भय अथवा
भयंकर वेदना से
जब उठती है
मन के गहरे तल से
चित्कार !!
तो उस स्वर में
कोई तारतम्य
कैसे हो सकता है?
बेसुर, कर्कश ही होगी
वह पुकार
जो अपने या
अपनों की वेदना से
फूटी हो|
ऐसे में
२४ घंटे टूटी, बिखरी
खबरें सुनाते माध्यमों पर
तुम करते रहो
अर्थहीन, अंतहीन
तर्क, आकलन,
अवलोकन और विश्लेषण…..
उछालते रहो
आरोप-प्रत्यारोप
यहाँ से वहां
क्योंकि तुम
कट चुके हो
उन सबसे
जो पड़े है
लथपथ
मृत या जीवित
स्वयं के या
किसी अजनबी के
रक्त से रंजित …..
पर
जो है सच्चा
भारती का लाल
उसे हर
शव में
हर भंग अंग में
व्यर्थ बहे
लहू के कतरों में
अपनी माँ की लूटती
आबरू दीखती है|
अट्टहास करता
अपवित्र पडौसी
और दया दिखाता
विश्व दीखता है|
प्रतिशत के आंकड़ों में
देश की प्रगति को
तौलते विद्वानों पर
तरस आता है कि
विश्व में अग्रणी
बनते राष्ट्र में
मंदिरों,
न्यायालयों,
और संसद को भी
है सुरक्षा की प्रतीक्षा
पाठ पढ़ने को
सन्नद्ध नेतृत्व की
प्रतीक्षा….
नेता इतने आतंकित
कि सदा रहते
अंतिम अक्षरों के
सुरक्षा घेरे में
तब
जनता के आद्याक्षरों
से लेकर पूरी वर्णमाला में
लावा गरजता है|
गगनभेदी चित्कार
उठती है!!
वह ना तो होती है
भय या आतंक की
और ना ही
वेदना या संवेदना की
वो तो होता है
केवल
लाचार, हताश
अगतिक
नपुंसक क्रोध का
वीभत्स अविष्कार
परिवर्तन की
अनहद पुकार
या
एक सामूहिक
आक्रोश!!!

परिवर्तन की
अनहद पुकार
या
एक सामूहिक
आक्रोश!!!
बहुत सुन्दर……
Bahut sunder…. ek kavita m sari ma bharti ki sari vedna samete le…. Adhbhut
और chitkar kho jati h….
prashno k bhawar me unki naiyya kese tar jati h?
chetna heen kaano par padi chitkar kho jati h….
prashn walo se sarokar nahi
“kyu de uttar?”
sochte vo
khamoshi kabhi bhaddi muskan odhe…
“tumse hame kya!”
sach kahte vo bhi
prashn vale unke malik nahi
or vo jo malik h….
garib, bhukha or gumnam…
kabhi ka bhul gaya kuch puchna…
vyatha dono ki chubh jati h…
be uttar prashno ki…
or bin puche prashno ki.
aese me
kya ghor chalawa h ye
loktantra bhulava h ye…
par jab vah malik hunkaar bharega
bahri satta ghutno par aa jaegi
tabhi vah chitkar aadesh ban suni jaegi……….