आओ सीखें इतिहास की त्रुटियों से

Mukul Kanitkar 12 मिनट का पठन

सनातन विकास प्रतिमान – 4

भारत की अंतर्निहित उद्यमिता के आधार पर उसके समृद्ध समाज का इतिहास अब सर्वमान्य है। ज्ञात समय के प्रारंभ से अधिकतम कालखंड में भारत ना केवल विश्व का सर्वाधिक उत्पादक, विकसित और सुखी राष्ट्र रहा है अपितु उसने अपने इस उद्यम का अवदान अद्वितीय विपणन और व्यापार परंपरा से विश्व को भी दिया है। विश्व के असफल आर्थिक प्रतिमानों की पृष्ठभूमि पर भारत की यशस्विता का आख्यान केवल इतिहास के गुणगान के लिए नहीं किया जा रहा है। अपितु, वर्तमान समय की जटिलताओं में इस अनुभव से प्राप्त सीख द्वारा स्थायी समाधान खोजने का यह प्रयास है। सनातन धर्म के जिन शाश्वत सिद्धांतों की आर्थिक अभिव्यक्ति ने भारत में एक प्रकृतिप्रेमी, सर्व कल्याणकारी, शोषणमुक्त, समतायुक्त समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया था उन मूलतत्वों के युगानुकूल उपायोजन (Application) द्वारा सामयिक विकास प्रतिमान का विकास करना इस इतिहास चिंतन का उद्देश्य है।

अतः केवल उन्हीं विषयों का उल्लेख किया जा रहा है जो वर्तमान युग में समाधान देने में उपयोगी हो। जो जो पुरातन वह सब आदर्श ऐसा अहंगण्ड इस प्रगट चिंतन के पीछे नहीं है। इतिहास में भी हमारे पूर्वजों द्वारा कुछ त्रुटियाँ हुई हैं। उनके और अनेक सद्गुण विकृतियों के कारण ही हमें अनेक शताब्दियों तक राजनीतिक, सामरिक चुनौतियों का सामना करते हुए सतत संघर्ष करना पड़ा। कुछ कालखंड में विकृत मानसिकता वाले पाशविक विदेशियों ने बड़े भूभाग पर शासन भी किया। इस संस्कृति ने हार नहीं मानी और आक्रांताओं को एक दिन भी बिना विरोध के चैन से रहने नहीं दिया। किंतु इतिहास के उन पक्षों का वर्तमान धर्माधारित अर्थ चिंतन से प्रतिमान विकास के वैचारिक यज्ञ में अधिक स्थान नहीं है। इसीलिए उनका विस्तार से विचार नहीं किया जा रहा। फिर भी संक्षेप में उनका उल्लेख त्रुटियाँ ना दोहराने हेतु उपयुक्त होगा।

सतर्क समाज का अभाव: संपन्नता के साथ सुरक्षा महत्वपूर्ण होती है। जब समाज सुरक्षा का दायित्व सामूहिक मानने के स्थान पर केवल राजसत्ता और एक रक्षक वर्ग पर निर्भर हो जाता है तो उनके भ्रष्ट, भोगी, प्रमादी अथवा निपट अहंकारी होने पर पूरा राष्ट्र असुरक्षित हो जाता है। मगध साम्राज्य की संपन्नता के समय यह अनवधान ही अलक्षेन्द्र (Alexander) के आक्रमण का पूर्वानुमान कर कैकेय की सीमा पर ही उसे रोकने की दूरदृष्टि नहीं दिखा सका। आचार्य चाणक्य द्वारा इस भूल से शिक्षा प्राप्त कर एकात्म मौर्य साम्राज्य की स्थापना के साथ ही अपने अनुभव को संहिताबद्ध करना आज ज्ञानप्रद हुआ है। बढ़ती समृद्धि के साथ केवल शासन तंत्र और गुप्तचर व्यवस्था ही नहीं, पूरे समाज की और विशेषकर प्रबुद्ध वर्ग की सतर्कता और दूरदृष्टि बढ़ना आवश्यक है। सरकार की मर्यादा होती है। उसके प्रतिभाव (Feedback) तंत्र और मूल्यांकन की सीमा है। लोकतंत्र में प्रत्येक पाँच वर्ष में लोकप्रियता की परीक्षा भी कठोर नीतियों में बाधा बनती है और अतिरंजित प्रदर्शन अनिवार्य हो जाता है। ऐसे में समाज के वैचारिक नेतृत्व की सतर्कता अत्यावशक हो जाती है। चाणक्य जैसे निस्पृह, निस्वार्थी तथा तपस्वी आचार्य ही यह बौद्धिक सजगता समाज में बनाये रखते हैं। यह सीख आज भी पूर्ण प्रासंगिक है। लोकतंत्र में तो समाज का सजग सहभाग किसी भी विकास प्रतिमान का अनिवार्य अंग है।

शत्रुबोध की कमी: स्वयं के नैतिक जीवन के सिद्धांतों से ही शत्रु का मूल्यांकन सदा ही भारत के लिए घातक रहा है। हमने युद्ध भी नीतिमत्ता से किए। हमारे धर्मयुद्ध का अर्थ धर्म के लिए युद्ध नहीं अपितु धर्म के नियमों से न्यायपूर्ण युद्ध था। मोहम्मद घोरी के साथ पृथ्वीराज चौहान के दयापूर्ण व्यवहार से लेकर पुर्तगाली लुटेरे वास्को द गामा के समुद्रिन द्वारा किए स्वागत तक भारत ने शत्रु के क्रूर और कपटी स्वभाव को ना जानने की क़ीमत लक्षावधि बलिदानों और दशकों की परतंत्रता से चुकायी है। छत्रपति शिवाजी जैसे ही कुछ आदर्श इतिहास में हैं जिन्होंने शत्रु के स्वभाव को पहचान कर उसके साथ उचित व्यवहार किया। पाँच पाँच शाहियों से घिरे भूभाग में हिंदवी स्वराज्य की स्थापना उन्होंने इसी शत्रुबोध के आधार पर की थी। अंग्रेजों की कुटिलता को वे भलीभाँति जानते थे। इसलिए तोपख़ाने के क्रय के समय उन्होंने केवल तैयार तोपों और गोलाबारूद की आपूर्ति को तत्पर अंग्रेज व्यापारियों के स्थान पर तकनीक का प्रशिक्षण देकर स्वदेशी उत्पादन की संभावनावाले डच उत्पादकों के साथ अनुबंध किया। शिवाजी की दूरदर्शिता से सीख ना लेने के कारण बोफ़ोर्स कंपनी से दलाली खाकर ख़रीदी हाउवित्ज़र तोपों के गोले कारगिल युद्ध के ऐन मध्य में समाप्त हुए। कंपनी द्वारा तकनीक स्थानांतरण (Technology Transfer) नहीं किया गया था और समय पर आपूर्ति में भी बाधा दी। भारतीय आयुध निर्माणियों (Indian Ordinance Factory) ने आपातकाल में उत्पादन कर सीमा की रक्षा की थी।

लगातार अनुभवों के बाद भी यह सद्गुण विकृति आज भी हिंदू समाज में व्याप्त है। उत्तरी हिमालयीन सीमा पर अपने सैनिकों की बलि लेनेवाले शत्रुदेश की वस्तुओं से भारतीय बाज़ार केवल इसीलिए पटे पड़े हैं क्योंकि स्वार्थी जनता कुछ रुपये बचाने के लिए उन सस्ती वस्तुओं का क्रय करती है। केवल शासन द्वारा दुगना आयात कर और तैयार (Finished) वस्तुओं के आयात पर निर्बंध से काम नहीं चलेगा। जब सारा समाज शत्रु की कूटिलता को पहचान कर व्यवहार में छोटे-छोटे त्याग द्वारा उसका उत्तर देगा तभी शत्रु के आचरण पर प्रभावी परिणाम दिखेगा। सनातन विकास प्रतिमान के युगानुकूल विकसन में शत्रु परिचय और उसके स्वभावबोध का बड़ा स्थान है।

आलस और ईर्ष्या: संपन्नता से प्राप्त सुविधा से प्रमाद के साथ ही निरर्थक स्पर्धा, ईर्ष्या और मान सम्मान के उथले मानकों का उदय होता है। यह भी हमारे लिए सदा ही घातक रहा है। अंभी, जयचंद, मानसिंह, मीर जाफ़र जैसे उदाहरणों से हम जानते हैं कि हर बार शत्रु को निमंत्रण, सहयोग और साथ हमारे अपने लोगों ने ही दिया है। आज भी राजनीति के साथ ही आर्थिक क्षेत्र में भी अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या विकास में बाधा बनती है। समाजवाद के खोखले सिद्धांतों के अव्यावहारिक प्रयोग से भ्रमित राजनेता, संचार माध्यम और उनके प्रभाव में समाज भी वंध्या ईर्ष्या के चलते देशहित के विपरीत वातावरण खड़ा करता है। जैसे विश्वभर में 50 से अधिक व्यापारी निगमों (Commercial Company) के भारतीय मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEO) का महिमामंडन माध्यम (Media) और सामाजिक संचार उपकरण (Social communication Apps) भी करते हैं। कितने भी अलंकृत और महावेतन के धनी क्यों ना हो, अन्ततोगत्वा है तो नौकर ही। उनको करोड़ों डॉलर में पगार देने वाले निगम उनका शोषण कर खरबों डॉलर कमाते हैं। भारतीय समाज में उनका महिमामंडन भी सहानुभूति द्वारा अपने उत्पादों का बाज़ार बढ़ाने के लिए ही किया जाता है। इससे स्वार्थी देश से पलायन किए नौकरों पर गर्व करनेवाला समाज बड़े उद्यमियों से अर्थहीन ईर्ष्या करता है और सार्वजनिक जीवन में उन्हें सतत आलोचना का सामना करना पड़ता है। ये उद्यमी ही देश में बड़ी संख्या में रोज़गार का निर्माण करने के साथ ही विदेशों में निवेश कर देश को रणनितिक वर्चस्व भी प्रदान करता है। श्रीलंका, नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में चीन के आक्रामक निवेश का उत्तर देने का सामर्थ्य इन्हीं उद्यमियों में है। अफ़्रीका, दक्षिण अमेरिका के मित्र देशों में भारत के आर्थिक हितों की रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) के साथ ही ये सतत निन्दित उद्यमी ही करते हैं। ऐसे ही एक उद्यमी अड़ानी पत्तन (ports) द्वारा यूनान में निर्मित दो बंदरगाह यूरोप में भारत के व्यापार के केंद्र बनने जा रहे हैं। यह क़तई अपेक्षित नहीं है कि इन पूँजीपतियों का अनावश्यक महिमामंडन हो अथवा उनके ग़ैरक़ानूनी व्यवहार को दुर्लक्षित किया जाए। पर उनकी उपलब्धियों का समाज और संचार माध्यमों द्वारा समुचित सम्मान देश में उद्यमिता को प्रोत्साहित करेगा। यही भारत के दीर्घकालीन वैश्विक व्यापार का आधार रहा है।

मित्रबोध का अभाव: हिंदू समाज में रणनीतिक सोच का नितांत अभाव है। अतः हमारी मित्रता का आधार सदाशयता, समान रुचि और कई बार तो समान दोष और व्यसन भी होता है। केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, समाज और राष्ट्र के रूप में भी यह मित्रचयन में त्रुटि ऐतिहासिक परिणाम देती है। व्यक्तिगत अहंकार के साथ ही परिवार, जाति, भाषा आदि छोटे परिचयों के अभिनिवेश से राष्ट्र विघातक शक्तियों से भी मित्रता हो जाती है। राणा प्रताप द्वारा अपमान के भाव से ही मानसिंह न केवल अकबर की गोद में जा बैठा अपितु उनकी सेना के साथ स्वदेश पर आक्रमण का नेतृत्व भी कर बैठा। इस द्रोह में छुपा कुल अपमान तब दिखाई नहीं पड़ा। इसी त्रुटिपूर्ण मैत्री के उदाहरण आज भी दिखाई देते हैं।

इस विषय में भी छत्रपति शिवाजी का आचरण मार्गदर्शक है। औरंगज़ेब द्वारा मिर्झाराजे जयसिंह के नेतृत्व में स्वराज पर सेना भेजे जाने पर महाराज ने मिर्झाराजे को पत्र लिखकर मैत्री का संदेश भेजा। वह पत्र राष्ट्रहित में मित्रबोध के मानक प्रदान करता हैं। धर्म और देश की आन देकर छत्रपति जयसिंह जी को विदेशी शासक की ओर से स्वराज्य पर आक्रमण के कलंक का स्पष्ट शब्दों में भान कराते हैं और फिर आह्वान करते हैं कि हिंदवी स्वराज्य की ओर से उनके पराक्रम का प्रयोग करें। ऐसा करने पर नेतृत्व उनको देने का आश्वासन भी देते हैं। देश हित में मैत्री के लिए उच्च कोटि के त्याग की तत्परता का यह अद्भुत उदाहरण है। शिवाजी की मित्रता केवल पत्र में दिये आह्वान तक ही सीमित नहीं है। भ्रमित स्वामीनिष्ठा से जयसिंह द्वारा इस प्रस्ताव को ठुकराने पर भी स्वधर्मियों का रक्त ना बहे इस भाव से शिवाजी उनसे संधि करते हैं और आगरा के दरबार में भी जाते हैं। यदि जयसिंह जी भी राष्ट्रबोध से मित्रबोध को समझे होते तो देश का इतिहास ही कुछ और होता। वर्तमान समय में सनातन विकास प्रतिमान के क्रियान्वयन में इस ऐतिहासिक भूल से सीख लेनी होगी।

नेतृत्व पर विश्वास का अभाव: जो धार्मिक विश्वास का वातावरण हमारे श्रेष्ठियों ने अपने उदार एवं सत्यनिष्ठ व्यवहार से विश्वभर में खड़ा किया था, राजनीतिक क्षेत्र में उसी का अभाव हमारे पराजय का कारण बना। सागर से विदेश में व्यापार करनेवाले व्यापारियों की कथाएँ विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। शब्द के पक्के, हिसाब में अचूक और पूर्ण विश्वासपात्र भागीदार यह भारतीय व्यापारियों की छवि थी। पिता की मृत्यु के बाद भी उनकी देनदारियाँ बिना किसी विवाद के निभाने के अनेक प्रसंग विश्व इतिहास में लिखे मिलते हैं। आज भी विश्वभर की अनेक भाषाओं में हिंदुओं की विश्वसनीयता की कहावतें प्रचलित हैं। जैसे जापानी भाषा में कहावत है – हिंदू कभी असत्य नहीं बोलता।

किंतु यही विश्वास नेतृत्व में दिखाने में कई बार चूक हुई है। पानीपत के दोनों युद्धों में भारत की हार का भी यही कारण बना। कई बार नेतृत्व को अप्रिय निर्णय लेने पड़ते हैं। अंतिम विजय के लिए पीछे हटना पड़ता है। ऐसे समय ही अनुयायियों तथा समाज के धैर्य की परीक्षा होती है। अफ़ज़ल ख़ान द्वारा कुलदेवी तुलजा भवानी के मंदिर और पंढरपुर के विट्ठल मंदिर का ध्वंस करने के बाद भी शिवाजी का प्रतापगढ़ में छुपे रहना अनेक अनुयायियों को सहन नहीं हुआ। मुखर विरोध के साथ ही कई सरदार शत्रु से जाकर मिल भी गए। किंतु बहुसंख्य मावले (सैनिक) अपने राजा पर पूर्ण विश्वास कर डटे रहे। उन्हीं के भरोसे शिवाजी महाराज ने ना केवल अफ़ज़ल की बलि माँ भवानी को चढ़ायी अपितु दो माह के अंदर खोये दुर्ग भी जीत लिए और भग्न मंदिरों का भी जीर्णोद्धार किया गया। आर्थिक क्षेत्र में भी दूरगामी राष्ट्रहित में नेतृत्व को तात्कालिक कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। लोकतंत्र में ऐसे अलोकप्रिय निर्णय लेने हेतु नेता पर जनता का विश्वास अत्यावश्यक है। इतिहास में चीन, जापान, जर्मनी आदि राष्ट्रों के विजय का रहस्य नेतृत्व में विनाशर्त श्रद्धा ही है। हमें भी इस गुण का विकास समाज और राष्ट्र के रूप में करना होगा।

सामाजिक भेदभाव और विषमता: संपन्नता के प्रत्यव्याय (side effect) के रूप में समाज में भेदभाव का निर्माण हो गया। निश्चित सफलता और कौशल्य की निरंतरता के लोभ में व्यवसाय में वंशानुगतता में वर्ण के स्थान पर जाति, उपजाति का प्रचलन प्रारंभ हुआ। विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव और संघर्ष में परिष्कार बाधित होने के कारण यह व्यवस्था कुछ स्थानों पर कुप्रथाओं के प्रचलन से ऊँच-नीच भेद में और क्वचित् कुछ स्थानों पर अस्पृश्यता में बदल गयी। इस्लाम में कन्वर्जन को विरोध करनेवाले वीर समुदायों को जानबूझकर मैला ढोने जैसे मलीन कार्यों में लगाया गया और ग्राम-निष्कासित किया गया। इस प्रकार यह भेद सामाजिक और आर्थिक विषमता का कारण बन गया। विदेशी लेखकों द्वारा अतिशयोक्ति तथा धार्मिक साहित्य में किसी भी आधार के अभाव को स्वीकारते हुए भी सामाजिक भेदभाव के वास्तव को नकारा नहीं जा सकता। धर्मपाल जी द्वारा गवेषित साक्ष्यों में अंग्रेजों के शैक्षिक सर्वेक्षण का वृतांत बताता है कि 1823-1830 CE तक भारत में सभी के लिए शिक्षा उपलब्ध थी और साक्षरता 100% के निकट थी। ब्रिटिश शिक्षा ने भारत के बहुजन समाज को निरक्षर बनाया यह सत्य है फिर भी सामाजिक विभेद और आर्थिक विषमता का पूर्ण दोष केवल अंग्रेजों को देना उचित नहीं होगा। मुख्य बात है कि भविष्य के लिए सीखने में यह दोषारोपण बाधा ही बनेगा। विषमता विकास की विरोधी है यह स्वीकार करते हुए निर्दोष समानता के लिए प्रयत्न ही सनातन विकास का सही मार्ग है।

अन्य भी अनेक त्रुटियों, दोषों और ख़ामियों की सूची बनाई जा सकती हैं। किंतु, आर्थिक प्रतिमान के चिंतन में भविष्योन्मुखी दृष्टि से इतना आत्मावलोकन पर्याप्त है। इन सब दोषों का एकमात्र उत्तर सनातन एकत्व के सिद्धांत से उपजी आत्मीयता और विराट पुरुष राष्ट्र के प्रति अंगभाव का प्रत्येक राष्ट्रांग में संस्कार ही है।

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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5 Comments

  1. बहुत से ऐतिहासिक त्रुटियों से आपके लेख द्वारा मैं परिचित हुआ, सावधानियां आने वाले समय में कब, कैसे, कितना रखना,इसकी स्पष्टता मिली।
    आपके प्रस्तुत तथ्यों से इतिहास को पढ़कर सावधान होने का कर्त्तव्य ध्यान आया।

    प्रणाम।

    • अमूमन जिन विषय संदर्भों पर लोग आम बोल चाल की बातों से काम चला लेते हैं। पक्ष- विपक्ष भी कर लेते हैं। यह लेख पढ़कर यह गहरे से समझ आया कि अपनी सनातन थाती को बहुत समग्रता से आत्मसात करना ही नहीं अपितु व्यापक समाज तक विस्तारित करना होगा। दादा ऐसे तथ्यों को हम सब के साथ साझा करने के लिए आपका सहृदय आभार।

  2. ऋषि और कृषि परंपरा का परिचायक है हमारा सनातन ज्ञान विज्ञान और धर्म

  3. 🙏 सुंदर विद्वत्तापूर्ण माहिती सफर लेक धन्यवाद अभिनंदन शुभकामना..

  4. विभिन्न सामाजिक, अर्थिक, राजनीतिक,….पहलुओं को देखने का बिल्कुल नया और सही दृष्टिकोण मिला । जारी रखें । धन्यवाद।

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