एक खोज अंदर की ओर ……………….

Mukul Kanitkar 6 मिनट का पठन

एक देश सारे विश्व मे विख्यात था। किसी पत्रकार ने सोचा इसकी ख्याति का रहस्य खोजा जाय। जब वह अपनी खोजबीन के लिये उस देश मे पहुंचा तो उसे पता चला की एक प्रान्त के कारण वह सारे विश्व मे प्रसिद्ध था। वह उस प्रान्त में गया तब उसने पाया कि वहां एक जिला है जिसके कारण वह प्रान्त देश में, देश विश्व में विख्यात है। जिले के मुख्यालय पहुचने पर उसे एक गाँव का पता बता दिया गया जिसके कारण जिला प्रान्त में, प्रान्त देश में व देश विश्व में नामवर था। गाँव में भी एक मोहल्ला व मोहल्ले में एक मंदिर जिसके कारण गाँव जिले में, जिला प्रान्त में, प्रान्त देश में और देश सारे विश्व में प्रसिद्ध थे।

मंदिर के गर्भगृह में तो मूर्ति होगी ही। उस मूर्ति की ही प्रतिष्ठा थी जो ख्याति की सुगन्ध सभी भौगोलिक स्तरों पर फैला रही थी। पत्रकार जब गर्भागार में पहुंचा तब उसे बड़ा दुःख हुआ। मूर्ति हल्दी कुमकुम तथा अन्य पूजा सामग्री की परतों से ढकी हुई थी। पुजारी तथा अन्य भक्तगण भी उस देवता का नाम नहीं बता पाये जिसने उस मंदिर को विश्वभर में प्रसिद्ध कर दिया था। पत्रकार बड़ा जीवट का खोजी था। उसने पूजा सामग्री की परतों को खोलना प्रारंभ किया। परत दर परत उसकी संकल्प शक्ति की परीक्षा हो रही थी। वह बड़ी लगन से अपने कार्य में  लगा रहा। कुदेरते-कुदेरते जब वह तह तक पहुंचा, जब सारा आवरण हटा दिया तब उसके आश्चर्य की सीमा ही न रही। वहां कोई मूर्ति थी ही नहीं। था एक दर्पण, शीशा, आईना।

सदियों पूर्व हमारे पूर्वजों ने मंदिर में पूजास्थल की स्थापना की थी। दर्पण जो हमें अपने अंदर झाँकने की प्रेरणा देता है। अपने आप का परिक्षण करने की प्रेरणा देता है। ईश्वर तो हमारे अंदर ही है। उसे खोजना भी अंदर ही है अतः  आत्मस्वरूप का पूजन ही सच्चे अर्थ में पूजा है। मंदिर का अर्थ यही है की हम अपने आप को पहचानना प्रारम्भ करें। मूर्ति के रूप में एक शीशा हो या न हो मंदिर में हम जाते अपने आप के दर्शन हेतु ही। भगवान के दर्शन करना तो निमित्तमात्र है।
दिल्ली में एक गरीब मजदूर रहता था। दिनभर 100-100 किलो अनाज के बोरे उठाता-ठेला चलाता तब शाम तक रु 90-100  कमाता। कभी कबार  एकाध  बोरे की फेरी ज्यादा कर ले तो रु 20-25 अधिक मिल जाते थे। उसी रोजी में से घर की रोटी, बच्चों की पढाई, कपडे सब चलाता था। फिर भी घर में छोटे से कोने में स्थापित मंदिर में रोज कुछ न कुछ चढ़ाता था। जब अधिक रोजी मिलती तो फिर उस दिन तो दानपात्र में रु 20-25 भी डल जाते थे। पत्नी पूछती – भगवान के पास तो सबकुछ है फिर आप उन्हें क्यों देते रहते हो? बच्चों के दो कपड़े अच्छे आ जायेंगे। कभी किसी दिन फल ही खाने को मिलेंगे। वह चुप रहता हँस देता। बचत का क्रम जारी रहता।

उसके मन में दढ़ संकल्प था। वह पर्याप्त बचत के बाद वैष्णौ देवी जाना चाहता था। वर्षों तक मेहनत कर, अपने और अपने बच्चों की सुविधाओं में कटौती  कर इसी एक आस में बचत कर रहा था। जब पर्याप्त राशी जुट गयी तो सबको लेकर कटरा गया कटरा से पैदल पहाड़ी चढ़ना। 14 किमी. की चढाई नाचते – गाते भक्तों के साथ पार हो गई। जय माता दी का घोष कानों में ही नहीं मन में भी गूँज रहा था। सारे वातावरण में यही स्वर थे -मै भी बोलू जय माता दी -तुम भी बोलो जय माता दी। सब मिल के बोलो,  प्रेम से बोलो, जोर से बोलो, गाते बोलो, नाचते बोलो, आते बोलो, जाते बोलो -जय माता दी।

सब अजनबी पर एक दुसरे से प्रेम से अभिवादन करते जय माता दी। सबकी ही पहचान है – सब माता के भक्त। सबका लक्ष्य एक ही -पहाडावाली, शेरावाली के दर्शन। अनेक आयु अवस्था के लोग। कोई टट्टू पर तो कोई पालखी में, कोई झूमता, कोई लंगड़ता, कोई लाठी का सहारा लिए पर सब जा रहे एक ही भवन कि ओर माँ के दर्शन करने………..

जब ऊपर मंदिर के बाहर पहुंचा तो शरीर थक के चूर था पर मन में थी एक अनोखी शांति। लम्बी कतार में खड़े प्रतीक्षा, माँ के दर्शन की… इतने वर्षों की मेहनत, त्याग, बचत और आज के भी लम्बे परिश्रम के बाद वो क्षण आ ही गया जब गुफा के अंदर माँ के दरबार में दाखिल हुआ। मूर्ति के सामने खड़े होने की जगह भी कम है और भीड़ के कारण पुजारी खड़े भी नहीं होने देते। केवल चंद क्षण मिलते है माँ के सामने। अपना बहादुर भाई भी खड़ा हुआ गर्भगृह के सामने। एक क्षण ही माँ के रूप को निहारा होगा कि पुजारी बोल उठा-चल आगे चल। कुछ ही क्षण में उसे निकास गुफा कि ओर धकेला जाना था फिर भी उसने हाथ  जोड़े और आँखे मूँद ली।
वर्षों मजदूरी करके संचित धन को खर्च कर वैष्णौ देवी आया। किसलिए? माँ का दर्शन करने… 14 किमी. पहाड़ी पर थका देने वाली यात्रा की, किसलिए? माँ के दर्शन करने। लम्बी कतार में खड़े होकर प्रतीक्षा की किसलिए? माँ के दर्शन करने….
और फिर जब माँ के सामने दो चार क्षण मिले तो उसमे भी कुछ देर के लिए आँखें बंद कर ली। इतना प्रयास इतना परिश्रम….. माँ के दर्शन के लिए फिर….टकटकी लगाकर देखता रहता आँखें क्यों बंद की?
क्योंकि हम माँ के दर्शन करना चाहते हैं। अपने ही अंदर। अपने ही अंतर्मन में। उपनिषदों में वर्णित इतना बड़ा सच हम जानते हैं उस पर अमल कर रहे हैं और फिर भी हम अंजान हैं। अनजाने मे हम मंदिर में हम दर्शन करने जाते हैं तब अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। हम अपने अंदर ईश्वर की खोज करते हैं। किन्तु सजगता के आभाव में वह हमारे जीवन पर प्रभाव नहीं डालता। यदि हम इसका अर्थ समझने का प्रयास करेंगे तो पायेंगे कि देवालय, मंदिर तो निमित्त हैं कि हम अपने अंदर कि खोज प्रारम्भ करें।

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

लेखक के सभी लेख →

5 Comments

  1. बहुत ज्ञान परक लेख है ….
    और सत्य ही है की जब तक व्यक्ति स्वयं में परमात्मा नहीं प्राप्त कर लेता …सरे मंदिर, मस्जिद और तीर्थ व्यर्थ हैं…..

  2. God is alive when you are alive.
    If you are not alive,
    how can your God be alive?
    Your God is yours.
    If you are dead, your God is dead;
    if you are alive, your God is alive.
    Your God cannot be more than you,
    because your God is your innermost core of being.
    So if you want to know what God is,
    become more alive.
    If you want to know what God is,
    become more divine.
    If you want to know what God is,
    then don’t try to
    know — try to feel.
    He comes through the door of the heart.
    Osho ♥

  3. आत्म ज्ञान का , आत्म लाभ का सही मार्ग दिखाता आलेख – डॉ. उमाशंकर नगायच ,
    भोपाल, म.प्र .

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *