
अधिक मास में दान की महत्ता बताने के लिए इस उक्ति का प्रयोग किया जाता है। सत्य भी है, पुरुषोत्तम मास में दिये गये दान का अधिक पुण्यलाभ होता ही है। इस बार श्रावण मास अधिक मास है। चातुर्मास इस कारण इस वर्ष पाँच माह का है। व्रत करने का अधिक अवसर है। पुण्यप्राप्ति भी अधिक होगी। अतः यह उक्ति उचित ही है कि अधिक मास में जितना अधिक करेंगे उतना अधिक फल मिलता है। शास्त्रीय भी है। कार्यकारण संबंध का विज्ञान भी यही बोलता है। जो भी कर्म करेंगे उसका परिणाम होगा। जिस भाव से कर्म करेंगे वैसा फल मिलेगा।
यह शास्त्र समझेंगे तो फिर यह विचार केवल अधिक मास तक सीमित नहीं रहेगा। हम सभी अपने जीवन में अधिकतम लाभ चाहते हैं। लाभ अर्थात् पाना। अधिक पाने के लिए प्रयत्न करना कोई अपराध नहीं है। संतोष का अर्थ यह नहीं है कि अभाव में रहो। भूभुक्षा अर्थात् भूख के शमन से उत्पन्न तृप्ति के बाद और अधिक भोग की इच्छा न होना सत्य संतोष है। पाने की इच्छा की समाप्ति ही लक्ष्य है। जिसे पाने से और अधिक पाने की इच्छा ही ना हो वह परम लाभ है। “यं लब्ध्वा च अपरं लाभं मन्यते नाधिकं तत: ॥” संतोष परिणाम के प्रति रखना है प्रयत्न अथवा परिश्रम के प्रति नहीं। बिना परिश्रम के पाने की इच्छा का भी भारतीय दर्शन निषेध करता है। त्याग ही भोग का आधार प्रदान करता है यह हमारा शास्त्र है। अधिक पाना है तो अधिक त्याग और परिश्रम करना पड़ेगा यह हमारी मान्यता है। अधिकस्य अधिकं फलम् का अर्थ है – अधिक त्यागस्य, अधिक परिश्रमस्य अधिकं फलम् ॥

भारत अभाव अथवा दारिद्र्य का उपासक नहीं है। त्याग का अर्थ विपन्नता नहीं है; तुष्टि से उत्पन्न भोग को छोड़ने का परिपूर्ण भाव त्याग है। जैसे पूर्ण भरा घट छलकता है और अंदर का जल बाहर आता है, वह त्याग है। हम केवल लक्ष्मी के नहीं, तो महालक्ष्मी के उपासक हैं। अधिक पाना चाहते हैं क्योंकि ईश्वर अनंत है। वेद में मंत्र है – नाऽल्पे सुखं अस्ति — अल्प अर्थात् कम में सुख नहीं है। उसके पूर्व का मंत्र उसका कारण बताता है – भूमा वै स: — वह (ईश्वर) अनंत है। इसलिए उसके ही अंश मनुष्य को अधूरे में, कम में सुख नहीं मिलता। पूर्ण ही चाहता है। उसी का परिणाम है कि अधिक की कामना सब में है। योगक्षेम में योग का तात्पर्य है जोड़ना, पहले जो है उसमें और जोड़ना। क्षेम अर्थात् जो पा लिया उसकी रक्षा करना। अधिक पाना है तो उसके लिए अधिक मूल्य देने की तत्परता भी रखनी होगी।
यह अधिक अथवा बड़े की कामना सभी मनुष्यों में सामान्य है। इस कारण बड़े बड़े भवनों, प्रासादों और मंदिरों का निर्माण भारत में प्राचीन काल से हुआ है। पश्चिम में भी भोग के साधनों में यह आधिक्य व्यक्त हुआ है। बड़ी कारें, बड़े चषक आदि बातें इसका प्रमाण हैं। भारत में यह समझा गया कि भौतिक वस्तुओं की मर्यादा है। कितना भी बढ़ाया जाए सीमा तो रहेगी ही। अतः भूमा (अनंत) को केवल भौतिक अधिकता से नहीं पाया जा सकता। इसलिए मानसिक और भावनात्मक स्तर पर विस्तार अधिक परिणामकारी होता है, इस बात पर ध्यान दिया गया। व्यष्टि — समष्टि — सृष्टि — परमेष्टि इस चतुष्टय में मनुष्य के मन का क्रमशः विस्तार होने की व्यवस्था भारत में सदियों से रही है। सभी उत्सव, परंपरा और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से मन का विस्तार सहजता से होता रहा है।

इस भावनात्मक विस्तार का मूल आधार और भारत में प्रत्येक स्तर के सामूहिक जीवन का आधार परिवार है। व्यक्ति का प्रथम भावनात्मक विस्तार परिवार है। भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों के मध्य का अनुबंध (Contract) नहीं है। यह समाज मन (Collective Mind) का व्यक्तिगत मन पर संस्कार है। विवाह संस्कार के विविध प्रकार मूल रूप से मन के विस्तार के संस्कार हैं। इसलिए त्याग ही इन सबका आधार है। दान त्याग का सरलतम माध्यम होने से विवाह में भी वह जुड़ गया है। समाज का मूल एकक परिवार होने के कारण उसकी वृद्धि का माध्यम होने से विवाह एक सामाजिक संस्कार भी है।
परिवार के आगे विस्तार हेतु भी सामूहिक उत्सव आदि से परंपराओं का विकास हुआ। धार्मिक उत्सव, मेले, तीर्थ, मंदिर सब केवल उपासना के स्थान नहीं थे। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और अंततोगत्वा राष्ट्रीय चेतना के स्तर और समाज मन के विस्तार के सनातन माध्यम रहे हैं। तीर्थयात्राओं की परंपराओं और मान्यताओं से राष्ट्रीय एकात्मता को साधा गया। जैसी चुनौतियाँ आई वैसे ही सजीव भारतीय संस्कृति ने प्रत्युत्तर दिया। कर्मकांड पर प्रश्नचिह्न खड़ा हुआ तो शंकराचार्य और रामानुजाचार्य जैसे आचार्यों ने स्वाध्याय और संन्यास के संगठन से समाज जागरण के साथ ही राष्ट्रीय एकात्मता का कार्य किया। मंदिरों पर आक्रमण हुआ और उन्हें तोड़ा गया तब भक्ति आंदोलन पूरे देश में जन-जन के हृदय तक पहुँचा और व्यक्ति के भावनात्मक विस्तार का कार्य किया। केवल देवभक्ति ही नहीं, राष्ट्रभक्ति भी सभी संतों के साहित्य में प्रधान रूप से प्रगट होता है। उनकी ईशभक्ति भारतभक्ति तक विकसित होती थी। व्यष्टि के परिवार से राष्ट्र तक समष्टि में विकसन का कार्य भारत में विविध संप्रदायों के रूप में किया।

काल के प्रवाह में और बाद में विदेशी आक्रमणों के फलस्वरूप इन पारंपरिक विधाओं के प्रभाव का क्षरण हुआ। जीवित संस्कृति होने के कारण समाजीकरण के संस्कारों में भी परिवर्तन होता रहा है। सहस्राब्दियों से धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं, संगठनों के माध्यम से हो रहा मानसिक विस्तार – अधिक की कामना का साधन बना है। आज भी भारत में ये सभी पूर्ण उत्साह और गौरव से कार्यरत हैं। आचार्यों के मठ और संन्यासियों के अखाडे भी सक्रिय हैं और भक्ति के संप्रदाय भी। इन्हीं के साथ नवसंप्रदाय भी बढ़ रहे हैं। इनके आधिक्य का भी हमने उदारता से स्वागत किया। क्योंकि डेढ़ अरब भारतीयों के लिए इस क्षेत्र में भी — अधिकस्य अधिकं फलम् — ही सत्य है।

यूरोपीय आक्रमण के बाद सामाजिकीकरण के साधन विधिक होना आवश्यक हो गया। अतः 19-20 वी शती में पूरे देश में शैक्षिक, सामाजिक और राजनयिक संस्थाओं और संगठनों का निर्माण राष्ट्रीय विचारों के देशभक्तों ने किया। आर्य समाज, सनातन धर्म सभा, रामकृष्ण मठ, भारत सेवक समाज, युग निर्माण योजना जैसे अनेक संगठन बनें और विकसित हुए। वैसे ही पूरे देश में राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान, भारतीय विद्या भवन जैसी संस्थाएँ भी बनी। पुरानी संस्थाओं, संगठनों के साथ ही नूतन जुड़ती गई। भारत में सभी सामाजिक कार्य बल और प्रोत्साहन पाते हैं, फलते-फूलते हैं। यह भी इस जीवित समाज का लक्षण है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि इतने संगठन हैं, और सहस्रों बने तो भी कम है। आवश्यकता है उनके मध्य परस्पर सम्मान और समन्वय का भाव।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 1925 में स्थापना भारत के पारंपरिक धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संगठन और आधुनिक वैधानिक संस्थाओं से पृथक किंतु समन्वय का परिपाक था। हिंदू समाज का संगठन करने की सहज पारंपरिक किंतु उतनी ही नूतन कार्यपद्धति का विकास संघ में हुआ। संगठन शास्त्र का विकास संघ के कार्य के साथ हुआ। आचरण के द्वारा संघ संस्कृति भी विकसित हुई। उसके अनेक तत्त्व हैं। आज के विषय अधिकस्य अधिकं फलम् को ध्यान में रखते हुए एक विषय पर थोड़ी चर्चा करते हैं।

संघ ने व्यक्ति निरपेक्ष संगठन विधि का विकास किया। व्यक्ति बदलने से भी कार्य चलता रहे ऐसी अद्भुत रचना का निर्माण संघ में हुआ। कार्य है व्यक्ति निर्माण का – सामान्य स्वयंसेवकों में से महान कार्यकर्ताओं का सतत प्रवाह संघ ने खड़ा किया। किंतु व्यक्ति निष्ठा को संघ कार्य में कोई स्थान नहीं है। संगठन निष्ठा ही संघ के सतत विस्तृत होते हुए भी गुणवत्ता में शिथिलता ना आने का कारण है। कार्य का केंद्र व्यक्ति होते हुए भी कोई संगठन से बड़ा नहीं हो सकता। इसके लिए सामूहिक निर्णय पद्धति का विकास संघ में हुआ। इसी कारण सभी उस निर्णय को अपनाकर स्वीकार करते हैं।

शुद्ध सात्विक प्रेम कार्य का आधार होने से स्नेहमय, आत्मीय, पारिवारिक संबंध तो कार्यकर्ताओं में निश्चित ही होते हैं। कार्यकर्ता जुड़ता भी किसी व्यक्ति के माध्यम से ही है। किंतु व्यक्तिनिरपेक्ष कार्यप्रणाली के कारण सहज अनुशासन में मन के विस्तार के गहन आध्यात्मिक तत्वों का संस्कार कार्यकर्ताओं के मन पर होता है और कुछ समय में ही संघनिष्ठा दृढ़ हो जाती है। इसे ही दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने भगवान बुद्ध के तीन मंत्रों के माध्यम से समझाया। बुद्धम् शरणं गच्छामि — व्यक्ति से जुड़ाव, धम्मम् शरणं गच्छामि — तत्वों का संस्कार और अंतत: संघम् शरणं गच्छामि — संगठन के प्रति निष्ठा। कार्यकर्ता के विकास के भी यही तीन चरण हैं। हर कार्यकर्ता इस क्रम में किसी ना किसी सोपान पर है।

सभी को अपने मन में यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी भी बड़े से बड़े कार्यकर्ता, अधिकारी अथवा कुछ संगठनों में नेता से संगठन सदा ही बड़ा रहेगा। हमारी क्षमता, लोकप्रियता और कीर्ति संगठन के कारण ही है यह सदा स्मरण रहने से परीक्षा की घड़ी में भी व्यक्तिनिष्ठा संगठन निष्ठा से प्रबल नहीं होती। जैसे कोई भी विद्युत उपकरण कितना भी कार्यक्षम अथवा प्रकाशित क्यों ना हो उसको ऊर्जा राष्ट्रीय जाल (National Grid) से ही मिलती है। कभी-कभी अदृश्य होने के कारण यह भ्रम हो सकता कि जिस उर्जक (Plug) में हमारा भावक (Charger) लगा है उसी से हम ऊर्जा पा रहे हैं। किंतु उस भावक के पीछे ऊर्जा वितरण का पूरा तंत्र घरेलू मापक (Meter), खंभे से मिला संपर्क (Connection), रूपांतरक (Transformer) होता है। सभी विद्युत उत्पादक अपनी ऊर्जा राष्ट्रीय जाल में प्रदान करते हैं। देश में भी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, धार्मिक ऊर्जा का उत्पादन सदा से मठ, तीर्थ, महात्मा, कथावाचक, अध्येता, अध्यापक, सज्जनशक्ति करती ही है। संगठन का राष्ट्रीय जाल उसे अंतिम कार्यकर्ता तक उपलब्ध कराता है। संघनिष्ठा का भावक उपलब्ध है ही। समर्पण और आज्ञापालन का ऊर्जक सज्ज हो तो कार्यकर्ता का उत्साह, कर्मठता और योगदान को कोई बाधा नहीं रोक सकती।
एक और रोचक तथ्य है। किसी और में व्यक्तिनिष्ठा का अनुभव उसी कार्यकर्ता को होता है जिसके मन में व्यक्तिगत अभिनिवेश अधिक प्रभावी होता है। संघनिष्ठ अधिकारी अथवा कार्यकर्ता व्यक्तिनिष्ठा का आरोप लगाने के स्थान पर अपने स्नेह, आचरण और आवश्यक अभिमत (feedback) के द्वारा उस कार्यकर्ता को क्रमशः व्यक्ति, तत्व और संघ के प्रति निष्ठा तक विकसित करता है।

व्यष्टि से समष्टि की ओर मन के विस्तार की यात्रा का यह सहज और सरल उपाय है। प्रत्येक को अपनी व्यक्तिगत साधना का भी सामूहिक फल अधिकतम रूप में पाने का अवसर संगठन के प्रति समर्पण प्रदान करता है। इसका सीधे अनुपातिक संबंध है। जितना अधिक समर्पण, संघनिष्ठा उतना अधिक पुण्यलाभ। क्योंकि अधिकस्य अधिकं फलम्।

संगठन की अद्भुत परिभाषा,समझने के लिए, आत्मसात करने के लिए, दिशा देने हेतु ओर सर्वाधिक महत्वपूर्ण मन के समस्त द्वन्द्वो को शांत करने के लिए….. पूर्णता लक्ष्य की संभव तभी जब हम गूढ़तम को सरलतम बना कर आगे बढे… निसंदेह संगठन शक्ति श्रेष्ठ शक्ति… साधुवाद
🙏 *वेद आज्ञा*🙏
पिबतं सोमं मधुमन्तमश्विना बर्हिः सीदतं सुमत्।
ता वावृधाना उप सुष्टुतिं दिवो गन्तं गौराविवेरिणम्॥ ऋग्वेद ८-८७-४॥
हे गृहस्थ के नर नारी! परमेश्वर के बनाए हुए पदार्थों के बारे में ज्ञान प्राप्त करें। जिस प्रकार दो हिरण एक नदी के जल से अपनी तृषा को शांत करते हैं। उसी प्रकार तुम भी परमेश्वर द्वारा बनाए जीवन उपयोगी पदार्थों का उपभोग कर आनंद प्राप्त करें और उन पदार्थों की समृद्धि और वृद्धि के लिए कार्य करें। (ऋग्वेद ८-८७-४)
O men and women of the household! Gain knowledge about the substances God created. Just as two deer quench their thirst with the water of a river. In the same way, you also get pleasure by consuming useful things created by God and work for their prosperity and growth. (Rig Veda 8-87-4)
🙏 *सुप्रभात*🙏
व्यक्ति से समष्टि की ओर विकास करने की कठिनाइयों को नजरंदाज करते हुए राष्ट्रहित में सर्वोत्तम देने की निपुणता संघ की कार्यपद्धति से हमें मिला।
इसके लिए मैं आपका के प्रति आभारी हूं।
प्रणाम दादा।