विश्वकल्याणकारी हिंदुत्व

Mukul Kanitkar 7 मिनट का पठन

विचार नवरात्रि – 3

नवरात्रि की तृतीय देवता माता चन्द्रघंटा है। चन्द्र शीतलता और शांति का प्रतीक है, घंटा जागरण और सतर्कता का संकेत। माँ के इस रूप में दस शस्त्र धारी हाथ और तृतीय नेत्र विशेष हैं। शांति की प्राप्ति के लिये जहाँ एक ओर विशेष सजगता की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर विनाशकारी शस्त्रों का नियंत्रण भी। एकत्व को ना मानकर सारे विश्व को माननेवाले और ना माननेवाले ऐसे दो भागों में बाँटकर सतत संघर्ष के बाद विनाश की ओर ले जानेवाले विघटनकारी बलों का संहार उनके कपटी और छद्म रूपों के अनुरूप ही विविध विशेषता वाले शस्त्र और अस्त्रों से करना होता है। निकट युद्ध में सटीक वार करने हेतु हस्तचालित शस्त्र और दूरस्थ शत्रु के निःपात हेतु फेंककर मारनेवाले अस्त्र भी आवश्यक होते हैं। वैचारिक संघर्ष में भी दोनों प्रकार के उपकरण प्रयोग करने पड़ते हैं। प्रत्यक्ष वाद-विवाद, जल्प-वितंडा जैसे शस्त्रों के साथ ही सामाजिक और अन्य माध्यमों में सामग्री, शैक्षिक जगत के शोधपत्र और पाठ्यक्रम आदि दूरस्थ अस्त्र भी काम में लेने पड़ते हैं। मोहक रूपों में आकर्षित कर मदनबाण चलाने वाले शत्रुओं को वास्तविक स्वरूप में जानकर भस्म करने के लिए तृतीय नेत्र भी सतत खुला रखना पड़ता है। यही चंद्रघंटा माता का प्रसाद है।

सारा विश्व अनेक संकटों से घिरा है। सांप्रदायिक हिंसा और आतंक युद्ध का रूप ले चुका है। स्वयं को विकसित और खुले विचारों का माननेवाले देश भी आज इस भयानक वास्तव को प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं। विभिन्न मतों के साथ सहअस्तित्व के लिए आवश्यक दार्शनिक आधार तथा व्यावहारिक ऐतिहासिक अनुभव केवल हिंदुत्व के पास ही है। हिंदू ही विश्व का मार्गदर्शन कर सकता है कि कैसे आतंक का सामना किया जाए। कठोर सैनिक उपायों के साथ ही समावेशक परंपराओं का समन्वित प्रयोग ही इस विश्वव्यापी समस्या का समाधान है। ‘एकम् सत् विप्राः बहुधा वदन्ति’ इस सिद्धांत को हिंदुओं ने सहस्राब्दियों से जिया है। शक, हूण, कुषाणों सहित अनेक आक्रांताओं को इसी स्नेहमय सर्वसमावेशकता ने अपने में सम्मिलित कर लिया। अन्य मज़हबों के प्रताड़ित पारसी, यहूदी और पोलिश शरणार्थियों को हिंदुओं ने ही ना केवल आश्रय दिया अपितु उनकी विशेषताओं के साथ स्वीकार किया। कभी भी उन्हें अपनी उपासना छोड़ने को विवश नहीं किया। आज भी ऐसे अनेक लोग हिंदू समाज का अंग बनकर आनंद से जी रहे हैं। इस प्रकार सामाजिक सौहार्द्र का आदर्श प्रतिमान हिंदू बहुल भारत विश्व के सम्मुख प्रस्तुत कर सकता है।

अस्तित्व को ही झकझोरने वाली दूसरी वैश्विक समस्या है पर्यावरण का प्रदूषण। विकास और विनाश के मध्य संतुलन की चुनौती पूरे विश्व को ही ललकार रही है। ऊपरी परिणामों से शाश्वत समाधान नहीं मिल रहे हैं। वास्तव में समस्या दृष्टि की है। सेमायटिक पंथों में प्रकृति की सृष्टि ही पुरुष के भोग के लिए हुई है। इसलिए उसका अमर्यादित उपभोग शास्त्र सम्मत है। दूसरी ओर भौतिकवाद पर आधारित मुक्त बाजार और साम्यवादी विचारधारा प्रकृति पर विजय पाने को विकास मानते हैं। उपभोग और विजय दोनों ही संघर्ष के मार्ग हैं। इसके चलते मानव ने विकास के नाम पर प्रकृति का अनियंत्रित शोषण किया है। हिंदुत्व में पृथ्वी को तो माता माना ही जाता है, साथ ही पर्यावरण के सभी तत्व पंचमहाभूतों का भी आदर के साथ पूजन किया जाता है। इस मातृत्व बोध की दृष्टि के चलते अपनी समृद्धि के चरम पर भी हिंदुओं ने प्रकृतिप्रेमी (Eco-friendly) परंपरा और तकनीक का विकास किया। प्रकृति का संयमित दोहन जैसे पशु हो या मानव माँ का दूध पीते समय उसे हानि नहीं पहुँचाता। प्रकृति का स्थायी क्षरण किए बिना अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की व्यवस्था भारत में सदियों से बनायी और निभायी है। संयम और पर्यावरण रक्षा का यह कदापि अर्थ नहीं हैं कि प्रगत तकनीक से प्रदत्त सुविधाओं का प्रयोग ना किया जाए। हिंदुओं की युगानुकूल चिंतन प्रक्रिया अभी की परिस्थिति में भी धर्माधिष्ठित विकास (Sustainable Development) का मार्ग दिखा सकती है। धर्म शब्द का अर्थ ही है धारण करनेवाला (Sustain करने में able)। अतः धर्म पर आधारित व्यवस्था मानव, समाज और सृष्टि तीनों का समन्वय साधती है। विश्व को भी आज इसकी आवश्यकता अनुभव हो रही है। युगाब्द 5102, विक्रमी 2057 अर्थात् 2000CE में प्रारंभ हुए पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) का बोधवाक्य वेद के पृथ्वी सूक्त का मंत्र – माता भूमि पुत्रः अहं पृथिव्याम् – को अंग्रेज़ी में Earth is our Mother, We are her Children बनाया गया। भूमण्डलीय ताप (Global Warming), कार्ब पदचिह्न (Carbon footprint), सभी प्रकार के प्रदूषण का मार्ग हिंदू जीवन पद्धति ही दे सकती है।

वित्त, मुद्रा और उपभोग पर आधारित अर्थतंत्र से नियत काल में आती वैश्विक मंदी के कारण भी बेरोज़गारी, भुखमरी, बेघर होना आदि अनेक प्रश्न खड़े किए हैं। सबसे ‘विकसित’ देश भी इस विषय से चिंतित हैं। प्रश्न विकास की संकल्पना, प्रतिमान और मूल्यांकन की विधि का है। डार्विन द्वारा प्रतिपादित विकासक्रम परिकल्पना के सिद्धांत ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ (Struggle For Existence) और ‘सुयोग्य की सुरक्षा’ (Survival of the Fittest) मूलतः जीवविज्ञान के तत्व थे। हर्बर्ट स्पेंसर द्वारा इनका सामाजिक शास्त्रों में प्रयोग किया गया। फलस्वरूप राजनीति के समान ही अर्थशास्त्र अतिस्पर्धात्मक हो गया। परिणाम वर्तमान अस्थिर अर्थव्यवस्था में हुआ, जो ना तो सबको सुखी कर पायी है, ना ही समृद्ध। इतिहास के ज्ञात समय में सर्वदा संस्कृति के साथ संपदा निर्माण तथा विश्व को आर्थिक अवदान देने का कार्य भारत ने किया है। हिंदू विकास प्रतिमान ही इसका आधार रहा है। आज भी भुभुक्षित, भ्रमित मानवता को ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के सिद्धांत पर विकसित हिंदू अर्थशास्त्र ही स्थायी समाधान दे सकता है।

इस सब के मूल में और कहीं-कहीं परिणाम के रूप में समाज भी विघटित हो रहा है। परिवार संस्था पर भी सतत आक्रमण हो रहा है। मनुष्य का मन भी विभाजित हो गया है और तनाव (Stress), विषाद (Depression), बाल्य हिंसा, व्यसनाधीन युवा ऐसे अनेक विकार आज सामान्य होते दिख रहे हैं। जितना ‘विकसित’ और संपन्न समाज या व्यक्ति, उतने अधिक सांस्कृतिक विकार ऐसा निष्कर्ष समाजशास्त्रियों के अध्ययन में आता है। प्रतिदिन दो से अधिक सामूहिक हत्या (Mass Killing) की घटना बालकों द्वारा हो रही है। नशे के नवनवीन प्रकार युवाओं में फैल रहे हैं। उसकी व्यवस्था के लिए नित्य बढ़ रहे अपराध भी पूरे समाज को असुरक्षित कर रहे हैं। विवाह से अधिक विच्छेद उसके कारण सतत बढ़ते एकल अभिभावक परिवार (Single Parent family) सभी संपन्न देशों की बड़ी समस्या है। मन इतना अशांत कि नींद के लिए प्रतिदिन दर्जनों गोलियाँ खानी पड़ती है। कुल मिलाकर सांस्कृतिक विपन्नता पूरे विश्व की विकट समस्या बन गई है। इसका उपाय भी हिंदू जीवन पद्धति में ही मिलता है। योग का स्वीकार तो विश्व कर ही रहा है, धीरे-धीरे अन्य परंपराओं को भी मान्यता प्राप्त हो रही है। पाक्षिक उपवास (Autophagy) के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक लाभ पर शास्त्रीय अनुसंधान के करण जपानी जीवशास्त्री योशोनोरी ओहसुमी को नोबल पुरस्कार मिला है। एकादशी, चतुर्थी, पूर्णिमा-अमावस्या पर व्रत रखना प्रत्येक हिंदू पंथ संप्रदाय का भाग है। आज इसे वैज्ञानिक मान्यता अब मिल रही है।

ऊपर उल्लेखित सभी उपाय मात्र सैद्धांतिक नहीं हैं, कई बार व्यवहार में उतारे गए हैं। काल परीक्षित (Time Tested) होने के साथ ही सत्य पर आधारित होने के कारण विज्ञान सम्मत हैं। आधुनिक प्रगत शास्त्र हिंदुत्व को प्रमाणित ही करते हैं। सबसे बड़ी आवश्यकता है कि इस विचार को आत्मविश्वास से विश्व के सम्मुख पूर्ण साक्ष्यों के साथ रखा जाए। वर्तमान युग में सत्य को भी सही प्रस्तुति से घोषित करना पड़ता है। चंद्रघंटा माता के कंठ में आभूषित घंटा हमें उद्घोष के लिए प्रेरित करती है। आज आक्रामकता तो नहीं किंतु दृढ़ता के साथ यह प्रतिपादित करना है कि – विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान और प्रश्नों का उत्तर हिंदुत्व है।

Mukul Kanitkar

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Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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6 Comments

  1. सब से सुन्दर बात, लेख के माध्यम से चन्द्रघण्टा मां का स्मरण और उनके स्वरूप के परिचय से राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी का बोध हो जाता है।
    उद्घोष।
    शक्ति की तृतीय स्वरूप, तृतीय विशेषता ,सनातन संस्कृति के सन्दर्भ में, समझ देने वाला ‌लेख।

  2. विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान और प्रश्नों का उत्तर हिंदुत्व है।
    हिंदुत्वनिष्ठ होना लोक व्यवहार का प्राथमिक आचरण है।
    हिंदुत्व ही सभी धर्मों में सर्वोपरी और श्रेष्ठ प्रकृतिमार्गी दिशा दृष्टि देने वाला और आत्मबोध जगाने वाला धर्म कारक है। यह भारतीय आचरण का बीज मंत्र है।
    चंद्रकांत तिवारी
    उत्तराखंड प्रांत

  3. मां के श्री चरणों में कोटि कोटि प्रणाम
    मां चंद्रघंटा के आशीर्वाद और प्रसाद से मानवता की ध्वज पताका पूरी दुनिया में फहराए।
    सम्पूर्ण जगत का कल्याण हिंदुत्व की नित नूतन और चिर पुरातन दिशाबोध में निहित है। यह लेख पढ़कर ज्ञान और चिंतन के विस्तार का मार्ग खुलता है।
    आदरणीय दादा सादर प्रणाम

  4. Very interesting article.
    Article is very well correlated with different dimensions of life and Hindu Dharma is the solutions to so many problems of whole universe.

    Supremacy and relevence of our culture in this world is very well described.
    🙏🙏💐🎊🎉

  5. अध्यात्मिम, बौद्धिक एवं शक्ति जागरण का महाप्रसाद देने वाली माता को प्रणाम। पंच महाभूतों के संतुलन के अनुरूप जीवन के तारतम्य का सूत्र देती माँ भगवती की आराधना के इस पर्व पर आपका मार्गदर्शन भी मां का प्रसाद है। आदरणीय दादा सादर प्रणाम।

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