कृषिप्रधान अर्थात् निर्माण केंद्रित विकास

Mukul Kanitkar 10 मिनट का पठन

सनातन विकास प्रतिमान – 3

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।

नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:॥

जैसे सोये सिंह के मुख में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करता वैसे ही कार्य की सिद्धि उद्यम से ही होती है, केवल मनोरथ (इच्छा) से नहीं।

भारत में उद्यम का महत्व बाल्यकाल से ही सबके मन में अंकित किया जाता रहा है। ज्ञात इतिहास के सर्वाधिक कालखंड में विश्व के सबसे समृद्ध राष्ट्र होने का रहस्य यह उपजत और संस्कारित उद्यमिता ही है। भारत सदा ही उत्पादक देश रहा है। कृषि शब्द का अर्थ केवल खेती से जोड़ा जाता है किंतु उसका मूल अर्थ क्रियाशीलता से उत्पादन करना ऐसा है। अर्थात् आज की अर्थशास्त्रीय शब्दावली में समझना है तो वस्तु निर्माण (manufacturing) कृषि का ही अंग होता है। खेती पद का मूल क्षेत्र अर्थात् जोता हुआ भूखंड है। क्ष का ख हुआ और क्षेत्र का खेत। एक बीज के सहस्र करनेवाली खेती सभी उत्पादनों की जड़ में है इसीलिए भारत में उसका महत्व सदा से ही सर्वाधिक रहा है। समाज का बड़ा वर्ग, लगभग सभी किसी ना किसी रूप में खेती से जुड़े रहते हैं। अधिकतर शहरी नागरिकों की भी अपने मूल ग्राम में खेती होती ही है। फिर भी आर्थिक उत्पादन के रूप में कारीगरी भारत का मुख्य आधार रहा है। इस अर्थ में भारत कृषिप्रधान अर्थतंत्र (manufacturing economy) रहा है।

खेती, पशुपालन (गोरक्ष), मत्स्य पालन आदि का अधिकतर उत्पाद तो विक्रय ही नहीं होता था। अनाज, सब्ज़ी, फल, दूध, छास, मछली, मांस अर्थात् सभी खाद्य बेचे नहीं जाते थे। अत: अन्नोत्पादक खेती स्वयं के और समाज के पोषण का साधन थी। अन्य वस्तुओं के उत्पादन में उपयुक्त फसलें जैसे वस्त्र हेतु कपास, ताग, रेशम आदि और मसाले ही बेचे जाते थे। अर्थात् समाज का आधार खेती थी किंतु आर्थिक उत्पादन का आधार कृषि अर्थात् वस्तुनिर्माण था। कुशल कारीगर (Artisans) समाज में सर्वाधिक सम्मान पाते थे। उन्हें श्रेष्ठी कहा जाता था जो उनकी श्रेष्ठता का परिचायक है। बुनकर, दर्जी, लुहार, सुथार, शिल्पी हमारे आर्थिक श्रेष्ठता के आधार थे। वर्ण व्यवस्था में भी ये सब वैश्य कर्म में आते थे। इनके उत्पादों को पूरे विश्व में वितरित करने का कार्य करने वाले व्यापारी भी भारत की अर्थव्यवस्था के वैश्विक वर्चस्व में प्रमुख कारक रहे हैं। भगवद्गीता तथा अग्निपुराण में कहा है – कृषि गोरक्ष वाणिज्य वैश्य कर्म स्वभावजं – उत्पादन, पशुपालन और विपणन ये वैश्यों के स्वाभाविक कर्म हैं। खनिकर्म (Mining) और खनिजों से विविध वस्तुओं का निर्माण भी भारत के उद्यम का अंग सदियों से रहा है। इतिहास के बड़े कालखंड में उद्यम के कारण ही वैश्विक उत्पाद में भारत का योगदान सर्वाधिक रहा है।

सामान्य युग (Common Era-CE) के पूर्व से भारत में आए प्रवासियों ने जो यात्रा वर्णन लिखे हैं उनके अध्ययन से हम पाते हैं कि भारत की समृद्धि उद्यम प्रेरित थी। इसी उद्यम से विज्ञान और तकनीक का भी विकास हुआ था। भारत इनमें भी सर्वाधिक प्रगत था। हमारे मन में भ्रम खड़ा किया गया है कि यूरोपीय उपनिवेश के कारण ही भारत में विज्ञान आया अन्यथा तो यह केवल सपेरों और जादूगरों का देश था। यदि विदेशियों के यात्रा विवरण व अन्य अभिलेख देखेंगे तो पाएँगे कि यह पूर्ण असत्य है। तथ्य इसके विपरीत है कि यदि भारत राजनीतिक रूप से परतंत्र नहीं हुआ होता तो केवल भारत ही नहीं, पूरा विश्व भी वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में आज से अधिक प्रगत होता।

ढाई सहस्र से अधिक वर्ष पूर्व चंद्रगुप्त के कार्यकाल में भारत में आए ग्रीक राजा सेल्यूकस के राजदूत मैगस्थनीज़ ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में भारत के स्थापत्य, नौकानयन, वैद्यक ज्ञान आदि क्षेत्रों में चमत्कृत करनेवाली तकनीक का वर्णन किया है। आज जैसे भारतीय लोग दुबई आदि शहरों के भवनों को देखकर अचंभित होते हैं वैसे ही ये विदेशी यात्री भारतीय तकनीक से आश्चर्यचकित हुआ करते थे। इतालवी यात्री टॉलेमी लिखता है – भारत में प्रासाद इतने ऊँचे और बहुमंज़िला हैं कि देखते हुए टोपी नीचे गिर जाए। इसी कालखंड में आये दमाकास आदि यात्रियों ने धातुशास्त्र, शल्य चिकित्सा में भारत की प्रगती का वर्णन आश्चर्य मिश्रित आदर के साथ किया है। वेनिस से विजयनगर साम्राज्य के समय में आए यात्री निकोलो कोंटी ने वहाँ की समृद्धि का अद्भुत वर्णन किया है। आज भी आप हंपी में विजयनगर के अवशेष देखते हैं तो पाते हैं कि मंदिर के सामने दो किलोमीटर लंबा बाज़ार है जहाँ दो मंज़िला दुकानों के खंडहर दिखाई देते हैं। कोंटी के वर्णन में आया है कि इन दुकानों में हीरो, रत्नों को तोलकर बेचा जाता था। यह समृद्धि भारत में पाँच सौ वर्ष पूर्व तक विद्यमान थी।

मोहम्मद गजनी के साथ भारत में आये पारसी विद्वान अल् बरुनी ने अपने ग्रंथ ‘तारिक-ए-हिन्द’ में भारत-विद्या का विस्तृत वर्णन किया है। शास्त्र ग्रंथों, समाज की स्थिति के साथ ही मंदिरों के स्थापत्य के बारे में भी अनेक चमत्कारिक तथ्य इसमें पाये जाते हैं। आश्चर्य के कारण अतिशयोक्ति मानकर अथवा यूरोप से भारत अधिक प्रगत था इसे अस्वीकार करने के लिए, प्रथम विदेशी और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने अनेक तथ्यों की अनदेखी की। नये अध्ययनों से पता चलता है कि निश्चित रूप से स्थापत्य, धातुकर्म, शस्त्रनिर्माण, नौकानयन सहित अनेक क्षेत्रों में भारत की तकनीक उन दिनों विश्व के सभी देशों से उन्नत थी। चंद्रगुप्त के विजय स्तंभ में प्रयुक्त लौह, कैलाश मंदिर, बृहदेश्वर मंदिर जैसे अनेक निर्माणों में प्रयुक्त तकनीक तो वर्तमान उपलब्ध तकनीक से भी उन्नत दिखायी देती है। मोरक्को से आये इब्न बतूता सहित अन्य मुस्लिम यात्रियों के वर्णनों को केवल उस समय की राजनीति और युद्ध विवरण के स्रोत के रूप में देखने के स्थान पर भारत की तत्कालीन सामाजिक, वैज्ञानिक तथा आर्थिक स्थिति को समझने के लिए अध्ययन करना भी आवश्यक है।

ह्यूआन सांग, फाहियान सहित सभी चीनी यात्रियों के बौद्ध मूल के कारण इससे संबंधित इतिहास और नालंदा, वल्लभी आदि विश्वविद्यालयों की उन्नत स्थिति पर उनके वर्णनों का उल्लेख होता है। साथ ही उस समय के समाज और प्रशासन तथा विविधतापूर्ण आर्थिक रचनाओं पर भी विशेष अध्ययन इन यात्रा विवरणों के आधार पर करने की आवश्यकता है। ये सभी यात्री भारत के स्वर्णिम युग के यात्री हैं। इन्होंने चंद्रगुप्त विक्रमादित्य और हर्ष के कालखंड में भारत की समृद्धि का प्रत्यक्ष साक्ष्य के साथ वर्णन किया है। इस इतिहास का आर्थिक दृष्टिकोण से विवेचन किया जाना वर्तमान में सनातन विकास प्रतिमान के प्रतिपादन में सहायक होगा।

इतालवी यात्री मार्को पोलो के बारे में अनेक किंवदंतियाँ हैं। उनके रेशम मार्ग (Silk route) से चीन और भारत में यात्रा को अनेक इतिहासकार काल्पनिक मानते हैं। चीन की दीवार सहित अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों की अनुपस्थिति और भारत की यात्रा में कई स्थानों का नाम के बिना उल्लेख इसका कारण बताया जाता है। सेंट थॉमस के भारत आगमन के मिथक को बनाये रखने में मार्को पोलो का यात्रा वर्णन सहायता करता है। इसी कारण ईसाई प्रभाव के इतिहासकारों ने इसे स्थापित करने का प्रयत्न किया है किंतु उसमें भी तथ्य-भेद है। ईसाई मिथक में सेंट थॉमस की समाधि भारत के बाहर पहाड़ के ऊपर बतायी जाती है। मार्को पोलो के वर्णन में समुद्र किनारे एक अनाम ग्राम में इस समाधि का उल्लेख मिलता है। रोम और इतालवी ईसाई इसे नहीं मानते पर भारत में कन्वर्जन के साधन के रूप में प्रयोग करते हुए उस ग्राम को मैलापुर के रूप में प्रस्थापित करने का प्रयास किया जाता है। अधिक गंभीर और प्रामाणिक यूरोपीय इतिहासकार मानते हैं कि संभवतः मार्को पोलो ने कभी इस्तांबुल छोड़ा ही नहीं। वहाँ आनेवाले भारतीय, चीनी व्यापारी तथा अरबी प्रवासियों से चर्चा कर प्राप्त जानकारी को पुस्तक रूप में प्रकाशित कर अपनी यात्रा का मिथक गढ़ा। हो सकता है वह उसकी साहित्यिक शैली भी हो। किंतु, भले ही अन्य यात्रियों से सुनी बातों पर आश्रित हो ‘बुक ऑफ़ मार्को पोलो’ में भारत की समृद्धि के अनेक आश्चर्यजनक उल्लेख मिलते हैं। सनातन विकास प्रतिमान के अध्ययन में विवादित स्रोत को टालना ही उपयुक्त है किंतु शोधकर्ता इसे प्राथमिक स्रोत के स्थान पर अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारियों की पुष्टि हेतु द्वितीय स्रोत के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।

धर्मपाल जी द्वारा ब्रिटिश अभिलेखागारों से एकत्रित मूल सामग्री पर आधारित पुस्तक ‘18-19 वी शताब्दी में भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी’ में अनेक ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा उस समय की विस्मयकारी तकनीक का वर्णन मिलता है। लेफ़्टनेंट कर्नल आयर्नसाइड ने 1774CE में लिखे लेख में भारत में बेंत के पेड़ से वस्त्र तथा कागज बनाने में उपयुक्त तकनीक का सचित्र वर्णन लिखा है। मेजर जनरल अलेक्ज़ेंडर वॉकर द्वारा 1820CE में लिखे लेख में खेती में प्रयुक्त उन्नत उपकरणों का विस्तृत वर्णन मिलता है। हल से लेकर अन्य अनेक उपकरणों को बनाने की विधि का भी वर्णन इस सैनिक अधिकारी ने आदर और आश्चर्य के साथ किया है। बंगाल आर्मी के मेजर जेम्स फ़्रेंकलिन ने मध्य भारत में लोहे के उत्पादन के बारे में 1829CE में लिखे शोधपत्र में लौह अयस्क (Iron ore) की खानों से लेकर उससे शुद्ध लौह प्राप्ति की प्रक्रिया, उसके उपकरण और भट्टियों का विस्तृत चित्र आदि के साथ वर्णन किया है। कैप्टन कैंपबेल ने 1842CE में ऐसा ही अध्ययनपूर्ण आलेख दक्षिण भारत में लौह उत्पादन पर लिखा। दोनों ने इंग्लैंड और यूरोप के लौह की गुणवत्ता और निर्माण लागत के साथ तुलना भी इन आलेखों में दी है। निसंदिग्ध रूप से दोनों ने यह निष्कर्ष दिया है कि भारतीय तकनीक अधिक गुणवत्तापूर्ण और लागत में कम थी।

मैगस्थनीज़ के प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित साक्ष्य से प्रारंभ कर धर्मपाल जी द्वारा अभिलेखों के प्राथमिक स्रोत से संकलित जानकारी के आधार पर पर्याप्त निश्चितता से कहा जा सकता है कि पूरे ज्ञात इतिहास में ब्रिटिश शासन और शिक्षा व्यवस्था द्वारा जानबूझकर किये विनाश से पूर्व तक भारतीय समाज अत्यंत उन्नत और समृद्ध था। ब्रिटिशों ने षडयंत्रपूर्वक कृषि अर्थात् वस्तु निर्माण (manufacturing) के ग्रामाधारित, विकेंद्रित, स्वावलंबी तथा कौशल श्रमाधारित तंत्र को पूर्णतः नष्ट किया। तकनीक की बड़ी मात्रा में चोरी की गई। यूरोप की औद्योगिक क्रांति में भारत का प्रच्छन्न योगदान केवल शोध का नहीं आपराधिक विवेचना (Criminal Investigation) का विषय है। अनेक पारंपरिक कुशल कारीगर समुदायों को विस्थापित कर वन में खदेड़ दिया। CE की 18वी शती तक ग्राम्य तथा नगरी अर्थतंत्र का सगर्व आधार रहे अनेक कारीगर समुदाय आज वनवासी जनजातियों के रूप में पाए जाते हैं। लुहार काम में संलग्न ऐसी अनेक जनजातियाँ गड़िया लोहार, अगरिया, असुर आदि नामों से पूरे देश में पायी जाती हैं। अनेकों ने आज भी अपने वंशानुगत कौशल को बनाये रखा है। वस्त्र उद्योग, चिकित्सा, खगोलविद्या, उन्नत खेती आदि सभी क्षेत्रों में ब्रिटिश षडयंत्र का प्रभाव आज भी दिखायी देता है।

स्वतंत्रता के समय भारत का विश्व उत्पाद में योगदान केवल 2% था। समाज से स्वावलंबन और उद्यम का ह्रास हो गया था और केवल नौकरी को ही रोज़गार के रूप में स्थापित किया गया था। उत्तम कृषि, मध्यम व्यापार और अधम चाकरी के अनुसार सामाजिक प्रतिष्ठा की सीढ़ी उलट हो गई थी। सनातन विकास प्रतिमान के युगानुकूल विकसन में उद्यम और निर्माण का महत्व पुनः अधोरेखित करना आवश्यक है। नौकरी से अधिक स्वरोज़गार तथा सेवा से अधिक निर्माण को प्रतिष्ठा यह भारतीय समृद्धि का मेरुदंड है।

Mukul Kanitkar

लेखक

Mukul Kanitkar

भारतीय संस्कृति, समाज, शिक्षा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रजीवन पर लेखन।

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17 Comments

    • हमारा इतिहास हमारी संस्कृति हमारी सभ्यता, यहां उपस्थित धरोहर हमेशा यह प्रदर्शित करती है कि भारत एक क्रियाशील कर्म प्रधान और क्रियाशील केंद्रित रहा है, इन सभी चीजों को और अधिक शांति हुए हमें अपने विश्वास को और मजबूत करना होगा ताकि हम अपने संस्कृति की बात को अच्छे से दुनिया में रख सके

  1. आत्म निर्भर भारत के युवाओं को रोजगार खडे करने की दिशा स्वयं को प्रेरणा देने वाला लेख हैं ।🇮🇳💐

  2. निश्चित ही इस लेख द्वारा विभिन्न साक्ष्यों को दिए जाने से यह स्पष्ट है कि भारत ही विश्व में वर्तमान विज्ञान को जन्म देने वाला रहा है भरता द्वारा दिए तकनीकी व अन्य विज्ञान को चुरा कर ही यूरोप में औद्योगिक क्रांति आई थी और आज भी वो नवीन विज्ञान का आधार रही है। बिना कुछ किए ही भारत सोने की चिड़िया कहलाता था यह कहना हास्यास्पद है। अंग्रोजो द्वारा भारत की उद्यमिता को नष्ट करना विश्व का एक बड़ा अपराध रहा है। यूरोप ने बड़े बड़े अपराध किए है अमेरिका ऑस्ट्रेलिया से वहां के मूल लोगों की सामुहिक हत्या भी इसके समतुल्य जैसा ही है। सही में कहें तो ईसा और मूसा ने विश्व में स्वयं को स्थापित करने के लिए दूसरों का विनाश ही किया है।
    डॉ प्रभात शर्मा

  3. यह लेख अत्यंत प्रेरणा दायी है

  4. अत्यंत सारगर्भित, शोधपरक, तथ्यपूर्ण सामग्री। वास्तव में भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की महती आवश्यकता है। वस्तुतः हमारे गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान के पथ पर अग्रसर होते हुए उन्नतशील भविष्य का निर्माण करना है, परंतु उसके लिए यह परमावश्यक है कि हम अपने इतिहास की सम्यक जानकारी प्राप्त करें।
    बहुत बहुत साधुवाद

  5. अद्भुत भारतीय परंपरा एवं भारतीय कृषि , स्वावलंबी भारत। ऐसा भारत फिर से होना चाहिए। उसके लिए प्रयास रथ रहना ही पडेगा। जो मनुष्य मार्ग से भटके है उनको मार्ग पर लाना ही चाहिए।

  6. सारगर्भित ,तार्किक,शोधयुक्त लेखन भाईसाहब
    आनंद आगया पढ़कर एकसाथ कई सारी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई
    धन्यवाद

  7. जन जन मैं भारतीयता (समृद्ध भारत) का बोध कराने वाला लेख

  8. यह तो सत्य है. पर अभी भी वह बीच की कड़ी नही जुड़ रही की इतनी उन्नत सभ्यता खुद को सुरक्षित क्यों नही रख सकीं.लक्ष्मी तो पुरूषार्थ से ही टिकती हैं. क्या भारत की भौगोलिक स्थिति के कारण शांति, समृद्धि, सभ्यता यहा उच्च स्तरीय थी. पर बर्बर लुटेरों से निपटने की इच्छा शक्ति का अभाव था

  9. अप्रतिम लेख है।माननीय मुकुल भैया जी का। मानो उन्होने आंखों देखा वर्णन किया हो। सभी घटनाक्रम उनके समक्ष घटित हुयी हों।
    भारत अतीत मे क्या था ? आदि का क्रमशः सोदाहरण वर्णन किया गया है। ये तथ्य खोजने मे कितना श्रम किया गया होगा, एक आचार्य होने के कारण समझ सकता हूं। आज समाज के समक्ष जिस प्रकार के मिथक परोसे जा रहे हैं उन सब का उपचार इन लेखों मे विद्यमान है। अच्छा होता कि शनैः शनैः संग्रहित ऐसे वर्णन का पुस्तक के रूप मे प्रकाशन की योजना भी बने ,निःसन्देह यह पुस्तकें भावी पीढ़ी के लिए ना कि ज्ञानार्जन हेतु साहित्य संग्रह होगा अपितु ज्ञान की पूंजी भी संग्रहित होगी।
    अगले लेख हेतु प्रतीक्षारत।
    आपका विनम्र
    प्रोफेसर रोहिणी प्रसाद
    रायपुर, छत्तीसगढ

  10. भारतीय होने पर गर्व होता है जब आपके द्वारा ऐसा शौर्यपूर्ण तथ्यात्मक भारतीय इतिहास समक्ष रखा जाता है।🙏

  11. 🚩🕉️
    बहुत ही सार्थक विश्लेषण!
    बहुत पहले यह कहा गया है कि
    “उत्तम खेती मध्यम बान ।
    अधम चाकरी भीख निदान।। ”
    सत्य यही है कि भारत में खेती(कृषि) को ही उत्तम माना गया जिसमें अनाज उत्पादन, पशुपालन उद्यानिकी विकास, छोटे छोटे कुटीर उद्योग, ग्रामीण विकास के प्रकल्प आदि शामिल थे। आज भी ये सब खेती में ही सम्मिलित हैं। लेकिन आज उपरोक्त कहावत ने ठीक विपरीत मोड़ ले लिया है। आज खेती को दोयम स्तर का व्यवसाय माना जाने लगा है । जिस चाकरी (नौकरी) को अधम माना जाता था उसे यूरोपीय देशों की चकाचौंध ने उत्तम स्तर का माना जाने लगा है। लेकिन भारत जैसे विशाल देश में जहाँ की 80℅ जनसंख्या आज भी खेती पर निर्भर है, के लिए उचित नहीं है। आज का युवा खेती से बहुत दूर जा चुका है जो भारत के भविष्य के लिए ठीक नहीं है। औद्योगिकीकरण ने किसानों की कृषि योग्य भूमि आच्छादित कर ली है और हर युवा नौकरी की चाह में अपने पैतृक व्यवसाय को भी खो रहा है। यह चिंतनीय विषय है। प्रबुद्ध वर्ग को इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता प्रतीत होती है। इस चिंतन में आपका यह लेख मील का पत्थर साबित होगा, ऐसा मेरा विश्वास है। ॐ

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