चौथे नवरात्री की आराध्या है कुष्माण्डा! यह दुर्गा माँ का अवतार सृजन करता है। जैविक स्रोतों के प्रति जागृति के लिए माँ के हाथ में कलश के स्थान पर कुम्हड़ा है। यह कौमार्य की भी देवी है। शैलपुत्री की शिशु अवस्था से अब किशोरावस्था में पदार्पण हो चुका है। हम संगठन नवरात्रों पर विमर्श कर रहे हैं अतः इस रूपक को भी उसी संदर्भ में समझते हैं।
संगठन का कार्य: माता दुर्गा का जीवनकार्य महिषासुर का वध था। सारी रचना इसी बात को ध्यान में रखकर थी। यदि इस पुराण कथा के प्रतिक को समझने का प्रयत्न करते हैं तो संस्कारों का शास्त्र हमारे सम्मुख आता है। माता का वाहन सिंह है और शत्रु महिष अर्थात भैंसा। दोनों शक्ति के प्रतिक हैं। एक संयमित पराक्रम का उदाहरण है तो दूसरा विवेकहीन पाशविकता का। मनुष्य में ये दोनों बीज रुप में उपस्थित होते हैं। संगठन अपने अंदर के सिंहत्व का पालन करना है और उसे अपने लक्ष्य की ओर जाने का वाहन, साधन बनाना है। अनियन्त्रित कामनाओं का भैंसा भी मन में समय-समय पर कुलांचे भरता है। उसका मर्दन करना है।
समाज में भी संस्कारों की सिंहशक्ति और असामाजिक महिषशक्ति दोनों पर्याप्त मात्रा में होती हैं। संगठन को सज्जन-शक्ति को एकत्रित कर उसके पराक्रम का आह्वान करना है। मानवता के विरुद्ध कार्य करने वाली दुर्जन-शक्ति का विनाश करना है। यह संगठन का कार्य है।
अवतार के कार्य का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण गीता में यही कह रहे हैं, “परित्राणाय साधुनाम् विनाशायच दुष्कृताम्” – सज्जनों को तारने और दुर्जनों के विनाश के लिये, अर्थात धर्म की संस्थापना हेतु “धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे” – बार बार अवतार लेते हैं। वर्तमान समय में, अर्थात इस युग में संगठन को यही ईश्वरीय कार्य संपन्न करना है।
सज्जन शक्ति का आह्वान, फिर उसे एक ध्येय की ओर अग्रेसर कर एकत्रित लाना। विभिन्न राष्ट्रीय संगठन अपनी-अपनी पद्धति से यही कार्य करते हैं। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि समय-समय पर उस युग की आवश्यकता के अनुसार संगठनों का अवतरण होता है।
किन्तु यदि कार्य के दूसरे पक्ष पर ध्यान नहीं दिया तो फिर अच्छा कार्य करते हुए भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। असुर शक्ति का विनाश भी आवश्यक है। हमें अपने शत्रुओं को पहचान कर उनका विनाश करने की भी आवश्यकता है। अहिंसा की संभ्रमित परिभाषाओं ने इस कार्य में व्यवधान ड़ाला है। विनाश का अर्थ केवल हिंसा से नहीं है। विनाश का अर्थ है उन्हें नष्ट करना अर्थात उन्हें निष्प्रभावी कर देना। उनके प्रभावक्षेत्र को समाप्त करना ही उनका विनाश है।
सज्जन और दुर्जन की पहचान कैसे करेंगे? धर्म के अनुसार कार्य करनेवाला सज्जन। समाज को धारण करनेवाला धर्म। आज के समय में धर्म का सरल सा अर्थ है जो बहुजन हिताय हो। जीवन की बड़ी से बड़ी इकाई के लिये हितकर जो है वह धर्मानुसार है। उसके सिंहत्व को जागृत करना है और उसे संगठित कर पुष्ट करना है। जो संकुचित है, स्वार्थी है वह धर्म के विरुद्ध है। धर्म के विपरीत, धर्म के विरुद्ध कार्य करनेवाले दुर्जन। उनके प्रभाव को समाप्त करना है। अर्थात या तो ऐसे व्यक्ति में धर्म जागरण कर उसे अपने अन्दर के सिंहत्व का परिचय देना है अथवा यदि उसकी संभावना ना हो तो समाज में उसके प्रभाव को समाप्त करना है। महिष का मर्दन करना है। दुर्जन को प्रतिष्ठा ना मिले यह सबसे पहला काम है।


Sadar vende
too bad there isn’t a translator on the site! Would love to be able to read your posts here!
shandar jo log oopar se kuchh or tatha andar se kuchh or hain unka prabhaw kam hona bahut jaroori hai chahe we kisi bhi pad par kyon na ho…………….durjan hai ……
haan jo galat hai wo galat hai chahe wo kitna hi pratisthit kyun na ho…..
par logo ko itna samaan kyun ?????????????
it hurts…when your teachers betray you and make a mockery of the beliefs they stood for…
Dear Manish, I do not understand what you want to say?? It is not related to the post.
@Renee Knight
Below is the English gist of the above post
Goddess of power “Durga ‘s“ mission of life is to kill Deamon. Durga’s vehicle is Lion and enemy is Bison.
Both are symbol of power. The difference is one is positive and other is negative. Same way in every human being both negative and positive power exists. The goal of human is to achieve his aim of life with the help of positive powers and kill the daemon of negative powers.
Same way both of these powers are exist in society in different forms. And the goal of any organization is to make positive powers together and kill negativity from the society which is harmful for human being.
Lord Krishna in holy Geeta says “परित्राणाय साधुनाम् विनाशायच दुष्कृताम्. धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे”
Establishment of dharma ( religion ) is nothing but to destroy negative power and enhance positive powers. Aim of all organization should be this.
Sometime we do first thing.. try everything to increase positivity but forget to destroy negativity. This will not work , we also have to destroy negativity.
A simple logic to decide what is positive and what is negative is – All which is for good and welfare of majority are positive and the things which are against is negative.
Reblogged this on उत्तरापथ and commented:
नवरात्री के लिए विशेष
बुरे लोगों को सजा देना या दिलवाना निश्चित ही अच्छा कार्य करने के ही बराबर है।
आज गांधीजी की 150वी जयंती पर स्वच्छता को लेकर बड़े आयोजन हो रहे है। हम सभी को स्वच्छता तो रखनी ही है साथ ही अधिक आवश्यक है अन्य लोगों को गंदगी करने से रोकना। यही आज कुष्मांडा देवी जी को प्रणाम के साथ मेने इस लेख को पढ़ कर सीखा है।
प्रणाम भाईसाहब ।
धर्म के सिंहत्व को जगाने के लिए।
Beautiful article, it gives insight about how one has to look at the problems. Demons are like problems and symbolises negativity. Hence we need to take up actions like ‘Maa Durga’. We should never stop till all our asurigunas(negativity) destroyed both at personal and organisational level.
धर्म जीवन का मूल है। जो अपने धर्म का पालन नहीं करता वह धर्म विहीन है। सच्चे धर्म का पालन करके ही हम कर्म का पालन करते हैं। जीवन में धर्म अत्यंत आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। डाॅ. चंद्रकांत तिवारी