विकेंद्रीकरण से पुष्पित स्वावलंबन का प्रारूप

Mukul Kanitkar 11 मिनट का पठन

सनातन विकास प्रतिमान 6

‘सब समान हैं बस कुछ अधिक समान हैं।’ — All are equal some are more equal — साम्यवादी व्यवस्था की तथाकथित समता का सटीक वर्णन इस उक्ति में किया गया है। सब को समान लाभांश प्राप्त हो इस सिद्धांत से संपन्न और विपन्न के मध्य वर्गसंघर्ष प्रेरित कर क्रांति के बाद सर्वहारा का राज्य स्थापित करने के सिद्धांत पर आधारित साम्यवाद की सत्ता जिस-जिस देश में आई वहाँ-वहाँ आर्थिक विषमता की पराकाष्ठा देखी गई। सारी संपदा का सरकारीकरण करने के बाद भी कुछ गिने-चुने नेताओं के पास अधिकतम संपदा का एकत्रिकरण हो गया और बहुसंख्य सामान्य जन और विपन्न हो गये। दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की भी कमी हो गई। हर बात के लिए पंक्तिबद्ध होने की विवशता ने ही अनेक साम्यवादी सरकारों को हटाने का काम किया। सोवियत रुस, कंबोडिया, पूर्वी जर्मनी आदि देशों से साम्यवादी शासन का पतन केन्द्रीकृत सरकारी व्यवस्था के फलस्वरूप फैली असहनीय विषमता के कारण ही हुआ।

Soviet Block

मुक्त बाज़ार की एकाधिकार वृत्ति से उत्पन्न विषमता से भी साम्यवादी व्यवस्था में पनपी अनुत्पादक विपन्नता, अभाव और विषमता अधिक भयावह है। माध्यम, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र के अभाव से इन देशों की परिस्थिति के सही सांख्यिकीय आँकड़े मिलना तो असंभव होता है किंतु अध्ययनशील शोधकर्ताओं के अनुमान भयावह हैं। साम्यवाद से उपजे राजनितिक, सामाजिक और आर्थिक केंद्रीकरण ने विश्व में सर्वाधिक नरसंहार किया है। साम्यवादी कृष्ण ग्रंथ (Communist Black Book), साम्यवादी अपराध की संजाल सूची communistcrimes.com जैसे सूत्रों के अनुमान से पूरे विश्व में साम्यवादी विषमता के अत्याचार से मरनेवालों की संख्या 10 से 14 करोड़ के मध्य बताई गई है। यह केवल आर्थिक विषमता के आँकड़े नहीं हैं इसमें सांस्कृतिक, राजनीतिक हत्याओं की संख्या भी सम्मिलित हैं। किंतु आर्थिक विषमता से हुई मृत्यु की संख्या आधे से अधिक होगी ही।

Black book of communism

मुक्त बाज़ार की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में एकाधिकार स्थापना और केंद्रीकरण से आर्थिक विषमता तो संभव है ही किंतु नाम और उद्देश्य दोनों में समानता का दावा करनेवाले साम्यवादी व्यवस्था में भी आर्थिक विषमता की यह भयावह स्थिति भौतिकवादी विचारधारा पर आधारित सभी अर्थतंत्रों का खोखलापन अधोरेखित करती है। शासन रहित समाज (Stateless Society) का आदर्श सामने रखकर की गई क्रांति के फलस्वरूप जहाँ-जहाँ साम्यवादी व्यवस्था बनी वहाँ-वहाँ शासन ही सर्वोपरि हो गया। समस्त संपत्ति शासन की, सब उत्पादन शासन के अधीन और समाज जीवन के कला जैसे विषय भी पूर्णतः राज्य के नियंत्रण में, ऐसी व्यवस्था का निर्माण सोवियत रशिया, चीन, कंबोडिया आदि सभी साम्यवादी देशों में हुआ।

USSR Disintegrated

व्यक्तिगत लाभ और प्रोत्साहन के अभाव में उद्यम और व्यापार में प्रेरणा और स्वरुचि के स्थान पर सरकारी दबाव और दंड के भय का प्रयोग किया गया। बाहर से देखने पर विकास का यह प्रतिमान बड़ा आकर्षक और प्रभावी दिखाई पड़ता था। जनसंचार के माध्यम भी शासकीय नियंत्रण में होने के कारण सत्य स्थिति प्रगट होने के साधन ही नहीं थे। वर्तमान में चीन में समाज, व्यापार, उद्यम की स्थिति को समझने का कोई तटस्थ अथवा स्वतंत्र साधन नहीं है। सरकारी वृत्त तथा सांख्यिकी ही एकमात्र जानकारी का स्रोत है। वैसी ही स्थिति खुलेपन (Glasnost) से पूर्व सोवियत संघ की थी। युगाब्द 5091 (1989 CE) में सुधार (Perestroika) के साथ हुए विभाजन के बाद ही साम्यवादी व्यवस्था की कुछ बातें सबके सामने स्पष्ट हुई। चीनी अर्थतंत्र के तथ्यों को समझने के लिए वहाँ भी व्यवस्था परिवर्तन की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। जो लोग लोकतंत्र और संचार माध्यम के अभाव को चीन के व्यापारिक सफलता का कारण समझते हैं उनके भ्रम चीन के विखंडन के साथ ही टूटेंगे।

China Fault-lines

वर्तमान में विश्व में अग्रणी दोनों अर्थव्यवस्थाएँ सारे समाज को सुखी करने में परिणामकारी नहीं दिखाई देती। मुक्त व्यापार व्यवस्था का उद्देश्य ही सबका सुख नहीं रहा। केवल सुयोग्य की सुरक्षा (Survival of the Fittest) ही तात्त्विक आधार होने से प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था का निर्माण स्वाभाविक परिणति रही है। विषमता भी इस स्पर्धा का अपरिहार्य परिणाम ही है। कल्याणकारी राष्ट्र (Welfare State) की संकल्पना ने आर्थिक विषमता की खाई के दुष्परिणाम को सहलाने का भार शासन पर डाला। सबको उद्यम, रोज़गार और उत्पादन के साधन उपलब्ध कराने में विफल शासन पर सामाजिक सुरक्षा के रूप में समाज के बड़े वर्ग के योगक्षेम का भार डाला गया। बेरोज़गार भत्ता, ज्येष्ठ नागरिक भत्ता, अन्न पर्चे (Food Ticket) आदि पर व्यय सभी ‘विकसित’ देशों के व्यय का सबसे बड़ा मद बन गया। आज इन देशों के ऋण के बोझ में दबने का सबसे बड़ा कारक यह सामाजिक सुरक्षा व्यय ही है। अन्य हर क्षेत्र में निजीकरण का प्रतिपादन करनेवाले अर्थशास्त्री इस सबसे महत्वपूर्ण व्यय का निजीकरण नहीं कर पा रहे हैं। परिवार और समाज के विखंडन और लगभग पूर्ण निर्मूलन के कारण हर विपन्न की आजीविका का सारा भार सरकार पर ही है। एकाधिकार व्यापार नीति से संपदा का एकत्रिकरण और दूसरी ओर कल्याण के दायित्व का सरकारीकरण इन दोनों के परिणामस्वरूप शक्ति और वित्त का केंद्रीकरण इस प्रतिमान के सर्वसुखकारक होने में बाधा है।

Social Security burden

लाभांश के निजीकरण का विरोध करानेवाले साम्यवादी प्रतिमान ने उत्पादन, विपणन से लेकर प्रजापालन जैसे व्यक्तिगत कार्य का भी सरकारीकरण कर केंद्रीकरण कर दिया। विश्व व्यापार में प्रतिस्पर्धा करनेवाले चीन की आंतरिक स्थिति इस सरकारीकरण के कारण ही भयावह है। हर प्रकार की विषमता, विपन्नता और विभेद आज चीन में सामान्य जन जीवन का अंग बन गई है। इसी से उत्पन्न असंतोष उसके पतन और विभाजन का कारण बनेगा। भारत सहित अनेक देशों ने दोनों के सम्मिश्र स्वरूप को अपनाने का विफल प्रयास किया। राजनीतिक व्यवस्था में लोकतंत्र और मुक्त संचार माध्यमों के साथ समाजवाद के नाम पर सरकार नियंत्रित बाज़ार जैसी अधूरी अर्थव्यवस्था पर प्रयोग किए। व्यक्तिगत संपदा को स्वीकार किया किंतु पंचवर्षीय नियोजन सरकारी उद्यम, व्यापार, उद्योग तथा पूँजी निवेश के कठोर नियंत्रण अधिनियम द्वारा मुक्त विपणन का गला घोट दिया। आंतरिक नियमन से उद्यम की प्रेरणा समाप्त हो गई और समाज पूर्णतः शासन मुखापेक्षी हो गया। मिश्रित अर्थतंत्र ने दोनों ध्रुवों के दुष्परिणाम ही दिये। दोनों ही प्रतिमानों के सकारात्मक पक्ष अधूरेपन के कारण अप्रभावी ही रहे।

आश्चर्य और कष्ट का विषय यह है कि अनेक सहस्राब्दियों तक भारत में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के सिद्धांत पर आधारित सर्वसमावेशक समृद्धि का विकास प्रतिमान अद्भुत परिणामों के साथ विश्वविस्मयी समृद्धि देता आचरण में रहा। अर्थतंत्र का विकेंद्रीकरण ही इस भू-व्यापक सुख वितरण का आधार रहा है। उत्पादन, विपणन और उपभोग तीनों का विकेंद्रीकरण भारतीय अर्थव्यवस्था में सुनिश्चित किया गया था। ब्रिटिश सत्ता द्वारा विधि आधारित, शासन केंद्रित व्यवस्था के निर्माण से पूर्व तक भारत में ग्राम, नगर, वन और गिरी-पर्वत आदि भिन्न-भिन्न निवास स्थानों पर रहनेवाले समुदायों की सुगठित बहुकेन्द्रीय जीवन व्यवस्था प्रचलित थी। अंग्रेज़ी प्रभाव से उत्पन्न विषमता के कारण शहर और ग्रामों के मध्य जो संस्कार एवं व्यवहार की खाई निर्माण हुई थी उसके फलस्वरूप महात्मा गांधी सहित अनेक तत्कालीन महापुरुषों को ग्रामों में भारतीयता के बचे रहने का अनुभव हुआ। इसलिए उन्होंने ग्रामकेंद्रित स्वावलंबी अर्थव्यवस्था का आदर्श ‘ग्राम-स्वराज’ के रूप में सामने रखा। स्वतंत्रता के बाद भी विकेंद्रित प्रशासन, उत्पादन आदि के आदर्श पंचायत राज का प्रतिपादन ग्रामों को केंद्र में रखकर ही किया गया है। गांधी जी का प्रसिद्ध उद्धरण है – भारत गाँवों में बसता है। अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रभाव का अधिक असर शहरों में होने के कारण गांधीजी को गाँवों में ही भारतीयता के रक्षित होने का अनुभव हुआ और इसलिए उन्होंने इस प्रकार का विधान किया होगा। किंतु भारत केवल ग्रामों में ही नहीं बसता।

वर्तमान ग्राम स्वराज

प्राचीन काल से भारत में नगर, ग्राम और अरण्य इन तीनों स्तरों पर समाज की स्वावलंबी व्यवस्था विद्यमान थी। नगर, महानगर, पुरियों में भी ग्रामों के समान ही विकेंद्रित स्वावलंबी अर्थतंत्र कार्यरत था। भारतीय इतिहास ग्रंथों तथा विदेशी प्रवासियों के वृत्तांतों में भारत में बड़े बड़े महानगरों में विकसित सर्व समृद्ध अर्थव्यवस्था का वर्णन मिलता है। जितने ग्राम आत्मनिर्भर थे उतने ही नगर और अरण्य भी आर्थिक रूप से स्वयंसिद्ध थे। जीवन के लिए आवश्यक सभी वस्तुओं का उत्पादन निकट पड़ोस में ही होता था। केवल ऐश्वर्य, विज्ञान, युद्ध, वैद्यक, कला आदि की विशेष आवश्यकताओं को देश के अन्य प्रदेशों अथवा विभिन्न दूरस्थ देशों से साधन मँगवाया जाता था। इस हेतु बड़ी-बड़ी पेठों, विपणियों, हाटों की व्यवस्था सबसे पुराने उत्खननों, आर्ष ग्रंथों से प्रारंभ कर विदेशियों के प्रवास वर्णन तथा ब्रिटिश अभिलेखों तक भी पायी जाती है।

अनेक गाँवों में आज भी बारा बलूतेदारों (सालदार) जैसी पूर्णसिद्ध व्यवस्था के अवशेष देखे जा सकते हैं। दर्जी, सुतार, लुहार, कुम्हार जैसे 12 विविध कार्यों में वंशानुगत पारंगत शिल्पी, व्यवसायी ग्राम के सभी जनों की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति किया करते थे। इनके जीवन का उद्देश्य लाभ ना होकर अपने अनुवांशिक कौशल तथा सतत विकसित हुनर द्वारा गाँव की सेवा करना था। इस प्रकार पूरा गाँव अपना धर्म (कर्तव्य) समझ कर एक दूसरे के जीवन को समृद्ध करता था। सर्व जन सुखाय का यह माध्यम था। बहुत अधिक विपणन और मुद्रा विनिमय की आवश्यकता इस जीवनावश्यक सामूहिक आत्मनिर्भरता में नहीं होती थी। उस हेतु सभी शिल्पी, सेवा व्यवसायी विशेष कलात्मक वस्तुओं, यंत्रों तथा अन्य पण्यों (Comodities) का निर्माण करते थे। जो निकटस्थ हाट से प्रारंभ कर क्षेत्र प्रांत की विशेष मंडियो, आड़तों, विपणिकाओं में विक्रय तथा सार्थवाहों और जलमार्ग से वणिकों द्वारा दूर देशों में निर्यात होते थे। इनके द्वारा सबको विशेष उत्पन्न होता था जो सुविधा, शृंगार, कला, उत्सव, स्थापत्य, शिल्प आदि में वैभव के साथ प्रयुक्त होता था। इस प्रकार सहज निःशुल्क मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के सामूहिक तंत्र के साथ ही व्यक्तिगत विशेषज्ञता से समृद्धि के अवसर भी प्रत्येक को उपलब्ध थे। यही हमारे राष्ट्रीय आर्थिक विकास का मूल था।

आड़त

नगर भी जीवनावश्यक वस्तुओं और सेवाओं में आत्मनिर्भर ही हुआ करते थे। समुदाय, बस्ती, कुल आदि इकाइयाँ पूर्ण स्वावलंबी हुआ करती थी। स्व-प्रशासन और विकेंद्रित आर्थिक स्वावलंबन ही समृद्धिशाली भारतीय विकास प्रतिमान का एक प्रमुख लक्षण रहा है। समय-समय पर इसके विविध युगानुकूल और देशानुकूल प्रादर्श देखे जा सकते हैं। विकेंद्रीकृत स्वावलंबन को साकार करने का कोई एक प्रकार ही सब पर थोपा नहीं गया था। भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थिति, ऐतिहासिक अनुभव, बाहरी प्रभाव और आंतर्क्रिया के आधार पर तंत्र, व्यवहार की विविध परंपरा का स्वीकार भी इस विकेंद्रीकरण के मूल में रहा है।

राखीगढ़ी के प्राचीन नगर अवशेष

आज के पश्चिमी प्रतिमान जैसे नागरी जीवन को ग्राम्य जीवन से श्रेष्ठ मानने का भ्रम ना होने के कारण अपने-अपने स्वभाव और वृत्ति के अनुसार लगभग समान अनुपात में जनसंख्या सुखपूर्वक समृद्ध जीवनयापन दोनों ही स्थानों पर करती रही है। बाहरी आक्रमणों में संघर्ष और आपात स्थिति में आवश्यक स्थानांतरण अवश्य हुआ होगा किंतु वह आकांक्षी अथवा आर्थिकता से विवश देशांतर नहीं था। उसी प्रकार एक तिहाई जनता सदा ही अरण्य में वास करती रही है। वनवासी भी संस्कार से उन्नत और आर्थिक रूप से स्वावलंबी और समृद्ध ही होते थे। आत्मनिर्भरता की इकाई वनग्राम, संकुल और बस्ती होते थे। आजीविका के लिए किसी क्रय-विक्रय की आवश्यकता नहीं होती थी। अन्य सुविधाएँ, मनोरंजन और उत्सव आदि के लिए साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक अथवा ऋतु के अनुसार हाट, जत्रा आदि संरचनाओं का चलन आज भी अरण्य जीवन के अर्थतंत्र का आधार है।

जनजाति जत्रा

नगर, ग्राम, अरण्य में लगभग समान रूप से एक तिहाई वास करती जनता की जीवनशैली में कितना भी अंतर क्यों ना हो उनकी दृष्टि, सिद्धांत और परंपराएँ स्वावलंबी, आत्मनिर्भर, उत्पादक, सहकारमूलक, परस्परावलंबी विकेंद्रित व्यवस्था पर ही आधृत रहीं हैं। केवल आर्थिक ही नहीं सामाजिक, राजनीतिक अथवा प्रशासनिक, न्यायिक तथा धार्मिक व्यवस्था में भी विकेंद्रित विविधता और स्वावलंबन स्पष्ट दृष्टिगोचर था। इस कारण समस्या, विभेद, संघर्ष के निदान का उपाय भी पंचायत में तत्काल और न्यायसुसंगत सहमति से होता था। ब्रिटिश पराधीनता में ‘विधि के शासन’ के नाम पर विविधता को समाप्त कर शासन निर्भर केन्द्रीकृत व्यवस्था को भारत के स्वतंत्र जनपदीय समाज पर थोपा गया और विपन्नता, अकाल और दुर्भिक्ष का आगमन इस देश में हुआ।

वर्तमान समय के अनुरूप विकेंद्रीकरण को अपनाते हुए सनातन विकास प्रतिमान के अर्थतंत्र का युगानुकूल, देशज, वैविध्य से शृंगारित प्रारूप क्रमशः प्रस्फुटित करना होगा। इसका संकल्पन, नियोजन और क्रियान्वयन भी किसी एक प्रकार के प्रयोग को सर्वत्र दोहराने से अथवा ऊपर से विधि या प्रशासन द्वारा थोपने से नहीं होगा। इसे पूर्ण स्वायत्तता के साथ जड़ से ऊपर की ओर पुष्पित करना होगा। समष्टि की इकाई ग्राम, बस्ती से इसका प्रारंभ होगा और सर्वत्र अद्वितीयता से अभिव्यक्त होगा।

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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3 Comments

  1. बहोत ही सटिक जानकारी, ग्रामीण व्यवस्था का मुल आधार विकास के नाम पर हमने बरबाद कर दिया, विशालकाय उद्योग की प्रधानता ने छोटे तथा लोकल स्तर के घरेलू और परंपरागत व्यवसाय का दम घुट गया. अब तो हमे किस दिशा में जाना त्या करना पडेगा

  2. आर्थिक व्यवस्था में ऋषि की दूरदर्शिता बनी रहने पर अध्यात्म भाव स्वार्थ रहित करता रहा , बुध्दि की मलिनता नहीं थी जबकि प्रतिस्पर्धा प्रतिमान संबंधों को कम महत्वपूर्ण मानता है और बुध्दि को मलिन।
    हृदय की शिक्षा भी भारतीय आर्थिक प्रतिमान में व्याप्त थी, अतः आपका लेख गौरवशाली आर्थिक व्यवस्था और अति महत्वपूर्ण मानवीय तृतीय पुरुषार्थ अर्थ को समझने का अवसर भी देता है।
    बुंद बुंद से सागर भरता है, अतः सुदृढ़ ग्रामीण अर्थव्यवस्था से समीप का नगर समृद्ध होता है और नगरों के समृद्ध होने से जनपदों का समृद्ध होना तय होता है और जनपदों का सुदृढ़ रूप से समृद्ध होना राष्ट्रीय सम्पन्नता को स्थिर करता है।

  3. वैविध्यपूर्ण भारतीय विकास पथ में स्वावलंबन का यह मॉडल समझना और इसके आधार पर आगे बढ़ा जा सकता है। दादा साप्ताहिक हाट बाजारों के भी महत्वपूर्ण योगदान सुदूर ग्रामीण अंचलों में आज भी दिखता है।

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