शिक्षण विधि (Pedagogy) सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। अध्ययन केंद्रित शिक्षण विधि ही सर्वाधिक प्रभावी होती है। वर्तमान में Teaching केंद्रित विधि से ही शिक्षा निष्प्रभ दिखाई देती है। Teaching शब्द को वैसे ही प्रयोग किया क्योंकि उसके समानार्थी कोई शब्द हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध नहीं है। सबसे निकट पर्याय उपदेश है। उपदेश शिक्षण विधि के रूप में अत्यंत विरल स्थितियों में ही उपयोगी हो सकती है। सभी के लिए सामान्य विधि के रूप में प्रयुक्त होने के कारण व्याख्यान ही कक्षाओं में मुख्य गतिविधि बन गया है। परिणामस्वरूप शिक्षा में आनंद नहीं रहा। विद्यालय में जाना छात्र और शिक्षक किसी के लिए भी रसमय और आकर्षक नहीं है। सब अवकाश की प्रतीक्षा करते है।
ज्ञान तो आनंद का पर्याय है। जीवन में आनंद ज्ञान से ही मिलता है और छोटी से छोटी ज्ञानानुभूति अपार आनंद देती है। इसी कारण पूरे विश्व के शिक्षाविद सर्वाधिक प्रयोग रसमय शिक्षण विधि पर कर रहे हैं। प्रकल्प विधि (project based learning), अनुभव अध्ययन (Experiential Learning), प्रायोगिक (Experiment) आदि वर्तमान में शोभाचार (fashion) बन गए हैं। ध्येय तथा अध्ययन दिशा के विपरीत होने के कारण ये सारे प्रयोग अधूरे रह जाते हैं। सूचनाओं को बाहर से अंदर भरना ही शिक्षण मानने के कारण ये सारी विधियाँ अनुपयुक्त हो जाती हैं। मूल्यांकन जब तक जानकारी के स्मरण का होगा तब तक केवल शोभाचार के लिए भिन्न भिन्न विधियों का प्रयोग अपर्याप्त ही रहेगा। अंतर्निहित ज्ञान की अभिव्यक्ति शिक्षण की परिभाषा होने से मूल्यांकन का आधार भी संकल्पना स्पष्टीकरण, अभ्यास, व्यवहार और चरित्र हो जाएगा। तब Teaching का स्थान Learning लेगा और ज्ञानसाक्षात्कार की एक ही विधि होगी तप।
तपसाब्रह्मविजिज्ञासस्व।तपोब्रह्मेति। ॥तैतिरीयउपनिषद – भृगुवल्ली– 2.1॥

तप का शाब्दिक अर्थ है अग्नि की आँच में तपना। इसी के भिन्न भिन्न प्रयोग हैं। तप में कष्ट, संयम और अनुशासन आवश्यक हैं। इनके द्वारा शरीर, मन, बुद्धि के सीमित आवरण को हटा असीम ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित होता है। तप तो जीवन के संग ही प्रारंभ होता है। गर्भ में भी तप के द्वारा ही एक अंड से भ्रूण और फिर पूर्ण शरीर बनता है। यह जनन भी तप का ही परिणाम है। किंतु गर्भ से बाहर आते ही इसका विस्मरण हो जाता है। तब प्रथम रुदन से ही बाह्य जीवन का तप प्रारंभ होता हैं। आँखे खोलते ही जगत को जानने समझने का प्रयत्न प्रारंभ होता। सभी पाँचो इंद्रियाँ तप से ही ज्ञान ग्रहण सीखती हैं। कर्मेंद्रियों का प्रयोग भी तप से ही सीखना होता है। तप ही एकमात्र शिक्षण विधि है। ऊपर वर्णित सभी प्रायोगिक विधियाँ भी तप के ही भिन्न भिन्न प्रकार हैं।
अधिशील स्तर पर इंद्रिय क्षमता विकास और विविध प्रयोग, अधिचित्त स्तर पर मन को एकाग्र करने तथा सम्बन्धों के द्वारा भावविस्तार के लिए तप ही करना होता है। तप का सहज अभ्यास ही शिक्षा का आनंददायी रहस्य है। तप में स्वप्रेरित कष्ट होने से अनुभूति से प्राप्त ज्ञान से आनंद मिलता है। अतः ये शिक्षण विधि अध्ययन और आनंद केंद्रित होती है। अधिप्रज्ञ स्तर पर धर्म बोध और विवेक जागरण के लिए शारीरिक और मानसिक के साथ ही बौद्धिक तप को भी जोड़ना पड़ता है।

नवरात्रि के अष्टमी की आराध्या माता महागौरी हैं। माँ का यह नाम ही तप के कारण पड़ा है। उग्र तप के कारण माँ का वर्ण काला हो गया तब प्रसन्न होने के बाद शिवजी ने गंगाजी से स्नान करा माता को पुनः गौर वर्ण का बना दिया। इसीसे उनका नाम पड़ा महागौरी। उनकी उपासना भी तप से ही करनी है। माँ का वाहन श्वेत वर्ण का वृषभ है। गौरी का वाहन भी विमल गौर ही होगा। किंतु विमल अथवा शुद्ध होने का तात्पर्य निर्बल होना नहीं है। इसलिए तपोमूर्ति महागौरी का वाहन शक्तिशाली वृषभ है। तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षा वल्ली में वृषभ को वेद अर्थात् सम्पूर्ण ज्ञान का प्रतीक बताया है।
यश्छंदसामृषभोविश्वरूपः।छंदोभ्योऽध्यमृतात्संबभूव। ॥तै. उ. शीक्षावल्ली३.१॥
इनके अध्ययन से ही अमृतत्व प्राप्त होता है। महागौरी के वस्त्र भी शुभ्र है। जीवन में शरीर, प्राण, मन, भाव और चेतना के स्तर पर पंचशुद्धि आवश्यक है। महागौरी इसी शुद्धीकरण की देवी है।
आज तप अर्थात् Research को केवल उच्च शिक्षा का अंग बनाया गया है। तप और शुद्धि ही हर स्तर की शिक्षण विधि है। विधि परिवर्तन से मूल्यांकन तथा पाठ्य भी बदलेगा और ज्ञान की दिशा ठीक हो जाएगी। शिक्षा आनंदमय, अध्ययन केंद्रित होगी और छात्र-आचार्य दोनों विद्यालय की ओर आकर्षित होंगे। बिना किसी विवशता और बंधन के शतप्रतिशत से अधिक उपस्थिति रहेगी। यही महागौरी का प्रसाद है।

प्राचीन काल में भारत तप के बल पर ही ज्ञान अर्जित कर विश्व गुरु बन सका था। आज जब एक ओर भारत को उसी मार्ग पर अग्रेषित करने के प्रयास हो रहे हैं तो शिक्षा के नियामकों द्वारा
शिक्षा के डिजिटलीकरण की बात की जा रही है।
क्या यह उपागम शिक्षा और ज्ञान के वास्तविक लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में बाधक नहीं है?
यह विचारणीय है।
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