संगठन की कार्य प्रणाली:
दुर्गा सप्तशति में मधु-कैटभ वध की कथा आती है। यह अत्यन्त रोचक रुपक है। दो असुर ब्रह्माजी के कान से निकले मैल से उत्पन्न होते हैं। उग्र तपस्या से देवी का वरदान पा लेते हैं। वरदान पाकर उन्मत्त हो जाते हैं। फिर महाविष्णु उनका वध करते हैं। देवी की भूमिका असुरों को वर देने पर समाप्त नहीं होती। वे ही क्षीरसागर में शेषशैया पर लेटे विष्णु को सुलानेवाली योग निद्रा भी हैं। ब्रह्माजी के प्रयासों से जब विष्णु नहीं जगते तब वे देवी की प्रार्थना करते हैं। तब देवी महाविष्णु को जगाती है और असुर संहार के लिये प्रेरित करती है, असुरों की शक्ति तथा कमजोरी का परिचय देकर मंत्रणा भी देती है।

कथा के रुपक में छिपे प्रतीकों को समझने से ही पुराणों का मर्म खुलकर सामने आता है। ब्रह्मा जी सृष्टिकर्ता है। वे सृजन में रत रहते हैं। विद्या की देवी सरस्वति के वे सर्जक होने के नाते पिता भी हैं और आगे के सृजन हेतु बनाने के नाते पति भी हैं। अर्थात विद्या के स्वामी हैं। आज की शब्दावली में समझें तो यह प्रबुद्ध वर्ग का प्रतीक है जो संकल्पनाओं का सृजन करते हैं और उनके माध्यम से नये विश्व का ही सृजन करते हैं। उनके कानों का मैल – अर्थात उनके सुनने में आनेवाली बातें। बार-बार कानों में जो बातें पड़ती है उनसे मन पर प्रभाव पड़ता है। प्रचार माध्यमों का यही कार्य होता है। हिटलर का प्रचार विभाग प्रमुख गोबेल्स कहा करता था, ‘‘एक असत्य को सौ बार कहो तो वह सत्य माना जाने लगता है।’’ आज हमारे देश में सारे प्रचार माध्यम यही कार्य कर रहे हैं। प्रबुद्ध वर्ग 24 घण्टे चलने वाले इस प्रचार से प्रभावित हो जाता है और फिर उसका सृजन भी भ्रमित होता है। यह प्रचार की भ्रामक बातें दो प्रकार की होती है – मधुर व कटु। जब इनकी अति हो जाती है तो ये असुर बन जाती हैं। यही रुपक है – कानों का मैल अति होकर बाहर रिसने लगा उसी से मधु और कैटभ असुर पैदा हुए। ये असुर भी बड़ा तप करते हैं, हमारे पत्रकारों के समान ही, जो सतत बड़े परिश्रम से कार्य करते हैं। पर समाचार के चक्कर में देशहित का विचार नहीं रहता। धर्म का भान छूट जाता है। मुंबई में ताज हमले के समय आतंकवादियों को सुरक्षाबलों की योजना की सारी जानकारी आधुनिक मधु-कैटभ की कृपा से ही मिल रही थी। इन असुरों के प्रभाव से पालनकर्ता भी सो जाते हैं। देवी ने इन्हें वरदान दिया है कि अपनी ईच्छा से ही इनकी मृत्यु होगी। यह रहस्य देवी के द्वारा विष्णु को पता चलता है और वे योगमाया से युद्ध के मध्य असुरों के मन में मृत्यु की इच्छा जागृत करते हैं। यही इन दुष्ट प्रचार माध्यमों का उपाय है।
आज के युग में धर्म संस्थापना कार्य में रत संगठनों को यह प्रबोधन का कार्य करना है। समाज के प्रबुद्ध वर्ग का प्रबोधन कर उसे मधु-कैटभ के प्रति सजग करना है। ऐसे जागृत प्रबुद्धजनों को संगठित करना है और फिर कार्य में लगाना है। महान ब्रिटिश इतिहासकार अर्नोल्ड टॉयनबि के अनुसार संस्कृति की रक्षा जागृत संगठित ‘सृजनशील अल्पसंख्य’ (Creative Minority) ही करते हैं। संगठनों का कार्य ऐसे सजग, सर्जक प्रबुद्ध वर्ग की सुगढ़ चमू का निर्माण करना है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में गाँव, जिले से प्रारंभ कर राष्ट्रीय स्तर तक ऐसी चमुओं का निर्माण करना है। इसके चार चरण है – जागरण, संकलन, प्रशिक्षण व प्रत्यक्ष कार्य। इन सब को मिलाकर संगठन की कार्यप्रणाली बनती है। विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक माननीय एकनाथ रानडे इसे संगठन की चतुःसूत्री कहते हैं। उनकी पुस्तक ‘सेवा ही साधना’ में ‘‘लोकसंपर्क, लोकसंग्रह, लोकसंस्कार व लोकव्यवस्था’’ यह नामावली देते हैं। जागरण के लिये लागों से संपर्क, संकलित करने के लिये संग्रह, प्रशिक्षण का कार्य लोकसंस्कार व प्रत्यक्ष कार्य का दायित्व देना लोकव्यवस्था। इसी प्रक्रिया से वैचारिक आंदोलन खड़ा कर आज के मधु-कैटभ, मिड़िया के अन्दर के असुर का नाश हो सकता है। इस नाश की अनिवार्यता व इच्छा उनके ही भीतर से पैदा करना यह हमारा कार्य है।
वर्तमान में विष्णु का पालनकार्य हमने समाज के स्थान पर सरकार को दे दिया है। शासन निद्रा में खोया है। ऐसे में विष्णुगुप्त चाणक्य की चेतावनी का स्मरण करना होगा, ‘‘जब शासन अपने कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ होता है तब शिक्षक को धर्म जागरण का दायित्व निभाना पड़ता है।’’ आइए इस नवरात्री के अवसर पर देवी योगमाया की आराधना करें कि वे भारती को पुनः जागृत कर असुर नाश की मंत्रणा धर्म-संस्थापना में रत संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रदान करें।

font ki size kaafi choti hai…
Karmanye va dhikarastae ma faleshu kadachana!!!!!!
Reblogged this on उत्तरापथ and commented:
नवरात्री पर जय माता दी
माँ कालरात्रि देवी इस कथा के मर्म के अनुसार आज के शिक्षक के समान है जो कानो सुनी बातों को महत्त्व दे तो शासन रूपी विष्णु को सुला दे या पुण्य लोगो की सुन कौटिल्य बन शासन को जगाने के साथ या अतिरिक्त नया शासक ही बना दे।
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता | लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी || वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा | वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयन्करि ||
ye tabhi sambhav hai jab sanghathan apna kary Nishta se kare.kyu ki jab se bjp ki sarkar aayi hai. Koi bhi sanghathan apna kary purn nistha se nhi kar rha hai.