
भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म की सनातनता का रहस्य है कि वह किसी एक आधार पर अवलंबित नहीं है। जिनका आधार मठ-मंदिर है उनका पतन इन भवनों, संस्थाओं के विनाश से हो सकता है जैसा पारसियों और यहूदियों के साथ हुआ। भारत में जितने मंदिरों को तोड़ा गया उसकी तुलना विश्व के किसी अन्य भूभाग में हुए विध्वंस से नहीं हो सकती किंतु हिंदू धर्म आज भी विश्वगुरु बनने को सन्नद्ध है। जिनका आधार एक ग्रंथ है वे भी आज अनेक गुटों में बटकर संघर्षरत हैं। भारत में अनेक ग्रंथ होते हुए भी संप्रदायों में परस्पर समन्वय बना है। इसका कारण है ग्रंथों के भाष्य, व्याख्या आदि की परंपरा। एक ही ग्रंथ को अपने पांथिक दृष्टिकोण से व्याख्या का अधिकार सभी को है। सभी के द्वारा आपसी मतों का स्वागत और स्वीकार किया जाता है। शास्त्रार्थ भी परस्पर सम्मान का ही उत्सव रहा है। समय-समय पर साक्षात्कारी संतों तथा तपस्वी ऋषियों ने मत समन्वय, दर्शन ऐक्य, भेद निरूपण का कार्य किया है।
हिंदू धर्म का सर्वाधिक लोकप्रिय तथा बहुचर्चित ग्रंथ है श्रीमद् भगवद्गीता। विश्व की लगभग सभी भाषाओं में अनूदित भगवद्गीता वर्तमान युग में सभी स्तर, आयु के मानवों के लिए एक उपयोगी साहित्य बना है। भारत के सभी मत संप्रदायों के संतों, विद्वानों ने इस पर भाष्य, व्याख्यान अथवा निरूपण किये हैं। वर्तमान में भी अनेक पुस्तकें इस ग्रंथ पर प्रकाशित हो रही हैं। धार्मिक, आध्यात्मिक, योगिक व्याख्याओं के साथ ही प्रबंधन, वित्त, शासन जैसे आधुनिक विषयों पर भी गीता आधारित लेखन, पाठ्यक्रम संचालन विश्व के अग्रणी विद्यापीठों में हो रहा है। भारतीय प्रबंधन संस्थान (I.I.M.) कोलकाता में प्रो. अनिल चक्रवर्ती द्वारा गीता विषय पर पाठ्यक्रम प्रारंभ किया गया। भारतीय प्रबंधन संस्थान (I.I.M.) बैंगलोर के प्रो. महादेवन ने पाठ्यक्रम के साथ ही इस विषय पर ग्रंथलेखन भी किया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (I.I.T.) खड़गपुर में गीता पर महाजालस्थल (supersite) का निर्माण किया गया है जिसमें भगवद्गीता के साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न ग्रंथ मुमुक्षु पाठकों को आन्तरताने (internet) पर उपलब्ध कराए हैं। केवल भारत में ही नहीं, विश्व में भी भगवद्गीता मार्गदर्शक है। विश्वविख्यात हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में भारतीय शास्त्रों में प्रबंधन एवं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के हिन्दू स्टडीज के अंतर्गत भगवद्गीता में विज्ञान तथा प्रबंधन आदि पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। इसी के साथ अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में भगवद्गीता पर पाठ्यक्रम लोकप्रिय हो रहे हैं।

गीता के विविधांगी प्रयोगों के मध्य उसके मूल भाव को समझना आवश्यक है। गीता का तत्कालीन उद्देश्य तो अर्जुन को युद्ध के लिए तत्पर करना था। अपने मन की संकीर्णता के कारण मोहित अर्थात कर्तव्य के प्रति भ्रमित अर्जुन धर्म्य युद्ध से विमुख होता है। तब उसे स्वधर्म का भान कराने के लिए स्वयं पार्थसारथी भगवान द्वारा गायी इसलिए भगवद्गीता हम सभी के लिए स्वधर्म का स्पष्ट मार्गदर्शन करती है। सामान्यतः हम सबके मन में उठनेवाली शंकाओं, जिज्ञासाओं तथा प्रश्नों को अर्जुन ने वाचा दी है। इस कारण गीता अनेकों के लिए एक सुलभ कुंजी बन गई है। जैसे आधुनिक छात्र पाठ्य अथवा संदर्भ पुस्तकों के अध्ययन के स्थान पर सहज उपलब्ध कुंजियों अथवा प्रश्नोत्तर विधि में प्रकाशित मार्गदर्शिकाओं पर अधिक विश्वास करते हैं, उसी प्रकार विस्तृत शास्त्र ग्रंथों के सांगोपांग अध्ययन के स्थान पर गीता हमें एक सहज कुंजी प्रदान करती है। इस हेतु हमें भगवान कृष्ण से भी अधिक अर्जुन का ऋणी होना चाहिए। भगवान को तो जो भी संदेश देना है वह द्वितीय अध्याय में ही बता दिया है। अर्जुन के प्रश्नों ने व्याख्यान को आगे बढ़ाया और शास्त्रों के विविध अंगों का संक्षिप्त आख्यान हमें स्वयं भगवत्मुख से प्राप्त हुआ।
सत्य को जानने, समझने और अधिक महत्वपूर्ण साक्षात्कार के जितने भी मार्ग हो सकते हैं सबका सुगम आख्यान हमें गीता में प्राप्त होता है। निष्काम किंतु श्रेष्ठ कर्म द्वारा मुक्ति का कुशल मार्ग कर्मयोग गीता का प्रमुख प्रतिपाद्य माना जाता है किंतु उतनी ही स्पष्टता एवं आग्रह के साथ सृष्टि के गूढ़ रहस्यों पर चिंतन का मार्ग ज्ञानयोग अथवा समर्पण और प्रेम का मधुर मार्ग भक्तियोग भी गीता में भगवान ने प्रतिपादित किये हैं। ज्ञान और कर्म के मार्ग को इतने सम समान महत्व के साथ आग्रहपूर्वक कहा है कि अर्जुन तीसरे अध्याय के प्रारंभ में भगवान पर आरोप करता है कि मिश्रित वाक्यों से आप मुझे भ्रमित कर रहे हैं। जब ज्ञान को कर्म से महान बता रहे हैं तो दूसरी ओर युद्ध जैसे घोर कर्म में क्यों धकेल रहे हैं? इस प्रकार दोनों के समन्वय का कर्मसंन्यास योग भी हम सब के कल्याण के लिए गीता में प्रस्तुत होता हैं।

मन का संयम कर चित्त की वृत्तियों का निरोध करने का राज मार्ग राजयोग के विविध अंग अर्थात ध्यानयोग, क्रियायोग, हठयोग आदि का भी विस्तृत वर्णन अर्जुन के प्रश्न और भगवान कृष्ण की अहेतुकी कृपा से गीता में हमें प्राप्त होते हैं। इतना सारा ज्ञान प्रदान करने के बाद भी जब अर्जुन स्वाध्याय में ही रमना चाहता है और युद्ध के लिए तत्पर नहीं होता तब भगवान उसे दिव्य दृष्टि प्रदान कर अपने विराट विश्वरूप का भी दर्शन कराते हैं। इसके त्वरित बाद उत्पन्न समर्पण का सम्यक दिग्दर्शन करने भक्ति का मार्ग प्रतिपादित करते हैं।
सभी षट्दर्शनों का समन्वित प्रतिपादन करने के बाद दैवासुर संपद का सुस्पष्ट आख्यान कर करणीय-अकरणीय, प्राप्य-अप्राप्य अधिगम फलित को व्याख्यायित करते हैं। सभी स्तरों पर सत्व-रज-तम के भेदों को पूर्ण व्यावहारिकता से बताने के पश्चात अर्जुन को अपने मन के अनुसार कर्म करने का स्वातंत्र्य प्रदान करते हैं।
अतः गीता का अंतिम आदेश है ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ – जैसा चाहो वैसा करो। वर्तमान युवा को और क्या चाहिए? यही स्वातंत्र्य कि मनमर्जी चला सके। भगवान केवल एक ही पूर्वकार्य अपेक्षित करते हैं। पहले अशेषेण विमर्श कर लो। बिना कुछ बाकी रहे ज्ञान पर चर्चा, स्वाध्याय, विचार कर लो फिर जैसी इच्छा वैसे कार्य करो।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्येतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ।।18.63।।

कहते हैं कि गीता समझनी है तो अर्जुन के भाव में आना होगा। अर्थात युद्धभूमि में भी विस्तृत स्वाध्याय करने को तत्पर होना होगा। केवल विषाद और भ्रम से काम नहीं चलेगा। अर्जुन के ये दो भाव तो हम सबके पास प्रचुर मात्रा में हैं – संबंधों में मोह और कर्तव्य के प्रति भ्रम। किंतु केवल इसी से अर्जुन नहीं हो जाते। अर्जुन का विषाद योग बना क्योंकि उसने शिष्यत्व ग्रहण किया। यदि स्वयं की कृपणता अर्थात् विचारों की संकीर्णता, मन के छोटेपन को स्वीकार कर अर्जुन कृष्ण का शिष्यत्व ग्रहण नहीं करता तो उसका विषाद भी वर्तमान मनोविज्ञान के अनुरूप डिप्रेशन का रोग ही रह जाता। दूसरे अध्याय के सातवे श्लोक में अर्जुन द्वारा प्रपन्न शरणागति ही गीता के प्राकट्य का निमित्त बना है।
स्वयं के पुरुषार्थ से अथवा उसके परिणाम से असंतुष्ट तो लगभग सभी हैं किंतु स्वयं दायित्व ग्रहण करने के स्थान पर परिस्थिति, परिजन आदि औरों को दोष देते रहते हैं। यदि स्वयं के प्रति जवाबदेह बन परिवर्तन का प्रयत्न करने लगते हैं तो वही पिपासा दैवी असंतोष में परिवर्तित हो जाती है। ऐसे कर्तव्य भाव से ही कृष्ण का सारथ्य प्राप्त होता है। हम भी यदि गीता को आत्मसात कर अपने स्वधर्म का दर्शन कर जीवन को सार्थक बनाना चाहते हैं, सच्चे अर्थ में स्वतंत्र हो मन के अनुसार कर्म करना चाहते हैं तो हमें अर्जुन के विषाद और भ्रम के साथ ही समर्पण और स्वाध्याय को भी अपने अंदर जागृत करना होगा। तभी हमारा भवरोग भी कृतियोग में रूपांतरित होगा और हम भी विश्वास से कह सकेंगे कि मोह नष्ट हुआ, कर्तव्य का स्मरण हुआ और ईश्वर अब हम आपके आदेश का पालन करने को तत्पर हैं।

नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव ।।18.73।।
दैवी असंतोष से ईश्वरीय उपकरण बनने की यात्रा में गीता की व्याख्या हम सब के लिए उत्तम पाथेय है, अपेक्षा केवल यह है कि अर्जुन सा शिष्यत्व ग्रहण करें।

Krishnam Vande Jagadgurum🙏🙇♀️🪷💐