मानवता के शत्रु आज के चण्ड-मुण्ड

Mukul Kanitkar 8 मिनट का पठन

विचार नवरात्रि – 7

या देवी सर्व भूतेषु हिंसारूपेण संस्थिता । 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ॥

अहिंसा का महिमामंडन करते हुए हम हिंसा की जीवन में, धर्म रक्षा में भूमिका भूल जाते हैं। सप्तमी नवरात्रि की देवी कालरात्रि हमें संहार की अनिवार्यता का स्मरण कराती हैं। अपनी सहयोगिनी देवियों के साथ वे मधु कैटभ के वंशज शुम्भ-निशुम्भ, उनके सेनानायक चण्ड-मुण्ड, धूम्रलोचन, रक्तबीज का आवश्यक हिंसा के साथ निर्दलन करती हैं। जब समाज अहिंसा के नाम पर पाशवी, राक्षसी और आसुरी वृत्तियों का दमन करना टालता है तो उसके ही समाप्त होने का भय खड़ा हो जाता है। इसलिए विजय के लिए जितना आत्मबोध अर्थात् स्वयं को जानना आवश्यक है उतना ही शत्रुबोध अर्थात् मानवता, धर्म, न्याय, एकत्व, समरसता, बंधुता के विरोधी, विभाजक, विघटनकारी बलों का पूर्ण परिचय भी आवश्यक है। सभी विध्वंसक बलों की विचारधारा, सामाजिक स्थिति, गतिविधियाँ और उनके स्थापित कथ्य को समझने के बाद ही हम समाज में तथ्यपरक विमर्श स्थापित कर सकते हैं।

असुरों का वर्णन भी बड़ा रोचक और सांकेतिक है। वर्तमान समय में विश्व में कार्यरत विघटनकारी बलों को इनके माध्यम से बहुत अच्छी तरह से समझ सकते हैं। पुराणों के वर्णन में चण्ड असुर का केवल धड़ है, सिर नहीं है और मुण्ड का केवल सिर है धड़ नहीं है। यह केवल विभत्स ही नहीं आसुरी शक्ति का भी रूपक है। धड़ केवल शारीरिक बल का प्रतीक है। अतः चण्ड में पाशविक बल है जो अत्याचार करता है। मुण्ड की राक्षसी गतिविधियाँ बुद्धि के बल से होती है। कपट, चतुराई का प्रयोग जब औरों को कष्ट देने के लिए होता है तब वह मुण्ड जैसा असुर होता है। जब बिना अधिक योजना या बुद्धि प्रयोग किए केवल शारीरिक अथवा भौतिक शस्त्रबल का उपयोग शोषण, अत्याचार और अन्याय के लिए किया जाता है तो वह चण्ड असुर कहा जाएगा।

पूरे विश्व में गत लगभग दो सहस्राब्दियों से बौद्धिक, आध्यात्मिक दोनों प्रकार के आतंक और हिंसा का तांडव जिन विचारधाराओं ने मचाया है वे इस चण्ड-मुण्ड के समान ही हैं। चर्च की प्रसारवादी विचारधारा पूरे विश्व को ईसाई बनाने के लिए सब प्रकार के षडयंत्रों का प्रयोग करते हैं। कपट, असत्य, लोभ सभी का उपयोग कर अपनी संख्या बढ़ाना यह एकमात्र उद्देश्य इसके सभी माननेवालों का है। विश्व के सभी महाद्वीपों में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए सभी प्रकार के हथकंडों का प्रयोग चर्च द्वारा किया जाता रहा है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका में वहाँ के प्राचीन निवासियों का बड़ी संख्या में नरसंहार भी चर्च संगठित प्रसारवाद ने किया है। किंतु शारीरिक बल से अधिक बुद्धिबल का उपयोग इस विघटनकारी बल के द्वारा किया जाता है। लगभग पाँच दशक बाद अस्तित्व में आये कट्टर इस्लाम ने अपने प्रारंभ से ही तलवार के बल पर प्रसार किया। स्थापना के दो तीन दशक में ही वर्तमान सीमाओं के अनुसार 28 से अधिक देशों में इस मज़हब से अधिक राजनीतिक विचारधारा का प्रसार हो गया था। शारीरिक बल का कल्पनातीत क्रूरता से प्रयोग कर यह प्रसार हुआ था। इन दोनों का आपसी संघर्ष प्रारंभ से चल रहा है। सर्वाधिक रक्तपात भी इसी संघर्ष में हुआ है। इन ऐतिहासिक चण्ड-मुण्ड प्रवृत्तियों ने धरती को कई बार रक्तरंजित किया है।

भारत में भी यह आसुरी बल अनेक वर्षों से कार्यरत है। अनेक आपसी मतभेदों और वैर के होते हुए भी इनके वैचारिक सिद्धांतों और पद्धतियों में अनेक साम्य भी हैं। दोनों ही एक ईश्वर, एक प्रेषित और एक पुस्तक पर आधारित संप्रदाय हैं। ईश्वरीय प्रेरणा से अवतरित संदेशों से एक नये मत की स्थापना कर पूरे विश्व को उसमें कन्वर्ट करने का लक्ष्य दोनों का है। दोनों विचारधाराएँ पूरी मानवता को माननेवाले और ना माननेवाले ऐसे दो वर्गों में विभाजित करती हैं। इन दोनों के लिए भिन्न-भिन्न नियम बनाये गये। माननेवालों को अपने मत का प्रसार करने के लिए अपराध तक की छूट दी गई है। ना माननेवालों को केवल दो ही पर्याय इनके ग्रंथों में दिये गये हैं — या तो मत को स्वीकार करें या जीने का अधिकार त्याग दें । दोनों ही पंथ संसार को ईश्वर द्वारा सृजित मानते हैं। छह दिन में सृष्टि करने के बाद एक दिन का विश्राम लिया। यह घटना लगभग 4000 वर्ष पूर्व की कही गई है। इसलिए जब उसके पूर्व धरती ही नहीं, मनुष्य के भी अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं तो उसे स्वीकारना इन मज़हबों के अनुयायियों के लिए असंभव हो जाता है। इसी कारण से सभी पुरातन सभ्यताओं का इतिहास विकृत किया गया है। पुरुष का सृजन करने के बाद नारी सहित पूरी सृष्टि को उसके भोग के लिए बनाया गया है, ऐसा दोनों रिलिजन के मूल ग्रंथों में लिखा गया है। इसी कारण पर्यावरण और नारी दोनों की दयनीय स्थिति विश्व के उस भूभाग में है जहाँ इन दोनों का प्रभाव है। पश्चिम की भोगवृत्ति का यही मूल है। इन मतों में महिलाओं में आत्मा नहीं होती। ईसाई मत में रणनीति के रूप में टेरेसा को संतत्व प्रदान करने से पूर्व उनमें आत्मा होना आवश्यक था इसलिए बाइबल में संशोधन कर महिलाओं में आंशिक आत्मा होने की बात जोड़ी गई। फिर भी आध्यात्मिक स्तर पर भी लिंगभेद समाप्त नहीं हुआ है।

अस्मानी कहे जाने वाले पूज्य ग्रंथों में पृथ्वी के चपटे होने, सूर्य द्वारा धरती की परिक्रमा, स्त्री का पुरुष की पसली से पैदा होना जैसे अनेक वैज्ञान विरोधी बातें आज भी हैं। अनेक वैज्ञानिकों को अपनी खोजे मज़हब विरोधी होने के अपराध में मृत्युदंड दिया गया। आज भी मदरसों और सेमिनरी में ये सब बातें सत्य के रूप में सिखायी जाती हैं। विश्व में जनजातियों के साथ भेदभाव और नरसंहार इन्ही चण्ड-मुण्ड विचारधाराओं ने किया है।

भेदभाव, प्रसार हेतु कुछ भी करने की स्वतंत्रता और पुरुष के लिए इस लोक और परलोक में भी प्रचंड भोग इन विचारधाराओं के केंद्र में है। इसी के परिणामस्वरूप मानवता को भयानक शोषण, अत्याचार और हिंसा का सामना करना पड़ा है। एक पुस्तक, एक परमपिता और एक प्रेषित होते हुए भी इनके अनेक गट बन गये हैं और अभी भी बनते जा रहे हैं। ईसाइयों के 33 हज़ार से अधिक डिनॉमिनेशन और इस्लाम के 77 से अधिक फिरके आज विश्व में कार्य कर रहे हैं। मतप्रसार के लिए राजनीतिक और व्यापारिक संगठन के रूप में कार्य कर रहे ये विभाग एक दूसरे से प्रचंड द्वेष करते हैं। आपसी अनुयायियों को कन्वर्ट भी करते हैं। उपासना के घर भी किसी व्यापार जैसे ही संचालित होते हैं। अधिकतर जातियों के ईसाई अथवा इस्लामी मतावलंबियों को नियमित शुल्क देना होता है, प्रसारकों को वेतन भी मिलता है। प्रत्येक अनुयायी का कर्तव्य होता है कि वह अधिक से अधिक लोगों को अपने गट का अनुयायी बनाएँ। इसका पूरा वृत्त (report) और लेखा (account) रखा जाता है।

मरने के बाद दोनों मतों में दफन करने की व्यवस्था इसलिए है क्योंकि शरीर ही महत्वपूर्ण है। उसे क़यामत अथवा जजमेंट के दिन तक प्रतीक्षा करनी है। तब उसका पूरा हिसाब होगा और उस आधार पर परलोक में भोग और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। इसलिए मरने के बाद RIP कहा जाता है Rest in Peace – शांति से पड़े रहो। हिन्दुत्व वैज्ञानिक कार्यकारण संबंध पर आधारित होने के कारण जानता है कि शरीर नश्वर है और जीवात्मा संस्कार साथ में लेकर अगले जन्म को पाता है और नया शरीर धारण करता है। इसलिए देह का दहन करते हैं। इसलिए सद्गति की प्रार्थना देहांत के बाद की जाती है। हिंदू RIP नहीं कह सकता। इन दोनों मतों में सभी को मोक्ष नहीं मिलता। केवल उनके गट को मानने वालों को ही मिलता है। शिया के अनुसार सुन्नी को और अन्य किसी भी फिरके के अनुयायी को जन्नत नहीं मिल सकती। उसी प्रकार का मत अन्य सभी फ़िरक़ों का है। यही कैथोलिक, प्रोटेस्टन्ट आदि के बारे में भी सत्य है। सब मानते हैं केवल हम ही सही हैं। एक परमपिता के उपासक होने के बाद भी यह द्वेष गहरा है। अन्य सभी देवताओं को तो वे शैतान मानते हैं। 

दोनों मत लगभग एक जैसे ही हैं – एक शारीरिक बल से प्रसार में विश्वास रखता है और दूसरा कपट में। केवल भारत ही नहीं पूरा विश्व इन आततायी विचारधाराओं के प्रकोप से पीड़ित है। इनके कृत्यों को मिथ्या प्रचार द्वारा छिपाकर महिमामंडन किया जा रहा है। ये तरकश (Toolkit) सबसे हिंसक मज़हब को शान्तिप्रिय और नन अथवा छात्रावासों के बालकों के साथ यौन शोषण और विद्या तथा चिकित्सा का व्यापार करनेवाले रिलिजन को सेवाभावी सिद्ध करते हैं। प्रचार के धुएँ से आँखों को ढँकनेवाले धूम्रलोचन का साथ असुरों के तंत्र में आज भी है। माँ कालरात्रि ने जैसे संगठित शक्ति से चण्ड-मुण्ड को उनके अज्ञानी वास्तव से मुक्त किया वैसे ही हमारा भी दायित्व है कि कट्टर जिहादी और प्रसारवादी बलों की वास्तविकता को जानें और सबको बताएँ और मानवता की इनके प्रकोप से रक्षा करें।

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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7 Comments

  1. जय मां कालरात्रि और अपने स्वरूप से कर्तव्य बताने वाली।
    चन्द और मुंड रूप मेरे अवगुणों को मिल दो।
    बल दो कोई रक्तबीज आए तब विवेक रूपी खप्पर में उसको सहेज कर जीवित नहीं होने दूं।

  2. अद्भुत विवेचन, पर हम सनातनी कैसे एकजुट होकर राष्ट्र रक्षा हेतु संकल्पित हों, यह एक विकट प्रश्न है।

  3. भैया अति सुंदर , पढ़कर ज्ञान का झरना मन में झरने लगा. अत्यंत उपयोगी. काश मै इस ;लेख को १०० करोड़ हिन्दुओं तक पहुंचा पाता.

  4. आज ये अधर्मी शक्तीया जिन निर्णायक स्थानोपर अपना नियन्त्रण रखकर पूरे विश्व मे अधर्म का चक्र चला रही है, उन स्थानों पर धर्म की ध्वज लहराने हेतु सेनाओं का गठन करना आवश्यक है।

  5. सनातन की धारणा है, जिस समाज में चंड मुंड जैसे आसुरी अभिव्यक्ति वाले हो, वहां आज नहीं कल, माता को कालरात्रि, चामुंडा, काली का रौद्र रूप लेना ही पड़ता है। आज के कलयुग में समाज में माताएं भी सो गई हैं, उन्हें जागृत कराने का प्रयास नही होता दिख रहा। सबसे बड़ी भूल माता की मातृत्व शक्ति को स्त्रीत्व का नाम दिया है। स्त्री के अनेक कार्यों में से केवल रिझना, रिझाना और रिझवाना जैसे कार्यों को ही चंड मुंड जैसे आसुरी अभिव्यक्ति वालों ने समाज में प्रचारित और प्रसारित किया। स्त्री के मातृत्व का उल्लेख भी सरकारी, निम्न सरकारी या गैर सरकारी पॉलिसी डॉक्यूमेंट्स में मिलता नही है। जबतक कोई भी स्त्री मातृत्व भाव से नही सोचेगी, अनुसरण नही करेगी, तबतक उसे सही अर्थ में नवरात्रि पर्व का उद्देश ध्यान नहीं आएगा। आपके इस लेख श्रृंखला ने उसी उद्देश को पूरा करने के पथ पर पहला कदम रखा है। आपका सदर अभिनंदन।

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