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बुद्धि का परिशोधन मेधा से प्रज्ञा तक

महिष मानव के भीतर अवशिष्ट पशुत्व का प्रतीक है सब देवताओं के तेजांश से संगठित माँ कात्यायनी ही उस पर आरूढ़ हो उसका मर्दन…

1 October 2022 Mukul Kanitkar
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आलेख

एकाग्रता और भाव विस्तार से ही अभय

सामन्यतः मन के रूप में सम्बोधित अन्तःकरण में चार करण (instruments) आते है -मन, बुद्धि, चित्त और अहं। एक ही आंतरिक व्यवस्था जिसे गीता…

30 September 2022 Mukul Kanitkar
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सामयिक टिप्पणी

धर्मानुसारी शिक्षा की स्थापना में शिक्षकों की भूमिका

मानव की पहचान संबंधों से है | बिना संबंधों के मनुष्य का कोई परिचय ही नहीं है | समस्त सृष्टि के अन्तर्निहित एकत्व का…

4 April 2016 Mukul Kanitkar
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आलेख

बहुआयामी धर्म की एकात्म संकल्पना

किसी भी राष्ट्र में सामाजिक, राजनैतिक समस्याओके मूल में वैचारिक अस्पष्टता की बहुत बडी भूमिका रहती है। भारत में ब्रिटिष राज के अवषेष आज…

23 December 2015 Mukul Kanitkar
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