गढ़े जीवन अपना अपना -14
आद्य क्रांतिकारी वासुदेव बलवन्त फडके को जेल में बंद रखना भी सम्भव नहीं था। जेल से भागने के लिये उन्होंने कोई बहुत बड़ी योजना नहीं बनाई। उनका अपनी शक्ति पर विश्वास था। उन्होंने अपनी कोटरी के आगे लगे सलाखों के जाल को दोनों हाथों से पकड़कर उखाड़ लिया और फिर उसे उठाकर ही दौड़ पड़े। उसी फाटक को जेल की दिवार से सटाकर खड़ा किया और उसी की सीढ़ी बनाकर दिवार फांद गये। जंगल में फिर भीलों की सेना बनाई और क्रांति का कार्य जारी रखा। कोई उन्हें कभी पकड़ ही नहीं पाता यदि वे बुखार से पीड़ित नहीं हो जाते। ज्वर ने ऐसा घेरा कि मंदिर में नींद में ही बेहोश हो गये। तब अंगरेज सेनापति सोते वासुदेव की छाती पर सवार हो गया। फिर भी होश आते ही उसे धक्का देकर गीरा दिया। पर शस्त्र निकाल लिये गये थे और कमजोरी भी इतनी थी कि भागना सम्भव नहीं था इसलिये पकड़े गये।
बाघा जतीन भी बालासोर के जंगलों में 9 सितम्बर 1915 को अंगेजों से लड़ते हुए मरणांतक घायल हुए
और दूसरे दिन अस्पताल में उन्होंने अंतिम श्वास ली। उससे पहले 4 दिन से बारीश के बीच जंगल में भागते भागते उन्हें भी बुखार चढ़ गया था और इस ज्वर में लड़ने के कारण ही वे अंग्रेजों के शिकार हो गये। यदि स्वास्थ्य साथ देता तो शायद इन दोनों क्रांतिकारियों का कार्य और अधिक आगे बढ़ता। इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक ने 11 वी कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई में से एक वर्ष का विराम लेकर योग व्यायाम आदि के द्वारा पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त किया। इसी के चलते मण्डाले में घोर शारीरिक यातनाओं के बाद भी वो पूरे बल के साथ राष्ट्र का नेतृत्व करने लौट सके।
जीवन को गढ़ने की प्रक्रिया में व्यक्तित्व विकास के बाहरी आयामों में बल और रुप के बाद तीसरा है – स्वास्थ्य। यह केवल शरीर के स्तर पर ही नहीं है। पूरे व्यक्तित्व का ही स्वस्थ होना अत्यन्त आवश्यक है। व्यक्तित्व के पांचों स्तर – शरीर, मन, भाव, बुद्धि तथा आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ होना चरित्र के सम्यक विकास के लिये अनिवार्य है। सामान्यतः निरोगी होने अर्थात रोग ना होने को ही स्वास्थ्य समझा जाता है। पर वास्तव में स्वस्थ होना एक सकारात्मक विधा है। स्वामी विवेकानन्द ने लण्डन में दिये एक व्याख्यान में कहा कि ‘हम भारतीय इतने आध्यात्मिक हैं कि जब एक-दूसरे से मिलते है तब अभिवादन में भी गहरा प्रश्न पूछते है।’ उन्होंने अंग्रेजी में वह प्रश्न बताया – Are you upon yourself? अर्थात क्या आप अपने आप में स्थित है? भिन्न भिन्न भाषाओं में अभिवादनों को देखने पर इस अर्थ का कोई सीधा अभिवादन ध्यान में नहीं आता है। पर अभिवादन के साथ सामान्यतः हम स्वास्थ्य की पृच्छा करते है। ‘क्या आप स्वस्थ है?’ यदि संस्कृत में संधि तोड़कर देखे तो ‘क्या आप स्व में, -अपने आप में स्थित है?’ भारत में ‘स्व में स्थित होने’ को ही स्वस्थ होना मानते है।
स्व में स्थित होना केवल आध्यात्मिक ही नहीं व्यक्तित्व के सभी स्तरों पर होता है और इन स्तरों के आपसी संबन्ध में भी। जैसे मन और शरीर का सीधा सम्बन्ध है। मन प्रसन्न हो तो शरीर भी स्वस्थ होता है। भावों के असंतुलित होने से श्वसन, पाचन, रक्तदाब जैसी सामान्य शारीरिक प्रक्रियाएँ भी बाधित होती है। अतः पूर्ण रुप से स्वस्थ रहने के लिये इन सब स्तरों को जोड़नेवाले तत्व को समझना पड़ेगा। छान्दोग्य उपनिषद् में रेक्व महामूनि की कथा आती है। केवल 15 वर्ष की आयु में विश्व में व्याप्त शक्ति को समझने के लिये तप किया और तत्व का साक्षात्कार भी किया – ‘यथा ब्रह्माण्डे वायु तथा पिण्डे प्राणः’। जैसे सारे जगत में वायु व्याप्त है उसी प्रकार व्यक्तित्व में प्राण सर्वव्यापी है। बिना वायु के कोई स्थान नहीं रह सकता वैसे ही प्राण का भी निर्बाध प्रवाह चलना अनिवार्य है। मन और शरीर को जोड़ने वाला भी प्राण ही है। अतः स्वस्थ होने का अर्थ है प्राणवान होना। प्राण अर्थात जीवनी उर्जा। इस उर्जा की मात्रा (Quantity) तथा गुण (Quality) दोनों स्वास्थ्य के प्रमुख कारक हैं।
प्राण का एकमात्र स्रोत सूर्य है। सूर्य से ही हमें प्राणउर्जा प्राप्त होता है। भोजन में भी जो शक्ति हम पाते है वह भी सूर्य की ही उर्जा होती है। वनस्पति सूर्य की उर्जा को अन्न में परिवर्तित करती है। शाकाहारी भोजन में हमे यह प्राण सीधे प्राप्त होता है। मांसाहारी भोजन में यह परोक्ष रुप से ही प्राप्त होती है क्योंकि अधिकतर जिन प्राणियों का मांस खाया जाता है वे स्वयं शाकाहारी होते है अतः उनके द्वारा वनस्पति से प्राप्त सूर्य के प्राणों को द्वितीय चरण में मनुष्य उनके मांस से प्राप्त करते है। अतः मांसाहार में मात्रा एवं गुण दोनों स्तरों पर प्राण का ह्रास होता है। भोजन से अधिकतम प्राण की उर्जा प्राप्त करने के लिये ताजा भोजन सर्वाधिक उपयोगी होता है।
पारम्पारिक ज्ञान की दृष्टि से प्राण 3 गुणों से भावित होता है। सात्विक, राजसिक व तामसिक। किन्तु आधुनिक समय में इन सब तकनिकी बातों में उलझने के स्थान पर शुद्धि एवं ताजगी का ध्यान रखना ही पर्याप्त होगा। प्राण की पर्याप्त प्राप्ति के साथ ही उसके समुचित प्रयोग एवं अपव्यय को रोकना भी आवश्यक है। प्राण के सम्यक प्रयोग के लिये हमारी प्रणालियों, खासकर श्वसन तथा पाचन की प्रणालियों का सुदृढ़ होना जरूरी होगा। इन सब के लिये अपनी क्षमता के अनुसार नियमित व्यायाम करना चाहिये। प्राण का अपव्यय मन के स्तर पर सर्वाधिक होता है अतः अपनी आदतों को संयमित करने से ही हम अधिक प्राणवान हो सकते है। अपव्यय को रोकने का दूसरा प्रभावी माध्याम है सही विश्राम। हम सोते भले ही 8 घण्टे हो पर विश्राम पूरा नहीं पाते है। इसीलिये तो पूरे रात की नीन्द के बाद भी सुबह उठने पर ताजगी के अनुभव की जगह और कुछ समय सोने की ईच्छा बनी रहती है। सब बच्चे माँ से यही कहते है ‘पांच मिनट और . . .’ सोने से पूर्ण आराम पाने के लिये गहरी नीन्द होना आवश्यक है। इसके लिये सरल उपाय है सोने से पूर्व हाथ पांव धोना। मन को शांत करने के लिये जप, प्राणायाम अथवा किसी भावात्मक पुस्तक का स्वाध्याय। योग में प्रशिक्षित लोग शवासन तथा योगनिद्रा का भी प्रयोग समयक विश्राम द्वारा प्राण संरक्षण के लिये कर सकते है।
प्राण की प्रचुरता से ही व्यक्तित्व के सभी स्तर निरामय होते है और पूर्ण स्वास्थ्य का लाभ मिलता है। प्रतिरोधी प्रणाली के समर्थ होने के कारण रोग पास ही नही फटकेंगे अतः निरोगी होने का सह उत्पाद (By-Product) भी प्राप्त होगा। पर ये ध्यान रखना चाहिये की योग एवं अन्य साधनाओं का उद्देश्य पूर्ण स्वास्थ्यलाभ से चरित्र का विकास है ना कि रोगों से छुटकारा। अन्यथा स्थिति उस साधक की तरहा होगी जो शिवरात्रि के दिन पूरी रात जागकर चारो याम पूजन करता है। सुबह शिवजी प्रसन्न होकर दर्शन देते है और कहते है ‘मांगो जो वरदान मांगना हो।’ कुछ देर पहले ही साधक के पीठ पर एक कीड़ा काटा है और ऐसी जगह खुजली हो रही है जहाँ हाथ भी नहीं पहुँच पा रहा। तो जब शिवजी प्रगट हुए तब सबसे बड़ी समस्या पीठ की खुजली है। अतः शिवजी से वर भी मांगा तो यही कि खुजली मिटा दो। जो सर्वकल्याणकारी शंकर सबकुछ दे सकता है उनके वर को केवल खुजली मिटाने में व्यर्थ गवांने के समान ही मूर्खता है रोगमुक्ति के लिये योग करना।
याद रहे! प्राणवान होना ही पूर्ण स्वास्थ है केवल निरोगी होना नहीं।

Bahut Sunder Bhaiya
bhai karyakratao ko apne sharir gathan me vyayam to aavashayk hai hi sath hi sath-
Ayurveda me 3 upstambh batye gye hai-
1. Aahar
2. Nidra
3. Brahmcharya
Hamara sarwangeed vikas inke balance se hi sambhav hai….
adhikadhik brhmandiya pran ko aakarshit krne k niymit pranayam aur suryanamskar sahayak ho sakte h
shareer madhyam khalu dharm sadhnam…………