय भी होते हैं। शाश्वत सिद्धांत का पालन करते हुए युगानुकूल उपाय किए जाते हैं। श्राद्ध का सबसे बड़ा तत्त्व है पितरों के प्रति श्रद्धा। उस श्रद्धा का व्यवहार में प्रयोग त्याग द्वारा ही संभव है। जिनके प्रति सम्मान और समर्पण है उनके लिए क्षमता के अनुसार अधिकतम त्याग ही श्रद्धा की सच्ची अभिव्यक्ति है। इसलिए श्राद्ध कर्म का सबसे महत्वपूर्ण अंग ‘दान’ है।

त्याग का सरलतम् मार्ग ‘भौतिक दान’ है। सबसे सरल ‘अन्नदान’ है। उसके साथ ही ‘वस्त्रदान’ उससे उत्तम माना गया है। ‘गोदान’ भौतिक के साथ ही प्राणिक स्तर पर भी पुण्यदायी है। जीवनोपयोगी कला-कौशल तथा ‘विद्यादान’ और ‘आत्मज्ञान’ का दान क्रमशः सर्वोत्तम है। अतः श्राद्धों के मुहूर्त पर अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुरूप उच्चतम दान करना चाहिए। भगवद्गीता में ‘सात्त्विक दान’ के लक्षण बताए हैं:

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।

देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥17:20॥

चिन्मय मिशन के अध्यक्ष स्वामी तेजोमयानंद जी इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार करते हैं — दान देना ही कर्तव्य है — इस भाव से जो दान योग्य देश, काल को देखकर ऐसे (योग्य) पात्र (व्यक्ति) को दिया जाता है, जिससे प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं होती है, वह दान सात्त्विक माना गया है।

देश, काल के अनुरूप सत्पात्र को बिना प्रतिफल अथवा श्रेय की अपेक्षा के दान देना भी कभी-कभी दुष्कर हो सकता है। यदि व्यक्तिगत स्तर पर किया जाए तो वर्तमान संशय के वातावरण में ऐसे सुयोग्य और आर्त पात्र को खोजना श्रमसाध्य ही है। इसका उपाय संस्थागत गवेषण हो सकता है। अन्नदान से आत्मज्ञान दान तक सभी स्तर के दान एकसाथ करने हो तो गुरुकुल सर्वोत्तम सत्पात्र है। आज भी देश में सहस्रों गुरुकुल कार्य कर रहे हैं। इनमें से 500 से अधिक में गोशालाएँ भी हैं। छात्रों की निवास, भोजन वस्त्रादि व्यवस्था भी अधिकतर गुरुकुलों में निःशुल्क ही होती है। विद्यादान तो गुरुकुलों का प्रमुख कार्य है ही; तीर्थों और आश्रमों में स्थित ये गुरुकुल शिष्यों को आत्मज्ञान के प्रति भी प्रेरित करते हैं। अतः दान के सभी आयाम गुरुकुलों में संस्थागत हो जाते हैं। वर्तमान विधि प्रावधानों में पंजीयन के कारण आयकर अधिनियम के लाभ भी दानदाता को उपलब्ध होते हैं।

आइए इन श्राद्धों में अपने तेजस्वी पूर्वजों का स्मरण करें और किसी गुरुकुल में दान समर्पण द्वारा उनका सम्मान करें। स्वयं के कर्तव्य पालन और साधना की निरंतरता को भी सुनिश्चित करें।
इस बार युगाब्द 5127, विक्रमी 2082 अथवा 2025 CE में पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण से प्रारंभ हुआ पितृपक्ष सर्वपितृअमावस्या को सूर्यग्रहण से समाप्त हो रहा है। दान का महत्व और बढ़ गया है। किसी भी गुरुकुल अथवा सेवा संस्थान में दान कर सकतें हैं। चार सुझाव यहाँ दिए हैं।

१. नागपुर गुरुकुलम्
Account Holder: RADHA GAYATRI KALA GURUKULAM
Account Number: 50100795632429
IFSC: HDFC0001248
Branch: SADAR BRANCH
UPI ID: Vyapar.173204574996@hdfcbank
Contact: 9272166115

२. अयोध्या गुरुकुल
Maharshi Vashishth Gurukul
Account Name: Shri Guru Vashishth Seva Nyas Ayodhya Gurukul
Account No: 50200100138935
IFSC: HDFC0007262
Bank Name: HDFC Bank
UPI ID: shriguruvashisthsewa.62902431@hdfcbank
Contact: 7355957191

बालेश्वर ओडिशा
Vivekbharati Seva Ashram, Orissa
Account Name: Vevekbharati Seva Ashram
Account No: 11157516117
IFSC: SBIN0000016
Bank Name: State Bank of India
Branch Name: Vivekananda Marg, Balasore
UPI ID: vivekbharatisevaashram@sbi
Contact: 9439333259

काशी गुरुकुलम्
Veereshwar Ved Bhavanam, Kashi
Account Name: Shashikala
Account No: 7393420743
IFSC: IDIB000V510
Bank name: Indian Bank
Branch Name: Varanasi Sampurnanand Sanskrit Vishwavidyalaya
UPI ID: shashikala.4007@indianbank
Contact: 9714174732

कृपया दिए गए संपर्क पर अपने दान की सूचना अवश्य प्रदान करें

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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