नवरात्रि स्वाध्याय 7

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के साथ ही भारत के व्यापार और पूरे अर्थतंत्र के सामने बड़ी चुनौती है। गत कुछ दशकों में अमेरिका के साथ व्यापार आधिक्य (Trade Surplus) के साथ ही विदेशों से हो रहा पूंजीनिवेश भारत के वृद्धि चालक (Growth Engine) बने हुए हैं। जिस कारण वर्तमान वाणिज्य दर (trade tarriff) के असमंजस और भ्रम की स्थिति का दुष्परिणाम अधिक अनुभव हो रहा है। आत्मनिर्भरता के प्रयत्न प्रारंभ हुए अधिक समय नहीं हुआ है। अतः अभी बल देश में उत्पादन बढ़ाने पर अधिक है। पूँजी और व्यापार में अंतरराष्ट्रीय निर्भरता अभी भी बहुत प्रभाव रखती है। यह परीक्षा की घड़ी है। सरकार, समाज, उद्यमी, वैज्ञानिक, रणनीतिकार और व्यापारी सभी को इस समय साहस, धैर्य और पराक्रम दिखाना होगा। इन तीनों गुणों का सामूहिक नाम वीरता है।

अष्टलक्ष्मी में छठी वीरलक्ष्मी हैं। किसी भी समाज या राष्ट्र का सामूहिक स्वभाव उसके भवितव्य का निर्धारण करता है। केवल उद्यम और व्यापार मात्र से ही सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। सबसे बड़ी बात है कि चुनौतियों के सम्मुख किस प्रकार की मानसिकता व्यक्ति अथवा समूह दिखाता है। हर बार आक्रामकता अथवा साहस से ही काम नहीं चलता कई बार धैर्य भी अधिक परिणामकारी होता है। आक्रमण और प्रतीक्षा दोनों ही स्थितियों में सामर्थ्य और कौशल की क्षमता भी आवश्यक है। अतः साहस, पराक्रम और धैर्य के साथ ही क्षमता भी वीर का प्रमुख गुण है। सामरिक क्षेत्र के साथ ही राष्ट्रजीवन के सभी क्षेत्रों में वीरता का महत्व है। अतः बाल्यकाल से ही हर राष्ट्रांग में वीरत्व का संस्कार किया जाना अपेक्षित है। तभी पूरे राष्ट्र में वीरव्रत धारण होगा।

व्रत का बड़ा महत्व है। संकल्प के साथ साधना करते हुए ध्येयमार्ग पर चलने का नाम व्रत है। वीरता लक्ष्यहीन नहीं हो सकती। उत्साह में असंभव लगनेवाला पराक्रम तो हो सकता है किंतु लक्ष्यप्राप्ति होगी ही ऐसा निश्चित नहीं होता है। ऐसे पराक्रम को साहस नहीं दुस्साहस कहते हैं। वीर जितना उत्साही होता है उतना ही संयमी भी होता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के इतिहास में हमें दोनों प्रकार के उदाहरण मिलते हैं। प्रताप राव गुज़र राज्याभिषेक के समय सरसेनापति बनने के लिए मनोनीत हैं। किंतु बहलोल ख़ान को दया कर छोड़ देते हैं। शिवाजी महाराज उन्हें पत्र लिखकर बताते हैं कि यह क्षमादान आत्मघाती है। बहलोल और अधिक तैयारी कर स्वराज्य पर आक्रमण करेगा। जब यह सत्य होता है तब प्रतापराव सूचना मिलते ही क्रोध में केवल 7 पराक्रमी साथियों को लेकर शत्रु की एक लाख से ऊपर की सेना पर टूट पड़ते हैं। विस्मयकारी पराक्रम करते हैं। शत्रुसेना के मध्य में हाथी पर बैठे बहलोल तक पहुँचते हैं। बलिदान होते हैं किंतु अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुँचते।

दूसरा प्रसंग अफज़ल खान वाला है। छत्रपति शिवाजी महाराज को क्रोध दिलाकर खुले मैदान में युद्ध के लिए उकसाने के सारे प्रयास अफज़ल करता है। उनकी कुलदेवता माता भवानी के तुलजापुर मंदिर को तोड़ता है। परिसर में गोकशी करता है। पूरे महाराष्ट्र के दैवत पंढरपुर के विठ्ठल मंदिर को भी भंग करता है। शिवाजी महाराज संयम नहीं छोड़ते, रणनीति पर अड़े रहते हैं। प्रतापगढ़ की सुरक्षित रणभूमि का चयन करते हैं। खान को वहाँ बुलाते हैं और समय आने पर माता भवानी को शत्रु की बली चढ़ाते हैं। पूरी सेना का सफाया करते हैं और आगामी छह माह में सारे दुर्ग पुनः जीतते हैं और सभी खंडित मंदिरों का जीर्णोद्धार करते हैं। ध्येयप्राप्ति के लिए धैर्य के साथ अपमान का घूँट पीकर, क्रोध को रोककर किया साहसी पराक्रम ही वीर का लक्षण है। इसलिए जो स्वयं को जीते वही महावीर है।

आर्थिक क्षेत्र में भी यही सब आवश्यक होता है। धैर्य, संयम, साहस, पराक्रम/उद्यम, सृजन, नाविन्य के साथ नियोजित ख़तरे (Calculated Risk) लेने पड़ते हैं। इस सबके लिए अपनी आंतरिक शक्ति पर विश्वास होना अनिवार्य है। आत्मविश्वास से किए अनोखे प्रयास ही आत्मनिर्भर बनाते हैं। भारत ने अनेकों बार ऐसी विपरीत परिस्थितियों का सामना किया है। करोना जैसी स्वास्थ्य आपत्ति हो या युगाब्द 5100 अर्थात् 1998 CE में पोखरण के आण्विक परीक्षण के बाद लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हो, भारत ने सदा ही आपदा को अवसर में परिवर्तित किया है और स्वावलंबन की ओर कदम बढ़ाया है। माता वीरलक्ष्मी की कृपा से वर्तमान चुनौती में भी हम विजयी होंगे। प्रचंड उद्यम करना होगा, पूरे राष्ट्र को सामूहिक धैर्य और संयम का भी परिचय देना होगा। साथ ही नव सृजन भी करना होगा।

सप्तमी नवरात्रि की देवी है कालरात्रि। उनका रौद्र स्वरूप आसुरी बलों में भय और भक्तों में सुरक्षा का भाव उत्पन्न करता है। शत्रु के सामर्थ्य और विशेषता के अनुरूप अनोखे उपाय माता करती है। रक्तबीज के रक्त कण से सेना बनने को रोकने के लिए खप्पर में रक्त लेकर उसका प्राशन भी करती है। धर्म रक्षा के लिए और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए हर प्रकार के नवसृजन को करना होता है। माता वीरलक्ष्मी और कालरात्रि की कृपा भारत पर बनी रहे और धैर्य से पराक्रम करते हुए विश्वकल्याण के लक्ष्य की ओर अग्रेसर होते रहें।
