शिक्षा का प्रारंभ तो गर्भ में ही हो जाता है। चक्रव्यूह जैसे क्लिष्ट विषय के बारे में भले ही अभी शोध शेष हो किंतु मस्तिष्क के भाषा केंद्र का विकास गर्भ के ग्यारहवे सप्ताह में होने लगता है यह आधुनिक मस्तिष्कशास्त्रियों ने भी पता किया है। इस प्रकार मातृभाषा की शिक्षा गर्भ से ही प्रारंभ होती है। इस प्रकार कुछ अंश में सभी मानव अभिमन्यु है ही। अन्य सभी इंद्रियों का विकास भी गर्भ से ही प्रारंभ होता है। यह भी आधुनिक विज्ञान को ज्ञात हुआ है। मन और चित्त के विकास तथा बुद्धि और अहं के शुभारंभ को अभी वे नहीं जान पाए हैं। भारतीय शास्त्रों में अधिजनन के लिए अंतःकरण पर अधिक कार्य किया गया। गर्भ धारण से पूर्व से ही संस्कार की व्यवस्था की गई है।

जन्म के साथ ही जातक का अध्ययन प्रारंभ होता है। आँखे खोलते ही जगत को ग्रहण करने का साहसिक नवाचार हर बालक को करना होता है। वही से उसका अन्वेषण (research) प्रारंभ होता है। हम सब जन्म से ही शोधकर्ता हैं। पाँचों ज्ञानेंद्रियों से अपने परिवेश को जानना प्रारंभ होता है। ज्ञान साक्षात्कार का प्रथम चरण तो इंद्रिय द्वारा सूचना अथवा जानकारी ग्रहण ही है। बुद्धि द्वारा तुलना तथा विश्लेषण-संश्लेषण प्रक्रिया से निष्कर्ष तक पहुँच समझ (cognition) होना तो दूसरा चरण है। इस महत्वपूर्ण बात को जानकर भारतीय शिक्षा शास्त्र में अध्ययन का प्रथम चरण अधिशील शिक्षा हैं। मातृकुल शिक्षा अर्थात् जन्म से संस्थागत शिक्षा व्यवस्था पूर्व विद्यालय (Pre-School), विद्यालय अथवा पाठशाला, गुरुकुल में प्रवेश से पूर्व माता के सान्निध्य में अधिशील शिक्षा का प्रारंभ होता है। वर्तमान व्यवस्था के पूर्वप्राथमिक (ECCE) जिसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने आधार स्तर कहा है उसमें भी अधिशील शिक्षा ही अपेक्षित है।
यह इंद्रिय विकास का स्तर है। इंद्रिय का उपकरण जैसे आँख, उसका स्नायविक आधार जैसे दृक स्नायु (Optic Nerve) तथा मस्तिष्क में दृष्यकेंद्र (Optic center) व मन का अधिष्ठान तीनों मिलकर ही इंद्रिय कार्य करती है। तीनों स्तरों पर विकास अधिशील शिक्षा में अपेक्षित है। यह संयम से ही संभव है। संयम के अभ्यास अर्थात् इंद्रियों के प्रयोग में नियमन के द्वारा ही विवेक जागृत होता है। इंद्रियों के विषय तथा मात्रा का चयन व नियंत्रण विवेक द्वारा ही आजीवन होता है । उस विवेक का जागरण अधिशील शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है। शास्त्रीय विधि से विवेक विकास नहीं हुआ तो विकृत मूल्य पूरे जीवन की दिशा बनाते/बिगाड़ते रहते हैं। गीता में भी भगवान कृष्ण कहते है – श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ( भ गी 4:39) इंद्रिय संयम को ज्ञानसाक्षात्कार का अनिवार्य पूर्वसंकेत (Precondition) कहा है। इसी कारण विद्याध्ययन के कालखंड का नाम ब्रह्मचर्याश्रम है।

द्वितीय नवरात्रि की देवी है ब्रह्मचारिणी। पुराण में इनके द्वारा उग्र तपस का वर्णन आता है। सहस्रों वर्ष शिव के लिए तपस करने की कथा आती है। काल के विभिन्न स्तर होने के कारण ३००० वर्ष केवल बिल्वपत्र पर व्रत करने की बात को भिन्न प्रकार से समझना होगा। मुख्य प्रेरणा की बात है विश्वकल्याण के लिए हर बाधा का विनाश कर सबका शिव अर्थात् मंगल करनेवाले देवाधिदेव को पाने के लिए तप (research) करना होता है। ज्ञान और कल्याण दोनों का यही मार्ग है। तप से ही ब्रह्मचर्य और उसी से सब कुछ प्राप्त होता है। शुभ्र वस्त्र धारी माँ ब्रह्मचारिणी के एक हाथ में जपमाल और दूसरे में कमंडलु है। संस्कृति अथवा ज्ञान के साथ ही समृद्धि भी तप और ब्रह्मचर्य से ही मिलती है यही संदेश है।

अद्भूत 🙏🙏🙏🙏
अति उत्तम
विषय का चयन और फिर उसे शिक्षा से जोड़ते हुए अध्यात्म की चाशनी से तराबोर करके अज्ञानियो तक ज्ञान रूपी अमृत वर्षा आप जैसे मानिषी के द्वारा है संभव है l