गढ़े जीवन अपना अपना -5
चार्ल्स की उर्जा को दिशा देना उसकी माँ के बस का नहीं था। 10 साल का बालक और इतने प्रश्न। माँ ने अपने भाई के पास चार्ल्स को भेज दिया। मामा एक चर्च में पादरी थे। बच्चों को काम देना, अनुशसित करना इसका उन्हें बड़ा अनुभव था। वे समझ गये चार्ल्स उस भूत की तरह है जिसे काम में न लगा पाये तो लगातार प्रश्न ही पूछता रहेगा। उन्होंने चर्च के ग्रंथालय में बकाया कामो में चार्ल्स को लगा दिया। कपाटों की सफाई, ग्रंथों का रखरखाव ऐसे अनेक काम थे उनके पास। पर चार्ल्स तो चार-चार मजदूरों का काम अकेले कर जाता। मामा ने जिस काम के लिए महीने भर की छुट्टियों का समय तय किया था, चार्ल्स ने उसे एक सप्ताह में ही पूरा कर दिया।
अब मामा के सामने समस्या थी। भांजा खाली था और खाली दिमाग तो शैतान का घर होता है। इस शैतान के पास तो प्रश्नों की खदान थी। पादरी मामा जहाँ जाते वहीं उनके पीछे पहुँच जाता और तरह तरह के प्रश्न पूछता रहता। मामा ने चार्ल्स को व्यस्त रखने के लिए अनूठा काम दे दिया। ‘जाओ बगीचे में से किसी भी पेड़ के दो पत्ते ले आओ। हाँ! दोनों बिल्कुल एक जैसे होने चाहिए। कोई भी अंतर नहीं।’ चाल्र्स को लगा ये तो बड़ा सरल काम है। दौड़ कर बगीचे में गया और एक जैसे दिखने वाले दो पत्ते ले आया। मामा ने गौर से देखा और अंतर ढूँढ लिया। सिलसिला चल पड़ा। चार्ल्स पत्ते ले आता और मामा कोई न कोई अंतर दिखा ही देते। किसी की डंठल में भेद था तो किसी का आकार, किसी का रंग गहरा होता तो कभी शिराओं की रचना भिन्न निकल आती।
अब चार्ल्स सुबह से शाम तक बाग में अटका रहता। उसने मामा के पास भी जाना बंद कर दिया। अब वो स्वयं ही कोई न कोई अंतर पकड़ लेता। अब तो ये खेल हो गया कि एक समान लगने वाले पत्तों में अंतर ढूँढों। खेल-खेल में चार्ल्स को सृष्टि के अद्भुत नियम का साक्षात्कार हुआ। विश्व में लाखों पत्तें हैं। लाखों पेड़ पर कोई भी दो एक से नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में अद्वितीय है। ईश्वर की ईस अनुपम सर्जनात्मकता का आनंद लेते लेते चार्ल्स सोचने लगा इसके रहस्य के बारे में। इस सृष्टि की अद्वितीय रचना के बारे में। उसके चिंतन में उसे तो विशेष बना ही दिया। यही चार्ल्स बड़ा होकर -‘विकासक्रम के सिद्धांत’ – Theory of Evolution का जनक चार्ल्स डार्विन बना। हाँ! वही डार्विन जिसने बंदरों को हमारा पूर्वज बताया।
हमारी रूचि डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत में नहीं है पर उसके बचपन के अनुभव ने सिखाए सृष्टि के शाश्वत सिद्धांत में अवश्य है। जब पेड़ के दो पत्ते एक जैसे नहीं होते, विश्व की 6 अरब आबादी में से किन्ही भी दो लोगों की उंगलियों के निशान भी एक दुसरे से नहीं मिलते; केवल अभी जीवित है उनके ही नहीं जो मर गये उनके भी। तो इन सब तथ्यों से ये तो स्पष्ट हुआ कि हम में से प्रत्येक अपने आप में अद्वितीय हैं। अतः जीवन का ध्येय व लक्ष्य निर्धारित करते समय किसी और जैसा बनाने का विचार तो बेमानी ही है। जब हम अद्वितीय ही हैं तो हमें अपने स्वयं के ही वैशिष्ठ्य को खोजना होगा ना?

यह अद्वितीय होना नाक नक्श या उंगुलियों के निशान जैसी शारीरिक बनावट तक सिमित नहीं है, तो हमारे जीवन का उद्देश्य अद्वितीय है। इस विशिष्ट उद्देश्य के लिए केवल हमारा ही जन्म हुआ है। पर इतराने की कोई बात नहीं क्योंकि जितने अद्वितीय हम है उतने ही अन्य सभी है। हाँ इसी कारण जीवन की इस अद्भुत लीला में हमारी भूमिका अद्वितीय है। जिस प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग का अपना कार्य है उसी प्रकार हमारा भी कार्य अद्वितीय है।
हमारा जीवन ध्येय व कर्मक्षेत्र इस अद्वितीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, अद्वितीय भूमिका को निभाने अपने अद्वितीय कार्य को करने का माध्यम होगा। अतः आत्मविश्वास से ये जान ले कि कोई हमें कुछ भी कहे पर सृष्टि का सिद्धांत तो ये ही कह रहा है – ‘तुम सा नहीं देखा’।

Dhanyavad Mukulji!
Good story. Such stories always motivate me. Thanks for the story and you told it so nicely.
रोचक प्रस्तुति…
Mukul Bhaiya ….what a brillaint message with logic 🙂 Hats off to you .Am Glad i met you .
Mukul bhaiya what a message wow ! with logical reasoning . hats off to you .Am privileged to have met you .
अति सुन्दर !!!
यदि प्रत्येक व्यक्ति को अपने अद्वितीय होने का ज्ञान हो जाये तो वह अवश्य ही अपने जीवन के सार्थकत्व को प्राप्त करने की ओर प्रवृत होगा |
संभवतः आत्महत्या जैसे कूकृत्य भी समाप्त हो जाएँ|
sarel si bhasha me mahan baat…..
SAMARTHA KARYASHALA MEIN HUM YAHI BATANE KA PRAYAS KARTE HAIN.
A very inspiring write-up. Let’s try to find our uniqueness and set our own target in life
प्रकृति में प्रत्येक रचना अपने आप में अद्वितीय होते हुए भी कभी कभी आकार,गुणों एवं व्यवहार में अन्यों के समान होने का आभास कराती है| उसके ईश्वर प्रदत्त इसी गुण के कारण दो रचनाये भिन्न होते हुए भी प्रकृति में एक जैसी दिखाई देती है और इसी को हम सृष्टि कह सकते हैं | अर्थात अनेकता में एकता की अनुभूति | जीवन को देखने का यही दृष्टिकोण हो तो संपूर्ण विश्व में अमन और भाईचारा होगा | यही है भारतीय दर्शन | आदरणीय मुकुल जी इस प्रसंग के माध्यम से संभवतः यही बताने का प्रयास कर रहे हैं| अति सुंदर ! धन्यवाद !!
Yes its a great and interesting presentation I know you will have done hard work its not simple to collect information thanks to providing these information.