
सारा जीवन क्रियाशील रहनेवालों के लिए निवृत्ति सबसे कठिन होती है। गृहस्थों के लिए भी अगली पीढ़ी को सूत्र सौंप निवृत्त होना बड़ा कष्टदायक होता है। भले ही उन्होंने संतति की बड़ी प्रतीक्षा की हो और बचपन से ही उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में गढ़ा हो, जब समय आता है तब टालमटोल स्वाभाविक ही होती है। समर्पित प्रचारक के लिए भी दायित्व परिवर्तन के बाद स्वयं को समेटना एक परीक्षा ही होती है। नये दायित्व की व्यस्तता में भी पुरानी भूमिका में कुछ अटकाव रह ही जाता है। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि बढ़ती आयु के कारण सभी संगठनात्मक दायित्वों से मुक्त प्रचारकों के लिए यह कितना महत्कष्टप्रद होता होगा। इस सामान्य संगठनात्मक आसक्ति के लिए विनायकराव कानेटकर एक अपवाद थे। उन्होंने अत्यंत उदारता से २०१६ में भारतीय शिक्षण मंडल के संगठन मंत्री के दायित्व का परित्याग किया।

विनायकराव के साथ २०१२ में शिक्षण मंडल के सह संगठन मंत्री का दायित्व मिलने के बाद परमपूज्य सरसंघचालक जी के कहे शब्द बाद में समझ आये। मा. मोहन जी ने कहा था, “तुम भाग्यशाली हो कि एक आदर्श प्रचारक के मार्गदर्शन में कार्य करने का स्वर्णिम अवसर मिला है। उनसे सीख लो।” अगले दशक भर की संगठनात्मक यात्रा में पग पग पर परमपूज्य के इन शब्दों का साक्षात्कार होता रहा। १९६० के महान प्रचारकों की टोली के विनायकराव निश्चित ही एक आदर्श प्रचारक थे। उनका प्रचारक जीवन मेरी आयु से भी अधिक था। फिर भी उनकी वरिष्ठता और प्रचुर अनुभव हमारे सुमधुर संबंधों में कभी बाधा नहीं बने।

यह एक अनोखी मैत्री थी। गुर्दे की प्राणघातक व्याधि से उबरने के बाद भी उनकी आयु और शारीरिक अवस्था के अनुपात में वे अत्यंत सक्रिय थे। मूत्रमार्ग में प्रत्यारोपित नलियों (Stents) को हर छह माह में बदलना पड़ता था। उपचार को अत्यंत श्रद्धा से स्वीकार कर वे डॉक्टर के आदेशों का संघ अनुशासन से पालन करते थे। औषधी और आहार के कठोर अनुपालन से सत्तर की आयु में भी वे स्वस्थ थे। शारीरिक व्यायाम, प्राणायाम और नियमित शाखा के साथ उनकी दिनचर्या सुनिश्चित थी। संघ की प्रार्थना में उनके द्वारा एक दिन का भी व्यत्यय नहीं हुआ होगा।

पूर्ण रूप से अनासक्त होते हुए भी उनके दायित्व के क्षेत्र के पुराने स्वयंसेवकों के तीन पीढ़ियों से संबंध बनाए रखे थे। पचास वर्ष पुराने संबंधों के बच्चों और अन्य संबंधियों का पूरा विवरण भी उनके पास अद्यतन उपलब्ध रहता था। उनका अधिकतर प्रचारक कार्य ईशान्य क्षेत्र में और विशेषकर असम प्रांत में रहा। वैज्ञानिक दैनंदिनी की सहायता से वे प्रतिवर्ष सब संपर्कों का स्वयं के हस्ताक्षर में नूतनिकरण करते थे। अनेक यशस्वी व्यवसायी, उद्योजक, अधिकारी गर्व से बताते हैं कि बाल्यकाल में वे विनायकराव की गोद में खेले हैं। उनका संपर्क सतत और सुनियोजित होता था। नयी संचार तकनीक को उन्होंने सहज स्वीकार किया था। सम्पर्क सूत्रों का सहज प्रबंधन निश्चित ही एक महत्वपूर्ण प्रेरणा रही होगी।

यह संघ शैली का सम्पर्क तीन बंधु और दो बहनों के नाती-पोतों सह बृहत् परिवार में भी होता था। अपने विद्यालय, महाविद्यालयों के अधिकतर सहपाठियों और उनकी अगली पीढ़ियों से भी उनका जीवंत संपर्क था। एक बार पुणे में उन्होंने एक वरिष्ठ माताजी से यह कहकर परिचय कराया कि वे उनकी तीसरी कक्षा की एक सहपाठी की सुपुत्री हैं। मैंने खूब असफल प्रयत्न किया कि अपने प्राथमिक कक्षा के किसी एक सहपाठी का नाम स्मरण किया जाए। उनकी प्राथमिक कक्षा से २८ वर्ष अधुना होते हुए भी मैं एक भी नाम याद नहीं कर पाया। और यहाँ विनायकराव ना केवल उन्हें अपितु उनके पुत्र-पौत्रों को भी स्मृति में बनाए हुए थे। सामाजिक माध्यमों से हो रहे पुनर्मिलनों के कई वर्ष पूर्व से वे यह करते रहे हैं। प्रतिवर्ष अद्यतन होती दूरभाष पंजी और सामान्य डाक और उसमें भी सस्ते पोस्ट कार्ड से किए पत्राचार की यह पुरातन विधि थी।

वे सदा मेरा परिचय उनके सहयोगी के रूप में कराते थे। किसी पिता द्वारा अपने दायित्व को निभाने को सन्नद्ध पुत्र का सगर्व दिये परिचय के समान घरेलू होने के कारण तकनीकी रूप से सही ना होते हुए भी अत्यंत अपनत्व का अनुभव होता था। सभी संगठनात्मक बैठकों में उनका दृष्टिकोण परस्पर सम्मान और लाड़ से पालकत्व का होता था। हमारे उपनाम (कानिटकर – कानेटकर) में केवल एक मात्राभेद के सिवा पूर्ण साम्य था। पर किसी के भी द्वारा एक ही उच्चारण उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया। वे केवल नाम में त्रुटि सुधार से संतुष्ट नहीं होते थे, अपितु उपजाति के भेद को भी समझाकर ही मानते थे। यह विलोभनीय और शिक्षाप्रद था। वे स्पष्ट करना चाहते थे कि हमारा परस्पर संबंध रक्त से गहरा ध्येय संबंध था। संगठन के विस्तार और विलक्षण विकास से उन्हें आनंद और गर्व दोनों का सत्य अनुभव होता था। आदर्श कर्मयोगी से समान अनावश्यक हस्तक्षेप रहित सजग साक्षी भाव तथा उचित मात्रा में सुझाव, सुधार के साथ ही प्रचुर मात्रा में प्रोत्साहन और स्वातंत्र्य से परिपूर्ण नवपीढ़ी के मार्गदर्शन की उनकी विशिष्ट शैली थी। सभी अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों तथा विराट गुरुकुल सम्मेलन में उनका उत्साह अत्यंत उत्स्फूर्त तथा प्रेरक था। उन्हें सम्मान की कोई अपेक्षा नहीं थी, उल्टे किसी प्रकार के अनावश्यक महत्व को वे कठोरता से हतोत्साहित करते थे l बिना किसी आपत्ति अथवा मंच पर आमंत्रण की अपेक्षा के वे पूरे आयोजन में सक्रिय श्रोता की भूमिका आनंद से निभाते थे। जब कभी आयोजक उन्हें उत्सव केंद्र में लाने की भूल करते थे तब वे सबके सामने डाँट लगाने में भी नहीं चूकते थे कि यह संघ संस्कार नहीं है।

असमिया, बांगला, गुजराती, हिंदी, अंग्रेजी तथा मातृभाषा मराठी के ज्ञान से वे बहुभाषी थे। उन्होंने उत्साह से संस्कृत संभाषण की कक्षा में सहभाग लिया था और देववाणी में भी सहज अचूक संवाद में सक्षम थे। किंतु उनका सर्वोत्तम तो असमिया संभाषण में ही अभिव्यक्त होता था। ब्रह्मपुत्र का तट ही उनका वास्तविक घर था। वानप्रस्थ के बाद भी असम की वार्षिक यात्रा उन्हें वर्षभर के लिए ऊर्जान्वित कर देती थी।

संगीत भी उनका एक और प्रेम था। मूल रूप से शास्त्रीय संगीत के प्रशिक्षित श्रोता होने से वे अत्यंत मधुर गाते थे। औपचारिक शिक्षण के बिना भी हिंदुस्थानी शास्त्रीय संगीत का उनका ज्ञान और अभ्यास लक्षणीय था। उनका वाचन भी अधुनातन होता था। वे न्यूनतम तीन समाचारपत्र आद्योपांत पढ़ते थे और भिन्न भाषाओं में प्रकाशित अनेक लेख पढ़ने की नियमित अनुशंसा भी करते थे। सजीव आभासी बैठकों तथा संचार उपकरणों और सुविधाओं सहित सभी नूतन बातों को सीखने की तत्परता उन्हें अंत तक युवा बनाये हुए थी।

संगठनात्मक कार्य से सक्रिय निवृत्ति सर्वाधिक उल्लेखनीय थी। पूरा सम्पर्क तोड़े बिना उन्होंने उलझना पूर्ण बंद कर दिया। यह आश्चर्यजनक था कि बिना कण भर भी हस्तक्षेप किए वे सभी गतिविधियों में पूर्ण रुचि लेते थे। उनका स्वामित्वबोध अन्य गुणों के समान ही आदर्श था। वे अपनी भूमिका को ठीक से पहचानते थे और कथानक की अंतिम मात्रा तक बिना किसी जोड़ अथवा भेद के अचूक निभाते थे – कोई चुग़ली नहीं, कोई विसंवाद नहीं, कभी भी कोई संभ्रम अथवा ग़लतफहमी नहीं। जहाँ अपेक्षित वहाँ वे निश्चित उपस्थित रहते ही थे। दायित्व निवृत्ति के बाद जब उन्हें सब सत्रों में उपस्थित रहना अनिवार्य नहीं था तब भी वे सत्र नहीं चूकते थे। शिक्षण मंडल में विस्तारक योजना का शुभारंभ उनकी स्वप्नपूर्ति थी। सभी युवा कार्यकर्ताओं के वे सदैव उपलब्ध मित्र और मार्गदर्शक थे।
अद्वितीय मनुष्य निर्माण संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विनायकराव कानेटकर सर्वश्रेष्ठ फलित थे।

🙏🙏
विनायक राव अत्यंत सहज थे।
आनंदा कह कर बुलाते थे।
जब उनसे मिलने आपके साथ कौशिक आश्रम गए तब चाय बनाने के लिए बोले अरे आनंद क्यू बनाएगा चाय मैं बनाता हूं।
मेरा जब पैर फ्रैक्चर था, नाशिक बैठक के लिए मुंबई से कैब करके पहुंचा विनायक राव ने सहज ही पूछा क्या रे कैसे आया मैंने बताया कैब से, तो बोले बहुत पैसे है तुम्हारी पीढ़ी के पास। पैर फ्रैक्चर हुआ तो क्या हुआ २ ही बार दर्द होता ना, ट्रेन से आने में, एक बार ट्रेन में चढ़ते समय और एक बार ट्रेन से उतरते समय।
सहज जीवन की प्रतिमूर्ति थे विनायक राम
बेलगावि के बैठक में मेरी विस्तारक योजना हो गई थी। अंतिम सत्र में 1,2 मिनट के विलंब से सभागार में पहुंचा।सभागार में प्रवेश करते ही पूज्य विनायक जी ने मुझे टोकते हुए कहा कि विस्तारक को 1 मिनट भी विलंब नही होना चाहिए। बेलगावि के बैठक में मै सिर्फ अंतिम सत्र में ही विलंब से पहुंचा था।यह मेरा सौभाग्य है कि पूज्य विनायक जी जैसे आदर्श प्रचारक से एक स्नेहपूर्ण डॉट खाने का अवसर प्राप्त हुआ था। उसके पूर्व अल्प संवाद में मुझसे असमिया गमोसा से बारे में पूछा था कि असम से हो क्या? यह गमोसा कहा से मिला? अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे पूज्य विनायक जी।विनम्र श्रद्धांजलि….🙏🙏🙏
कर्नाटक में आदरणीय विनायक दादा का सानिध्य प्राप्त हुआ था।
आपको सादर नमन।
Lovely narration of a great personality. A karm yogi telling about another one
विनायक रावांच्या आठवणी सांगायच्या म्हणजे खूप काही आहेत पण त्यातल्या त्यात एक आठवण मला आवर्जून आपल्या सर्वांना सांगावी वाटते।
नेमकी दिवाळी संपली होती आणि मी असं ठरवलं की खूप दिवस झाले विनायक रावांची भेट नाही झाली गावाकडून आलो होतो चला आता भेट घ्यायला जाऊया. त्यांना सकाळी फोन केला मी किती वाजता येऊ म्हणून त्यांनी सांगितलं की संध्याकाळी ये तू, मग मी पण सांगितलं प्रमाणे त्यांच्याकडे माझ्या एका मित्राला घेऊन निघालो. गेलो त्या वेळी ते त्या ठिकाणी नव्हते ते नेहमी संध्याकाळच्या वेळी ते कौशिक आश्रमाच्या बाजूला मित्र मंडळ कॉलनीमध्ये फिरायला जात असे. थोड्या वेळात विनायकराव त्या ठिकाणी आले आल्यानंतर त्यांनी विचारलं केव्हा आलात. मग गप्पांना सुरुवात झाली. हे सर्व चालू असताना दोन-तीनदा स्वतः उठून कोणत्या डब्यात काय आहे खाण्यासाठी हे आम्हाला दाखवलं आणि तुम्हाला काय पाहिजे ते घ्या असं वारंवार त्यांनी सांगितलं. गप्पा चालू असताना सोबत आलेल्या माझ्या मित्राला त्यांनी विचारले हेडगेवार यांच्या बद्दल काही वाचले आहेस का? तो नाही म्हणायच्या आत विनायक रावांनी सांस्कृतिक वार्तापत्रानी जो अंक काढला होता तो त्याच्या हातात दिला, ह्यात त्यांच्याबद्दल खूप काही लिहिले आहे आणि तू ते वाच आणि मला पुढच्या वेळेस आल्यास नक्की सांग. नव्याने त्यांनी मोबाईल बदलला होता त्यांना त्यातल्या बऱ्याच गोष्टी माहित नव्हतं आणि हळूहळू ते नवीन गोष्टी त्यातल्या विचारत होते याबद्दल काय त्याबद्दल काय. खूप वेळ गप्पा झाल्यानंतर आम्ही निघण्याच्या तयारीत होतो तेवढ्यात विनायकराव म्हटले थांबा तुम्ही काहीतरी द्यायचा आहे तुम्हाला मी म्हटलं काय देणार आहात विनायकराव? तू थांब जरा मी देतोय ना असे त्यांचे शब्द होते. कुठेतरी उशीच्या खाली ठेवलेल्या दोन-तीन कागदी चिट्ट्या काढल्या आणि माझ्या हातात दिल्या मी बघितलं तर ते पुण्यातील ग्राहक पेठेचे दिवाळी च्या वेळेसचे कुपनस होते. मी म्हटलं याची काही गरज नाहीये तुमच्यासाठी काही आणायचे असेल तर मी त्या ठिकाणाहून घेऊन येतो असं त्यांना सांगितलं. त्यांनी मला उलट रागवलं मी सांगतोय तेवढं कर तुला जो खाऊ घ्यायचा आहे तो त्या ठिकाणी जाऊन तू घे. एवढं प्रेमाने ते दिलं होतं त्यांनी मी त्यांना म्हटलं ठीक आहे मी घेतो काहीतरी. असे होते विनायक राव मी केव्हाही त्यांच्याकडे गेलो नेहमी ते प्रेमाने सगळ्या गोष्टी विचारत असे आणि तेवढा लाड पण करत असे.
बहुभाषाविद् ,वैज्ञानिक भाषा संस्कृत के संभाषण कर्ता ,साथ ही त्याग और सादगी के साथ सूचनाओं और समय पालन का उदाहरण देने वाले श्री विनायक कानिटकर दादा को प्रणाम।अपने जीवन के स्वधर्म को तय कर दिव्य मन को निर्मित कर देह कर छोड़ने वाले अपने आदर्श प्रचारक और शिक्षाविद् को हृदय से प्रणाम ।और प्रार्थना उनसे ही कि मुझे भी शुभ आशीर्वाद दे जिससे मैं स्वधर्म को पहचान कर उद्देश्य पूर्ण जीवन जीने में सफल रहूं।
श्रद्धेय विनायक राव कनेटकर जी के मार्गदर्शन में संगठनात्मक कार्य करने का मौका तो नहीं मिला लेकिन वर्ष २०२२ में बेलगाम के विस्तारक वर्ग में भारतीय शिक्षण मंडल के पूर्णकालिक के रूप में आशीर्वाद मिला।
मानव जीवन मे आदर्श व्यक्ती बने रहने का मार्गदर्शन लेख आपने लिखा है l
बहुभाषाविद् ,वैज्ञानिक भाषा संस्कृत के संभाषण कर्ता ,साथ ही त्याग और सादगी के साथ सूचनाओं और समय पालन का उदाहरण देने वाले श्री विनायक कानिटकर दादा को प्रणाम।
अपने जीवन के स्वधर्म को तयकर दिव्य मन को निर्मित कर देह कर छोड़ने वाले अपने आदर्श प्रचारक और शिक्षाविद् को हृदय से प्रणाम ।
और प्रार्थना उनसे ही कि मुझे भी शुभ आशीर्वाद दे जिससे मैं स्वधर्म को पहचान कर उद्देश्य पूर्ण जीवन जीने में सफल रहूं।🙏
सजीव चित्रण… 🙏🏼👏🏽🙇🏽♂️
आदरणीय श्री विनायक राव जी ना कि एक तपस्वी थे अपितु वे एक सम्पूर्ण मानव थे। जो समग्र हिन्दुस्तान को अपने मे पिरोये थे।उन्होने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भारतीय शिक्षण मंडल को ना कि प्रतिस्थापित किया अपितु गति भी दी। प्रथम बार जब वे वर्ष 2006 मे घर आये तो लगा ही नहीं कि अपरिचित है।सहज ही घुलमिल गये।पत्नी आशा के हाथ मे सूत बाधते हुये कहा कि इसकी रक्षा करना। वे सरल,सहज,और भावी दृष्टा थे।ईशान भारत मे जहां जीवन जीना दुष्कर है वहां पर शिक्षण मंडल को गति दी।
,उनसे हमने बहुत कुछ सीखा। उनसे बातें करना अच्छा लगता था। मेरे लिए वे एक अभिभावक की भांति थे। सदैव सबके हित की बात करते और शिक्षण मंडल को आगे बढाने हेतु चिंतित रहते। माननीय मुकुल जी के द्वारा शिक्षण मंडल को दिये गये गति से वे बहुत संतुष्ट दिखते थे। आज वे जहां भी हों प्रभु उन्हें खुश रखें।उन्हें मेरा कोटिशः प्रणाम।
यह तो परम सौभाग्य है कि हम अपने संगठन के निष्ठावान, कर्मठ, देश प्रेम से ओतप्रोत महानता से परिपूर्ण परम आदरणीय हमारे विनायकराव जी का आदर्श चरित्र पर कुछ लेखन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐसा अद्भुत देश प्रेम, संगठन और मातृभूमि से
जुड़कर काम करने का ज्ञान प्राप्त होता है, क्योकि संगठन मे जो मिले या जाये दोनो को सहर्ष स्वीकार करना यह एक अद्वितीय लोगो मे गुण होता है।
सबका साथ सबका विकास की भावना यहा से ध्यान मे आती है,कोई शिकायत नही क्योकि द्वेष का भाव नही है।
यही गुण अगर हर व्यक्ति मे हो जाए तो धरती पर सत्ययुग आ जायेगा और ऐसे महान व्यक्ति सत्ययुग के लोगो का ही कलियुग मे जन्म हुआ है।
क्योकि सत्ययुग मे किसी मे द्वेष नही होता – सूत्र नारद पुराण
विनायक राव दादा इतने उत्साही थे की, संगठनात्मक हर कार्य में उपस्थित रहते थे। उनको देखकर कसी को भी संगठनात्मक कार्य करने में उत्साह आ जाता था। वह एक मृदू भाषी भी थे। उनके मुखमंडल पर मैंने सदैव हास्य देखा। इसी हास्य के कारण वह सभी को अपना बना लेते थे। वह सामने वाले का पूरा परिचय ले लेथे थे। विनायक राव दादा के साथ भारतीय शिक्षण मंडल नागपुर कार्यालय में रहने का अवसर मिला उनका आशीर्वाद मिला। मैं भाग्यशाली मानता हूँ। उनका सेवा करने का मुझे अवसर मिला तो मैं कभी अवसर से चुका नहीं। वह बहुत ही सरल रहते थे। उनसे मुझे बहुत कुछ सिखने को मिला। उनका मैं जीवंत पर्यंत आभारी रहूंगा।
संघ के प्रचारक विनायक कानेटकर की भूमिका शीक्षण मंडल की सदस्यों के लिए उत्साहप्रद और प्रेरणा दायक है।
मी विनायक कानेटकर असा खणखणीत आवाजात आपण केलेल्या मोबाईल ला प्रतिसाद देत. मला सर म्हणू नकोस उमेश ..सर शब्द इंग्रजी आहे मास्तर म्हण…त्याच्या या संस्कारातून हदयात भिणलेले भारतीयत्व दिसते. माझी प्रथम भेट धुळे येथील मातोश्री वद्धाश्रमात दोन दिवसाच्या कार्यकर्ता अभ्यास वर्गात झाली वर्ष 2002. मी अरुणाचल प्रदेश रोईंग येथे हिंदी शिक्षक व संघ कामासाठी होतो. तेव्हा आदरणीय गोगटे सर यांनी माझा परिचय श्री. विनायकराव कानेटकर यांच्याशी करुन दिला. मी माझा संघपद्धतीने परिचय करु दिला. नाहरलगन (तिनसुकीया-आसाम) येथील श्री दिपक यादव यांना मला मदत लागली तर कार्यालयात राहण्यांची व रोईंगला जाण्यासाठी मदत करावी. यांतून विनायकराव कानेटकर यांचा कार्यकर्ते ची जाणीव हा विषय सहकार्यातून दिसून आला. मौन तपस्वी साधक बनकर हिमगिरीसा चूप चाप गले ही ओळ जिवंत उदाहरण म्हणजे विनायकराव कानेटकर. अंतिम क्षणी शरीरव्याधीच्या तक्रारारी सुरु असताना जळगांव ला आचार्य परिवार, धुळयाला चितळे परिवार , नंदुरबार ला शिंदे चा कळण्याची भाकरी ठेसा आस्वाद घेण्यास येईल. पण… असो… प्रत्येक भारतीय शिक्षण मंडळाच्या कार्यक्रमास एक नवीन ऊर्जा विनायकराव कडून घेतली. शेवटी एकदा प्रत्यक्ष कौशिक आश्रमात पुणे येथे शेवटचा विचारपुस करण्यातून त्यांचा परिस स्पर्श झाला. लवकरच मी कमबैंक जोमाने येईल व कान्हदेश मधून कर्नावत ला गुरुकुलात जाईन एवढंच बोलण माझ त्याच संवादातून झाला
||श्री||
“बहुत हुए, आगे भी बहुत होंगे, लेकिन इनके जैसा कोई कहा”
एक सिक्के के दो पहलू होते हैं. मुझे लगता है कि सिक्के के दो पहलू हैं एक पहलू हैं बाजू कै. पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई और दूसरा पहलू हैं कै. विनायकजी कानेटकर पूर्व संघटन मंत्री भारतीय शिक्षा बोर्ड। दोनों के बीच समानता कुरूपता पर नियंत्रण और चेहरे की विशेषताओं की प्रसन्नता और चमक है। क्योंकि मैंने दोनों को करीब से देखा है.’ तो मुझे भी ऐसा ही लगा.
मेरा और विनायकजी का परिचय 2004 में हुआ था। मेरे पति श्री विष्णु देशपांडे, डी.एल.पदे सर, हम शिक्षा बोर्ड सम्मेलन के लिए दिल्ली गए थे। विनायकजी दिल्ली में सभागार में प्रवेश करने के लिए हमारा इंतजार कर रहे थे, वह हमें देखकर खुश थे और मैं भी। उसके बाद हर वर्ष उनका आना सुखद रहा। माहौल कितना खुशनुमा, उत्सुकता, उत्सुकता, हर किसी के चेहरे पर देखी जा सकती थी। ज्ञान नई शिक्षा के सन्दर्भ में हो रहा था। विनायकजी को प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन मिलता रहा। सम्मेलन के बाद लौटते समय वे स्वयं पूछते थे कि हमने चाय पी या नहीं। विनायकजी की हिंदी, मराठी बोलने की शैली, शिक्षा के बारे में ज्ञान, जनहित की चिंता, अनुशासन में कठोरता, समय प्रबंधन, अनुशासित योजना, व्यायाम आदि की भावना शिद्दत से महसूस की जाती थी।
शिक्षा सम्मेलन दिल्ली में संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में केवल राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं प्रांत के सदस्य ही उपस्थित थे। शिक्षा परिषद में एक विषय यह था कि क्या पाठ्यक्रम बदला जा सकता है। सभी दिग्गजों ने नकारात्मक विचार व्यक्त किये. मैं तब उलझन में थी. बोलना है या नहीं बोलना है. सभी वरिष्ठ थे और में एक साधारण शिक्षक। लेकिन तभी विनायकजी ने मेरी लालसा को भांप लिया, विनायकजी मेरे पास आए और बोले शैलजाताई आप बोलो। गिरे हुए फल की कमान लेते हुए, मैं मंच पर गई और अपने कार्यक्षेत्र में दो बदलावों का उल्लेख किया, एक जब मैं एसएससी बोर्ड पाठ्यक्रम पर काम कर रही थी और दूसरा जब पुणे में शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया गया था। दोनों शैक्षिक परिवर्तन सकारात्मक सोच के साथ प्रस्तुत किये गये। तब सम्मेलन में उपस्थित सौ (100) सदस्यों ने मेरी सराहना की और सभी इस विचार से सहमत हुए कि हमें नकारात्मक सोचने के बजाय सकारात्मक सोचना चाहिए।
जब मैं अपनी सीट पर आई तो हमारे देवगिरी प्रांत के अध्यक्ष मा. डॉ. सर्जेराव ठोंबरे सर पहली बार शिक्षा परिषद में आये थे। यदि उस समय विनायकजी ने मुझे प्रोत्साहित न किया होता तो मैं चुप ही रहती। मैं हर पल विनायक जी के शब्दों, पीठ थपथपाहट, आशीर्वाद का अनुभव कर रही हूं। इसलिए मेरे लिए विनायकजी को भूलना मुश्किल है।’
विनायकजी हमेशा छत्रपति संभाजीनगर में ‘प्रल्हाद भवन’ आते थे और मेरे घर आना कभी नहीं भूलते थे। परिवार के बारे में पूछताछ करने के लिए. उनकी हमारे परिवार के प्रति संवेदनाएँ थी। लेकिन बाद में उनकी हालत बिगड़ गई और डॉ. हेगड़ेवार अस्पताल आते थे. इलाज ख़त्म होने के बाद भी वह मेरे घर आते थे. मेरा दिल भर आया. लगता था की क्या सच में इतने बड़े हैं? कि विनायकजी उनके इलाज के बाद हमारे घर आएँ। कुछ दिनों बाद विनायकजी की तबीयत ज्यादा ही खराब होने पर उनका मेरे घर आना बंद हो गया, तो वे मुझे बुलाते, तब मैं भी उनसे मिलने प्रह्लाद भवन चली जाती।
विनायकजी को मीठा भोजन खाना वर्जित था, इसलिए में उनके लिए स्वादिष्ट भोजन लेकर जाती थी। सभी लोग एक साथ बैठकर खाना खाते थे। तब मुझे भी संतुष्टि महसूस होती. कभी-कभी यदि वे मुझसे मिले बिना चले जाते तो, डी. एल पदे सर के पास मेरा संदेसा देते थे। किसके भाग्य में इतना सौभाग्य होगा । खून के रिश्ते तो बहुत दूर की बात है|
हालाँकि, अंततः प्रकृति के मन में कुछ और ही था और एक दिन अचानक हमें संदेश मिलता है कि विनायकजी अब हमारे बीच नहीं रहे। मानो जैसे मेरे हृदय में तलवार भोंक दी गई है। मैं विनायक जी को लगातार याद करती हूं, उनकी यादें मुझे प्रोत्साहित और मार्गदर्शन कर रही हैं। मैं खुद को धन्य मानती हूं कि भारतीय शिक्षा बोर्ड ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है।’
आखिर में, में विनायकजी को शत शत नमन करती हूं।