लक्ष्यवेध का प्रथम आंतरिक साधन – प्रेरणा!

Mukul Kanitkar 8 मिनट का पठन

गढ़े जीवन अपना अपना -8

‘असम्भव! ये हमसे नहीं होगा!’ युवाओं के सामने चुनौति रखने पर पहली बार ऐसी प्रतिक्रिया पाने की उनको आदत थी। और फिर बात भी ऐसी ही हो रही थी। अंग्रेजी साम्राज्य की राजधानी लण्डन में बैठकर उनके ही बड़े अफसर से उसकी भारत में की गई ज्यादतियों का हिसाब मांगना? अपनी माँ बहनों के अपमान का प्रतिशोध लेना। बात से तो सब सहमत थे, पर क्या लण्डन में ये सम्भव है? सभी अनुभवी क्रांतिकारियों का मत था की अभी उनके दल की ऐसी स्थिति नहीं थी कि ऐसा कोई बड़ा कार्य सीधे हाथ में लिया जाये। बैठक में तर्कपूर्ण बातों पर ही निर्णय होता है। सावरकर को भी सबकी बात मानकर योजना को स्थगित करना पड़ा। पर उनकी भाव-भंगिमा से साथियों को पता चल ही गया कि वे इस निर्णय से प्रसन्न नहीं हैं। सब धीरे धीरे खिसक गये। केवल मदन बैठा रहा। सबसे छोटा तो था ही पूरे दल में नया भी था। इसलिये बैठक मे कुछ नहीं बोला था।
उसे याद आ रहा था सावरकर से प्रथम भेट का प्रसंग। युवा मदनलाल अपने पिता की अमीरी के मद में चूर लण्डन में पढ़ाई के बहाने रह रहा था और नाच-गाने, मस्ती में लगा रहता था। तब यह भोग ही उसे जीवन का सबसे बड़ा सुख अनुभव होता था। एक दिन उसने अपने देशी विदेशी युवा-युवतियों के दल के साथ इण्डिया हाउस के नीचे महफिल जमा ली। ग्रामोफोन की धुन पर सब थिरक रहे थे। उपर क्रांतिकारी दल की बैठक चल रही थी। एक भारतीय युवा इस अय्याश दल का नेता है ये सुनकर स्वयं सावरकर नीचे उतर आये। अचानक ग्रामोफोन के बन्द होने से मदन भड़क उठा। जोर से चिल्लाया भी, ‘‘कौन है?’’ पर उसे आज भी याद है लड़ने के लिये जैसे ही वह ग्रामोफोन की ओर मुड़ा इस दुबले-पतले शरीर के महामानव से आंखे भिड़ गई। क्या आंखें थी वो! आज भी कई बार सपने में दिखाई देतीं हैं। उस तेज के सामने धष्ट-पुष्ट पहलवानी काया का मदन भी स्तब्ध हो गया। और फिर वह कलेजे को चीरता प्रश्न, ‘क्या इसी के लिये तुम्हारी मां ने तुम्हें जन्म दिया? तुम्हारी भारतमाता परतन्त्र है और तुम मस्ती में ड़ुबे हो क्या यही तुम्हारे जीवन का उद्देश्य है?’ उस समय तो गर्दन झुकाकर उन तेजस्वी आंखों के अंगारों से दूर चला गया मदन पर प्रश्न मन में कौंधता रहा। और फिर उसी में से जीवन का उद्देश्य भी मिला और प्रेरणा भी। मदन क्रांतिगंगा में सम्मिलित हो गया। अनेक परीक्षाओं के बाद आज उसे अंतरंग मंत्रणा में बैठने का पहला अवसर मिला था। बैठक के तर्क तो उसे कुछ कुछ समझ आये थे। पर उससे अधिक समझ में आयी थी कार्य की अनिवार्यता। मन में तो ठान ही लिया।
‘सावरकर, व्यक्ति बलिदान के लिये कब तैयार होता है?’ प्रगटतः तो मदनने केवल यही प्रश्न पूछा।
सावरकरने कहा, ‘मदन ये जोश का काम नहीं है। इसके लिये आंतरिक प्रेरणा चाहिये। नारे लगाने की वीरता नहीं है यह इसमें योगेश्वर कृष्ण सा गाभ्भीर्य चाहिये।’
‘मैने कब कहा कि मै कुछ करने वाला हूँ। समिति के निर्णय से मै सहमत हूँ कि अभी ऐसी किसी योजना की आंच समिति पर नहीं आनी चाहिये। ये क्रांतिकारियों की बड़ी योजना में बाधक होगा। मै तो केवल सैद्धांतिक प्रश्न पूछ रहा हूँ कि व्यक्ति बलिदान के लिये कब तैयार होता है?’
‘जब वह स्वयं प्रेरणा से ठान ले तब!’ सावरकर ने भी संक्षिप्त सा उत्तर दिया। मदन ने कैसे समिति से अपना सम्पर्क तोड़ दिया, कैसे अकेले तैयारी की और कैसे दुष्ट कर्जन वायली को मृत्युदण्ड की सजा दी। ये तो सब आज नहीं बतायेंगे। आपको मदनलाल धींगरा की जीवनी में ये सब स्वयं पढ़ना पड़ेगा। आज तो ये प्रसंग इसलिये चल पड़ा क्योंकि चरित्र निर्माण की कड़ी में आज का विषय है, लक्ष्यवेध का प्रथम आंतरिक साधन – प्रेरणा।
प्रेरणा ही जीवन बदल देती है। इसी प्रेरणा के द्वारा मस्ती में ड़ूबा युवा योगेश्वर का सामथ्र्य प्राप्त कर मातृभूमि पर बलिदान होने का सौभाग्य प्राप्त करता है। गंगा के तट पर एअर फोर्स में प्रवेश परीक्षा में असफलता के कारण निराशा में आत्मघाती विचारों में बैठै अब्दुल को कोई स्वामी शिवानन्द मिल जाता है। गीता की प्ररणा दे जाता है और भारत को मिसाइल मैन मिल जाता है। 1965 के युद्ध में अपने सब साथियों के बलिदान के बाद स्वयं को ही जीवित बचा देख जीवन से हताश सेना के सीधे-साधे ड्राइवर को अहमदनगर के स्टेशन पर चने की भुंगळी में स्वामी विवेकानन्द के कर्मयोग का कागज पढ़ने को मिलता है और जीने की प्रेरणा मिल जाती है। भारत के निराश यौवन को नया गांधी मिल जाता है। अन्ना हजारे स्वयं लाखों की प्रेरणा बन जाते है।
प्रत्येक सफलता का कारण प्रेरणा ही होती है। तुलसी और कालिदास के जीवन में पत्नि से मिली झिड़क का अपमान कवित्व की प्रेरणा बन रसधारा में बह उठता है। तो माता से पिता की गोद छिन जाने का अपमान धृव की अड़ीग साधना की प्रेरणा बन जाती है।
सतर्क मन में ही अधिक कुतर्क आते है। आजके आधुनिक विज्ञाननिष्ठ युवा के मन में कुलबुला रहे प्रश्न को हम जानते है। आप पूछे इससे पहले हम ही पूछ लेते है, ‘क्या प्रेरणा के लिये हमे भी किसी घटना की प्रतीक्षा करनी होगी? मदनलाल, ए पी जे या अन्ना के समान सकारात्मक या तुलसी या धृव के समान अपमानकारक?’
निश्चित ही यह नहीं हो सकता कि प्रत्येक के जीवन में किसी हादसे से ही प्रेरणा का जागरण हो। वास्तव में हम सबके जीवन में प्रेरणा तो कार्य कर ही रही होती है। बिना प्रेरणा के कोई भी कार्य सम्भव नहीं किन्तु जब जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सके ऐसी तगड़ी प्रेरणा की बात करनी हे तो उसका वैज्ञानिक विधि से विकास किया जा सकता है। शिवाजी, स्वामी विवेकानन्द जैसे महापुरूषों के जीवन में यह संस्कारों से विकसित स्थायी प्रेरणा कार्य करती हुई दिखाई देती है। माता जिजाउ तथा गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस की शिक्षा पद्धति आज भी सभी अभिभावकों व शिक्षकों के लिये आदर्श है। उस शिक्षा-विज्ञान पर फिर किसी और प्रयोजन में बात होगी। आज तो प्रेरणा के विकास का विज्ञान देखते है।
प्रेरणा भाव से उत्पन्न होती है विचार से नहीं। किन्तु आज के युग में हम इतने तार्किक हो गये है कि कई बार विचार ही भाव का ट्रीगर बन जाते है। प्रेरणा कुछ पाने की भी हो सकती है और कुछ देने की भी। पद, पैसा, प्रतिष्ठा पाने की प्रेरणा जीवन की प्रतिस्पद्र्धा में इन्धन का काम करती है। व्यावसायिक लक्ष्यसिद्धि में यह सहायक भी होती है। पर देखा गया है कि यह स्थायी नहीं होती और असफलता में घोर हताशा का कारण बनती है। अनेक सम्पन्न लोगों के जीवन में रिक्तता के कारण पैदा हुए विषाद (Depression) में हम इसे देख सकते है। अनेक रोगों को भी ये जन्म देती है।
देने की पे्ररणा अधिक स्थायी और प्रभावी होती है। परिवार को आधार अथवा सम्मान प्रदान करना, समाज में कुछ योगदान देना, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नये अविष्कार करना, देश की रक्षा, सेवा व सम्मान में अपनी आहुति देना ये प्रेरणा के तत्व बड़ें जीवनलक्ष्य के वेध में सहायक हो सकते है। एक व्यक्ति के जीवन में ये दोनों पे्ररक तत्व कार्य कर रहे हो सकते है। जैसे एक खिलाड़ी पैसे और प्रतिष्ठा के लिये तो खेलता ही है पर उसका सर्वोत्तम तो तब प्रगट होता है जब वह अपने देश के सम्मान के लिये खेलता है। विम्बल्डन व अमेरिकन ओपन जैसी प्रतियोगिताओं में प्रचण्ड पुरस्कार राशि की प्रेरणा के होते हुए भी दूसरे राउण्ड से आगे ना जा पाने वाले भारतीय टेनिस खिलाड़ी देश के लिये खेलते हुए डेविस कप में विश्व के उंचे से उंचे खिलाडियों को मात दे देते है। इसके पीछे के रहस्य के बारे में पूछने पर, ‘कुर्सी पर बैठा रेफरी हर अंक में भारत का नाम लेता है, तो मेरा हर अंक भारत को समर्पित है ये बात खेल को अलग ही स्तर पर ले जाती है’ ऐसा बताते है।
हम भी भाव के उचित संस्कार से अपनी प्रेरणा को राष्ट्रार्पित कर सकते है। इसी से हमारा सर्वोत्तम प्रगट होगा। इसके लिये देशभक्ति गीत, देशभक्तों की जीवनियों का पठन, संकल्पपूर्वक देश के लिये प्रतिदिन कुछ करना यह उपाय है।
एक और बात पोषक वातावरण में ही प्रेरणा का विकास होता है। इसलिये सही संगत भी अत्यावश्यक है। हमारी प्रेरणा का विस्तार देश के स्तर तक होने के लिये आवश्यक है कि हम ऐसे भाव वाली टोली का हिस्सा बनें। अथवा ऐसी टोली बनायें। प्रेरणा के स्रोत माता-पिता, गुरु, मित्र, सम्बन्धी कोई भी बन सकते हैं पर इसका सुनिश्चित स्रोत तो हम स्वयं ही है। अतः प्रेरणा तो वही स्थायी है जो स्वयंप्रेरणा हो। इस के विकास के लिये नित्य आत्मावलोकन आवश्यक है। रोज सोने से पूर्व 5 मिनट भारतमाता का ध्यान करे और फिर स्वयं के दिन की समिक्षा करें।

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

लेखक के सभी लेख →

One comment

  1. Bhaiya ati uttam !! Really very verry encouraging. Aaj ki baithak ki shurwat is swadhya se ho sakti hai.!!!!!!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *