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राष्ट्रचिन्तन

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बुद्धि का परिशोधन मेधा से प्रज्ञा तक

महिष मानव के भीतर अवशिष्ट पशुत्व का प्रतीक है सब देवताओं के तेजांश से संगठित माँ कात्यायनी ही उस पर आरूढ़ हो उसका मर्दन…

1 October 2022 Mukul Kanitkar
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एकाग्रता और भाव विस्तार से ही अभय

सामन्यतः मन के रूप में सम्बोधित अन्तःकरण में चार करण (instruments) आते है -मन, बुद्धि, चित्त और अहं। एक ही आंतरिक व्यवस्था जिसे गीता…

30 September 2022 Mukul Kanitkar
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स्वावलम्बी युवा! समर्थ भारत!!

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को किसी युवा ने पूछा कि आप युवा किस कहते है? भाषा शुद्धिकरण के आन्दोलन को चलाते हुए भारतीय भाषाओं…

22 December 2013 Mukul Kanitkar
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चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद

चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है। वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा डाले गये कठोर निर्बंधों के कारण इस महोत्सव का उत्साह कुछ धीमा पड गया दिखता…

29 November 2013 Mukul Kanitkar
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दिग्विजय से पाएं विश्वविजय की प्रेरणा

जब समूचा राष्ट्र ही अपनी निहित शक्तियों के प्रति अनभिज्ञ होने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है तब कोई अद्वितीय विजय ही…

11 September 2013 Mukul Kanitkar
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अनास्था से केवल आक्रोश ! आस्था से परिवर्तन !!

स्वामी विवेकानंद के राष्ट्र चिंतन के प्रथम दिन : प्रश्न आस्था का है । मनुष्य आस्था के बल पर कुछ भी चमत्कार कर सकता…

26 December 2012 Mukul Kanitkar
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स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्र-ध्यान – II

भारत का उत्थान-पतन : स्वामी विवेकानन्द ने सारे भारत को अत्यन्त निकट से देखा था। उन्होंने भारतीयता को अपने अन्दर जीया था। इस जीवन्त…

27 December 2011 Mukul Kanitkar
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स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्र-ध्यान 25 से 27 दिसम्बर 1892

25 दिसम्बर 1892, स्वामी विवेकानन्द ने श्रीपाद शिला पर अपना ध्यान प्रारम्भ किया। मान्यता है कि उसी शिलापर देवी कन्याकुमारी ने स्वयं तपस्या की…

26 December 2011 Mukul Kanitkar
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