कोई शक या सवाल?

Mukul Kanitkar 9 मिनट का पठन

कर्मयोग 9:
प्रश्नों का गीता में बड़ा महत्व है। अर्जुन के प्रश्नों से ही गीता का प्रवाह आगे बढ़ता है। अन्यथा तो दूसरे अध्याय में भगवान ने अपनी बात पूरी ही कर ली है। जीवन में प्रश्नों का बड़ा महत्व है। ज्ञानप्राप्ति में उचित प्रश्नों का सही आदरयुक्त सेवाभाव से पूछा जाना आवश्यक होता है। कर्मयोग के रहस्यों को समझते समय हम यह भी कला विकसित करें ये आवश्यक है। मन में उठनेवाले हर प्रश्नवाचक विचार को ज्ञानकुंजी प्रश्न नहीं कहा जा सकता। अर्जुन जैसे सटीक प्रश्न मन में पकने देने होते है। सामान्यतः विचारश्रृंखला का प्रारम्भ जिज्ञासा से होता है। जिज्ञासा में हम ज्ञानप्राप्ति का प्रयत्न प्रारम्भ करते है। द्वितीय अध्याय में अर्जुन द्वारा स्थितःप्रज्ञ के लक्षणों के बारे में पूछना जिज्ञासा कि श्रेणी में आता है। कृष्ण द्वारा दूसरे अध्याय में प्रदत्त ज्ञानयोग व कर्मयोग के सिद्धांतों के आकलन से अर्जुन विषाद की स्थिति से बाहर आ गया है व जिज्ञासा को प्रगट कर रहा है। जिज्ञासा ज्ञान को ग्रहण करने की तत्परता को दर्शाती है। बिना जिज्ञासा के कितना भी श्रेष्ठ व्याख्याकार क्यों ना हो वह अपने उपदेश से तात्कालिक बौद्धिक क्षुधा शांति तो कर सकता है किन्तु ज्ञानदान नहीं। ज्ञानदान गुरु की योग्यता से भी अधिक शिष्य की तत्परता पर निर्भर करता है। इस जिज्ञासा को जागृत करना सच्चे गुरु का प्रथम कर्तव्य है।
किन्तु प्रथम प्रयास में सुने हुए उच्च सिद्धान्त कई बार हजम नहीं होते है। पूरा समाधान नहीं होता ऐसे में मन का भ्रम से सामना होता है। दो प्रगटतः परस्पर विरोधी सिद्धांतों में अपक्व बुद्धि भी सामंजस्य बैठाने का प्रयास करती है। पर हो नहीं पाता तब भ्रम होता है। भ्रमित मन से सटीक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते किन्तु जब भ्रम की स्थिति में हम किसी से मार्गदर्शन पाने का प्रयत्न करते है तब गुरु कितना भी ज्ञानी व सुयोग्य क्यों ना हो मन में शंका ही प्रगट होती है। तीसरे अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन पूछता है
जायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन
तत् किं कर्मणी घोरे माम् नियोजयसि केशव।।गी 3.1।।
जब आप स्वयं ही कह रहे हो कि ज्ञान कर्म से अधिक श्रेष्ठ है तो फिर मूझे क्यों ऐसे भयंकर कर्म में धकेल रहे हो? यह सर्वाधिक सुयोग्य गुरु द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च ज्ञान पर की गई शंका है। अगले श्लोक में तो अर्जुन स्पष्टता से अपने सम्भ्रम को मानता है और कृष्ण पर आरोप लगाता है कि आपकी मिश्रित बातों से ये हो रहा है।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसिव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम।।गी 3.2।।
ऐसी दोगली बातों से आप मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हो। कर्म करना श्रेष्ठ है अथवा ज्ञान के लिये कर्म का त्याग? इस संभ्रम और शंका में भी उसकी श्रद्धा अड़ीग है। अतः वह इस शंका की स्थिति में भी अपने शिष्यत्व को नहीं भूला है और कृष्ण से ही कह रहा है कि आप ही ऐसे में निश्चित करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है?
महर्षि अरविन्द कहते है श्रद्धा कभी भी अन्ध नहीं होती ना ही बिना प्रश्न के विश्वास करने को कहती है। श्रद्धा में तो प्रश्न पूछने की स्वतन्त्रता है। शिष्य के मन में कोई भय नहीं है कि मूझे गलत समझा जायेगा। या मेरे द्वारा शंका प्रगट करने पर गुरु मेरे प्रति दूर्भाव धारण करेगा। यदि ऐसी आशंका में प्रश्न पूछने का संकोच हे तो यह श्रद्धा की कमी है। श्रद्धावान के मन में ना तो कोई भय है ना ही आशंका अथवा संकोच। बालक जिस प्रकार माता से निःसंकाच अपने मन की बात कह सकता है वैसे ही शिष्य अपने गुरु के सामने अपने अंतर की जिज्ञासा, भ्रम अथवा शंका को खुलकर प्रग्ट करता है। इस विश्वास के साथ कि यहाँ से उत्तर अवश्य मिलेगा। शंका का समाधान होगा। भ्रम का निरास होगा।
अर्जुन का कृष्ण से नितान्त स्नेह का सम्बन्ध है। इतना घनीष्ठ कि कोई दुराव या संकोच नहीं है। 11 वे अध्याय में विश्वरूप दर्शन के बाद अचंभित अर्जुन अपने सखासे क्षमा मांगता है
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।गी 11.41।।
तुम्हारी महिमा को ना जानते हुये मैने प्रेम में आपको कई मित्रवत् संबोधनों से पुकारा है। कृपया मेरी इस धृष्टता को क्षमा कर दें। इस सख्य के होते हुए भी अर्जुन का शिष्यत्व उच्च कोटी का है। और यदि हम गीता के मर्म को जानने का यत्न कर रहे है तो हमें अर्जुन सा शिष्यत्व प्राप्त करने के लिये प्रार्थना करनी चाहिये। दूसरे अध्याय के 7 वे श्लोक में शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।। कहकर शरणागति प्राप्त करने के बाद से ही हम अर्जुन के संवादों में विषाद के स्थान पर शिष्यत्व की प्रगल्भता का विकास देखते है। जिज्ञासा, भ्रम और शंका की सिढ़ियों का पार करते हुये अर्जुन प्रश्न और उससे भी विकसित परिप्रश्न तक पहुँचता है और भगवान से अंतिम ज्ञान प्राप्त करता है।
चौथे अध्याय में ज्ञान की महिमा बताते हुये उसके प्राप्ति का माध्यम भी बताया है।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः।।गी 4.34।।
प्रणिपात अर्थात विनम्र शरणागति, परिप्रश्न अर्थात अपने तप से तपा हुआ सटीक प्रश्न और सेवा से संतुष्ट हुए तत्वदर्शी ज्ञानीगण ज्ञान का उपदेश देते है। तीनों आवश्यक है। वर्तमान युग में शिक्षा में तर्क का आधार अधिक होने के कारण प्रश्नों का पकना सबसे कठीन है। विनम्रता व सेवा तो श्रद्धा से आ ही जायेगी किन्तु सही प्रश्न को अपने अन्दर पकाने का ध्यैर्य व सही गुरु से पूछने का विनम्र साहस आज के युग मे प्रयत्नपूर्वक विकसित करने पड़ेंगे।
गीता में अर्जुन की अनेक जिज्ञासायें हैं जैसे स्थितःप्रज्ञ के लक्षण पूछना,
स्थितःप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।। गी 2.54।।
या फिर पापाचरण का कारण पूछना
अथ केन प्रयुक्तोSयं पापं चरति पुरूषः।
अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः।। गी 3.36।।
बिना स्वयं की इच्छा के भी बलपूर्वक किस प्रेरणा से मनुष्य पाप का आचरण करता है? ये जिज्ञासायें है – अतन्त्य निष्पाप मन से पूछी गयी जानकारीयाँ। यह ज्ञान सर्वजनहिताय है।
किन्तु तिसरे अध्याय के प्रारम्भ कर्म व ज्ञान के चयन के बारे में पूछे उपरोक्त भ्रमजनित प्रश्न अथवा चौथे अध्याय में जन्मक्रम के भ्रम के बारे में पूछना
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानियां त्वमादौ प्रोक्तवान् इति।। गी 4.4।।
आपका जन्म तो विवस्वान के बाद हुआ है फिर हम ये कैसे मान ले कि आपने पूर्व में ही विवस्वान को यह कर्मयोग का ज्ञान बताया था? वैसे ही फिर पाँचवे अध्याय के प्रारम्भ में
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेयं एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितं।।गी 5.1।।
कभी कर्म के सिद्धांत की बात करते हो पुनः फिर से कर्म योग की बात करते हो। हे कृष्ण इनमें से जो एक मेरे लिये श्रेयस्कर हो वो तय कर के मुझे बता दो। ये सारी शंकायें है। कृष्ण द्वारा बतायें गये उपदेश में जो ऊपरी विरोधाभास है उससे भ्रमित होकर पूछी गई शंकायें। पर एक बात स्पष्ट है शंका प्रगट करते समय भी अर्जुन स्पष्ट हे कि उसे क्या चाहिये। उसने ये नहीं कहा कि मुझे क्या भयेगा अथवा सहज होगा? ये पूछा है कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वा बताओ। हर बार श्रेय की चिंता है।
इन सब स्तरों में से पकते पकते अर्जुन की मेधा प्रश्न पूछने के लिये तैयार हुई और फिर अनेक जिज्ञासाओं, भ्रम और शंकाओं के बाद उसका प्रश्न प्रगट हुआ,
एवमेतद्यथत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।।गी 11.3।।
हे परमेश्वर आपका वह सर्वव्यापी रूप मै देखना चाहता हूँ। यदि सम्भव हो तो मुझे वह परम दर्शन करायें। इससे पूर्व पहले श्लोक में वह मान चुका हे कि उसका भ्रम दूर हुआ। अब मोह नहीं रहा।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेनं मोहोSयं विगतो मम।। गी 11.1।। आपके द्वारा कहे गये इन गुढ़ अध्यात्मज्ञान युक्त वचनों से मेरा मोह जाता रहा है। मोह के जाने के बाद प्रश्न प्रगट हुआ है। परमज्ञान की अनुभूति करने वाला प्रश्न। साक्षात्कार की भूमिका बना वह प्रश्न। जिस प्रश्न के उत्तर में अर्जुन को योगी, ज्ञानियों को भी दूर्लभ ऐसा विश्वरूप दर्शन हुआ वह प्रश्न। इसे ही परिप्रश्न कहते है। पूर्ण परिपक्व मेधा से उत्पन्न सटीक प्रश्न।
हम भी अपने अन्दर अर्जुन की श्रद्धा का जागरण करें। अपने मन की जिज्ञासाओं, भ्रम और शंकाओं को प्रगट करें। उसी में से प्रश्न को पूछने की परिपक्वता आयेगी। यदि मन में उठनेवाली शंकाओं को ही संकोच, भय अथवा उपहास की आशंका से दबा देंगे तो प्रश्न का पकना ही असम्भव हो जायेगा। और फिर ज्ञान की सम्भावना भी दूरस्थ होगी। सबसे बड़ी समस्या होती है कि किसे पूछे? सच्चा गुरु आज कहाँ मिलेगा?  यदि हमारा शिष्यत्व पक जाये तो गुरु को आना ही होगा। अभी तो किसी ऐसे सुहृद  से पूछना प्रारम्भ करे जिसके बारे में तीन बाते हमें निश्चित हो – 1. वह हमसे अधिक ज्ञानी वा अनुभवी है। 2. वह हमसे प्रेम करता है और हमारे ध्येय के बारे में सम्भवतः हमसे अधिक जानता है। 3. उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है।
ऐसा मार्गदर्शक मिलना कम से कम भारत में तो आज भी कठीन नहीं है। तो आज ही शुरू हो जाये पूछना चाहे जिज्ञासा हो, भ्रम हो या शंका? जैसे सेना में अधिकारी हर बात को समझाने के बाद अवसर देते हुए पूछता है – कोई शक या सवाल?

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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